20 हजार किलोमीटर की अंतहीन दौड़, लेकिन छह साल बाद भी प्रिंस का पता नहीं

राजस्थान में बांदीकुई क्षेत्र के चार साल का प्रिंस छह साल पहले लापता हो गया था। पुलिस ने शक के आधार पर उसकी पड़ोसी को हिरासत में लिया, लेकिन अभी भी यह मिस्ट्री केस बना हुआ है।

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Ashish Bhardwaj
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Photograph: (the sootr)

News In Short 

  • राजस्थान के बांदीकुई में लापता हुए 4 साल के टिल्लू का मामला छह साल बाद भी अनसुलझा है।
  • पड़ोसी ने कबूल किया कि उसने टिल्लू की हत्या की थी और शव को 400 मीटर दूर दफन किया था।
  • तीन बार खुदाई के बावजूद पुलिस को शव या कोई साक्ष्य नहीं मिला।
  • हाई कोर्ट के आदेश के बाद पुलिस ने फिर से सक्रिय होकर जांच शुरू की।
  • परिवार ने 20,000 किलोमीटर का सफर तय किया, लेकिन अब तक अपने बच्चे का कोई सुराग नहीं मिला।

News In Detail

राजस्थान में बांदीकुई के ऊनबड़ा गांव से लापता हुए चार साल के प्रिंस उर्फ टिल्लू का मामला छह साल बाद भी अनसुलझी पहेली बना हुआ है। पड़ोसी ने टिल्लू की हत्या की बात तो मान ली, लेकिन पुलिस को अब तक कोई शव या कंकाल नहीं मिला है। इन 6 साल में मासूम के पिता की चप्पलें 20 हजार किलोमीटर का सफर तय कर घिस चुकी हैं, आंखों का पानी सूख चुका है, लेकिन न तो वह बच्चा वापस आया और न ही उसकी देह का कोई टुकड़ा मिला।

​'400 मीटर दूर दफन है लाश'

हाल ही में पुलिस ने शक के आधार पर एक पड़ोसी को हिरासत में लिया था। उसने  पूछताछ में कबूल किया कि उसने 6 साल पहले ही बच्चे की हत्या कर दी थी। उसने बच्चे को मारकर दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे के नीचे जमीन में गाड़ दिया था, जो उसके घर से महज 400 मीटर की दूरी पर स्थित है। ​लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं होती, बल्कि और उलझ जाती है। आरोपी के बयान के आधार पर पुलिस ने उस चिह्नित स्थान पर तीन बार खुदाई करवाई, लेकिन वहां मासूम का न कोई कपड़ा मिला, न कोई हड्डी। 

कोर्ट के आदेश पर पुलिस हुई एक्टिव

टिल्लू के परिजनों ने दो साल हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। लंबे अरसे से जांच सुस्त पड़ी होने के बाद कोर्ट ने पुलिस पर सख्त टिप्पणी की और बच्चे को बरामद करने के आदेश दिए। इसके बाद पुलिस एक्टिव दिखी। इस मामले में अब तक 10 जांच अधिकारी बदल चुके हैं, लेकिन यह मामला उलझा ही रहा।

​20 हजार किलोमीटर का दर्द और 'बाबाओं' का मायाजाल

​छह साल में पीड़ित परिवार ने जो सहा, वह किसी नरक से कम नहीं है। 16 अगस्त, 2020 में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस की शिथिलता ने परिवार को दर-दर भटकने पर मजबूर कर दिया। परिवार अपने लाडले की तलाश में दिल्ली, मुंबई, नागपुर, हरियाणा, लखनऊ और कानपुर तक गया। रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर महीनों बिताए।

जब कानून से उम्मीद टूटने लगी, तो परिवार अंधविश्वास के जाल में फंस गया। तांत्रिकों और भोपाओं ने उनकी भावनाओं से जमकर खिलवाड़ किया। किसी ने कहा, 'बच्चा सुरक्षित है', तो किसी ने उसे 'गैंग के पास' बताया। एक तांत्रिक के कहने पर तो परिवार ने पूरे गांव का 'जीमण' (दावत) तक करवा दिया कि शायद इससे खुश होकर देवता बच्चे को वापस भेज दें। इस उम्मीद ने उन्हें आर्थिक और मानसिक रूप से खोखला कर दिया।

​डीएनए टेस्ट ने भी तोड़ी उम्मीद की लौ

​मार्च 2022 में दिल्ली में एक बच्चा मिला, तो उम्मीद जगी। फिर मार्च 2024 में भोपाल में एक लावारिस बच्चे का शव मिलने की खबर आई। परिजनों ने भागकर भोपाल का रुख किया। स्थानीय पुलिस के सहयोग से डीएनए टेस्ट कराया गया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। रिपोर्ट 'नेगेटिव' आई—वह बच्चा उनका नहीं था।

तलाश जारी, सवाल बरकरार

आज आरोपी सलाखों के पीछे है, लेकिन इंसाफ अब भी कोसों दूर है। पुलिस के पास आरोपी का इकबालिया बयान तो है, लेकिन 'लाश' के बिना कानून की दहलीज पर जुर्म साबित करना एक बड़ी चुनौती होगी।

​मुख्य सवाल जो अब भी अनुत्तरित हैं

​अगर आरोपी ने हत्या की, तो शव आखिर गया कहां?
​क्या एक्सप्रेस-वे निर्माण के दौरान साक्ष्य नष्ट हो गए?
​6 साल तक पुलिस इस पड़ोसी तक क्यों नहीं पहुंच सकी

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