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Photograph: (the sootr)
News in Short
राजस्थान के सांवलिया सेठ के दरबार में एक जाट परिवार ने 28 साल पुरानी मन्नत पूरी होने पर चांदी के अफीम डोडे चढ़ाए।
यह मन्नत अफीम लाइसेंस की बहाली से जुड़ी थी, जो 1995-96 में निरस्त हो गए थे।
परिवार ने अपनी मन्नत के लिए 28 साल तक इंतजार किया।
पहली फसल के बाद परिवार ने चांदी के डोडे चढ़ाने का वादा पूरा किया।
मंदिर प्रशासन ने परिवार की आस्था का सम्मान किया और उन्हें प्रसाद दिया।
News in Detail
राजस्थान के सांवलिया सेठ के दरबार में एक जाट परिवार ने 28 साल पुरानी मन्नत पूरी होने पर चांदी के अफीम डोडे चढ़ाए। यह अनूठी घटना मेवाड़ के सांवलिया सेठ के दरबार में घटी, जहां मलूक दासजी की खेड़ी से आए जाट परिवार ने 28 साल पुरानी मन्नत पूरी होने पर भगवान को चांदी के अफीम डोडे अर्पित किए। यह मन्नत उनके अफीम लाइसेंस की बहाली से जुड़ी थी, जो 1995-96 में निरस्त हो गए थे।
मेवाड़ में एक अद्भुत आस्था और विश्वास की तस्वीर सोमवार को सांवलिया सेठ के दरबार में देखने को मिली। मलूक दासजी की खेड़ी से आए एक जाट परिवार ने 28 साल पुरानी मन्नत पूरी होने पर भगवान को चांदी से बने अफीम के डोडे भेंट किए।
28 साल पहले की मन्नत, आज पूरी हुई
इस परिवार की मन्नत उनके सम्मान और आजीविका से जुड़ी थी। 1995-96 में नारकोटिक्स विभाग द्वारा उनके परिवार के दो अफीम लाइसेंस को निरस्त कर दिया गया था। इस कष्टकारी समय में, परिवार ने सांवलिया सेठ के दरबार में अर्जी लगाई थी कि यदि उनके लाइसेंस बहाल हो गए तो वे भगवान को चांदी के अफीम डोडे चढ़ाएंगे।
28 साल बाद उनका धैर्य और विश्वास रंग लाया
साल 2025 में उनके लाइसेंस बहाल हुए और परिवार ने खेती करना शुरू किया। जब पहली फसल मिली, तो उनका विश्वास और आस्था फिर से मजबूत हो गई। इसके बाद, 28 साल बाद उन्होंने अपनी मन्नत पूरी करने के लिए सांवलिया सेठ के दरबार में चांदी के अफीम डोडे अर्पित किए।
मंदिर प्रशासन द्वारा स्वागत
सांवलिया सेठ मंदिर के प्रशासन ने इस परिवार की आस्था का सम्मान किया। ओंकार लाल जाट और कालूराम जाट का मंदिर के अधिकारियों ने ऊपरना ओढ़ाकर और प्रसाद भेंट कर स्वागत किया।
सांवलिया सेठ मंदिर में चढ़ावा
मेवाड़ और मालवा क्षेत्र में अफीम को 'कालासोना' कहा जाता है और यह स्थानीय किसान अपनी फसल के हिस्से के रूप में सांवलिया सेठ को अर्पित करते हैं। मन्नत पूरी होने पर यह परंपरा है कि किसान अफीम या चांदी के डोडे चढ़ाते हैं।
सांवलिया सेठ मंदिर की खासियत
सांवलिया सेठ मंदिर राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में स्थित एक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है। यह मंदिर भगवान कृष्ण के एक विशेष रूप के रूप में प्रतिष्ठित है, जिसे 'सांवलिया सेठ' के नाम से पूजा जाता है। इस मंदिर की खासियतों में निम्नलिखित बिंदु प्रमुख हैं:
भगवान कृष्ण का अनूठा रूप
सांवलिया सेठ मंदिर में भगवान कृष्ण की प्रतिमा को 'सांवलिया' रूप में पूजा जाता है, जो एक काले रंग में स्थापित है। यह रूप भगवान कृष्ण के अत्यंत प्रिय रूपों में से एक माना जाता है, जो भक्तों के बीच विशेष आस्था का केन्द्र है।
प्राकृतिक सौंदर्य और शांतिपूर्ण वातावरण
मंदिर का माहौल बहुत ही शांतिपूर्ण और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है। यह मंदिर प्राकृतिक पहाड़ियों और हरियाली से घिरा हुआ है, जो भक्तों को मानसिक शांति और आत्मिक सुकून प्रदान करता है।
अफीम की परंपरा
यह मंदिर अफीम की फसल से जुड़ी परंपरा के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां के किसान अपनी मन्नत पूरी होने पर अफीम के चांदी के डोडे चढ़ाते हैं, जिसे 'कालासोना' माना जाता है। यह एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा है, जो स्थानीय किसानों की आस्था से जुड़ी हुई है।
राजनीतिक और सांस्कृतिक महत्व
सांवलिया सेठ मंदिर का राजनीतिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। यहां की परंपराएं और लोकमान्यता ने इसे न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण बना दिया है।
श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या
यह मंदिर सालभर लाखों श्रद्धालुओं का केंद्र बनता है। खासकर त्योहारों और विशेष अवसरों पर यहां भव्य मेला लगता है, जिसमें लोग दूर-दूर से भगवान सांवलिया सेठ के दर्शन करने आते हैं।
सांवलिया सेठ मंदिर राजस्थान के महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक है, जो अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर के लिए जाना जाता है।
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