केंद्रीय करों में राजस्थान के हिस्से पर चली कैंची, विकास के समीकरणों पर पड़ेगा असर

Mukesh Sharma | Feb 02, 2026, 14:21 IST
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bajat
Photograph: (the sootr)

केंद्रीय करों में हिस्सेदारी का गणित इस बार राजस्थान पर भारी पड़ने वाला है। राहत की बात यह है कि हिस्से में कटौती के बावजूद राशि में बढ़ोतरी होगी।

News In Short

  • केंद्रीय करों में राजस्थान की हिस्सेदारी में कटौती
  • राहत यह कि हिस्सेदारी कम के बावजूद राशि अधिक मिलेगी
  • नए फॉर्मूले के कारण राजस्थान जैसे बड़े राज्यों पर कैंची चली
  • केंद्रीय करों की राज्य हिस्सेदारी हस्तांतरण में परफोर्मेंस को भी वेटेज
  • वित्त आयोग की सिफारिशों को केंद्र सरकार ने किया स्वीकार

News In Detail

जयपुर। इस बार केंद्रीय करों में राजस्थान की हिस्सेदारी में कमी आई है। केंद्रीय करों में प्रदेश की हिस्सेदारी में 5.92 प्रतिशत निर्धारित की गई है। पिछले बजट में यह हिस्सेदारी छह फीसदी है। हालांकि, हिस्सेदारी में कटौती के बावजूद प्रदेश को इस बार राशि अधिक मिलेगी।

हिस्सेदारी कम, पैसे मिलेंगे अधिक

आधिकारिक जानकारी के अनुसार केंद्रीय करों में राजस्थन की हिस्सेदारी कम हुई है। लेकिन, कुल राशि में पिछले साल की तुलना में करीब 6505 करोड़ रुपए की बढ़ोतरी हुई है। इस बार राजस्थान को केंद्रीय करों की हिस्सेदारी के रूप में 90445 करोड़ रुपए मिलने का अनुमान है। यह राशि पिछले वित्तीय वर्ष में 84487.83 करोड़ थी।

वित्त आयोग की सिफारिश मंजूर

​केंद्र सरकार ने 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है। इस फैसले के साथ ही देश के राज्यों के बीच केंद्रीय करों के बंटवारे की नई रूपरेखा स्पष्ट हो गई है। हालांकि, आयोग ने राज्यों का कुल हिस्सा 41 प्रतिशत पर बरकरार रखा है, लेकिन राज्यों के बीच आपसी बंटवारे के फॉर्मूले में किए गए बदलावों ने बड़े राज्यों की चिंता बढ़ा दी है। नए फॉर्मूले के कारण इन राज्यों को मिलने वाली राशि के प्रतिशत में गिरावट दर्ज की गई है।

​करों के बंटवारे का नया गणित

​वित्त आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए राज्यों को कुल 15.26 लाख करोड़ रुपए हस्तांतरित किए जाने का अनुमान है। लेकिन जब व्यक्तिगत राज्यों के आंकड़ों पर नज़र डालें तो तस्वीर थोड़ी चुनौतीपूर्ण दिखती है। इसके अनुसार राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के हिस्से में मामूली गिरावट आई है:

​राजस्थान: वर्ष 2025-26 में राजस्थान का हिस्सा 6.02% था, जो 2026-27 में घटकर 5.92% रह गया है (-0.10 की कमी)।

​मध्य प्रदेश: यहां सबसे बड़ी गिरावट देखी गई है। एमपी का हिस्सा 7.85% से घटकर 7.34% पर आ गया है (-0.51 की कमी)।

​उत्तर प्रदेश: यूपी का हिस्सा 17.93% से घटकर 17.61% हुआ है।

​छत्तीसगढ़: यहाँ भी 3.40% से घटकर हिस्सा 3.30% रह गया है।

​क्यों बदला राज्यों का हिस्सा

वित्त आयोग ने इस बार राज्यों का हिस्सा तय करने के लिए केवल जनसंख्या या क्षेत्रफल को ही आधार नहीं बनाया है, बल्कि 'परफॉर्मेंस' को भी वेटेज दिया है। नए फॉर्मूले में निम्नलिखित मानकों को शामिल किया गया है:

  • ​प्रति व्यक्ति आय में अंतर: राज्यों की आर्थिक स्थिति का आकलन।
  • ​जनसंख्या और क्षेत्रफल: जनसांख्यिकीय संरचना और भौगोलिक विस्तार।
  • ​वन आवरण और पारिस्थितिकी: पर्यावरण संरक्षण के प्रति राज्य के प्रयास।
  • ​राजकोषीय प्रयास: राज्य ने अपने स्तर पर टैक्स कलेक्शन और वित्तीय अनुशासन में कैसा प्रदर्शन किया है।
​देश की GDP में योगदान: पहली बार राज्य की आर्थिक उत्पादकता को भी इस बंटवारे में सीधे तौर पर जोड़ा गया है।
इस नए फॉर्मूले में देश की जीडीपी में राज्य के योगदान को शामिल करने से राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के गणित पर असर पड़ा है, जिससे उनके कुल प्रतिशत में कमी आई है।

​करोड़ों का घाटा और चुनौतियां

​चालू वित्तीय वर्ष में कर राजस्व संग्रह अनुमान से कम होने के कारण राज्यों को पहले से तय राशि से कम पैसा मिलने की संभावना है। आंकड़ों के अनुसार ​राजस्थान को करीब 1700 करोड़ रुपए कम मिल सकते हैं। ​मध्य प्रदेश को 2000 करोड़ और छत्तीसगढ़ को 1000 करोड़ रुपए का नुकसान होने का अनुमान है।

राहत की बात यह​

हालांकि, अगले वित्तीय वर्ष (2026-27) के लिए अनुमानित आवंटन राहत देने वाला भी है। राजस्थान को 90445 करोड़, छत्तीसगढ़ को 50427 करोड़ और मध्य प्रदेश को 1.12 लाख करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है। इसके अतिरिक्त, आयोग ने पंचायतों, स्थानीय निकायों और आपदा प्रबंधन के लिए अगले 5 साल में 1.40 लाख करोड़ रुपये अलग से देने की सिफारिश की है।

​क्या है वित्त आयोग की भूमिका

​भारतीय संविधान के तहत हर पांच साल में वित्त आयोग का गठन होता है। इसका मुख्य कार्य केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व के वितरण का नियम तय करना है। यह आयोग ही सुनिश्चित करता है कि देश के विकास में राज्यों के पास पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हों।

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