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Photograph: (the sootr)
​भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में अगर किसी एक संस्था ने महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को बदलने में सबसे निर्णायक भूमिका निभाई है, तो वह निस्संदेह भारत की न्यायपालिका है। रसोई की चारदीवारी से लेकर कॉर्पोरेट ऑफिस के बोर्डरूम तक भारतीय महिलाओं ने जो लंबा सफर तय किया है, उसकी नींव में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के वे ऐतिहासिक फैसले हैं, जिन्होंने सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक बेड़ियों को काट दिया। ​
राजस्थान से जुड़े विशाखा गाइडलाइंस से लेकर तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित करने तक अदालतों ने न केवल कानून की व्याख्या की, बल्कि महिलाओं के लिए गरिमा, समानता और स्वतंत्रता का एक नया आकाश भी तैयार किया।
दहलीज के बाहर सुरक्षा: विशाखा से कार्यस्थल तक
1997 से पहले कामकाजी महिलाओं के लिए कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न एक ऐसी कड़वी सच्चाई थी, जिस पर कानून मौन था। लेकिन विशाखा बनाम राजस्थान राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो गाइडलाइंस जारी कीं, उन्होंने भारत की कार्यसंस्कृति को हमेशा के लिए बदल दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुरक्षित माहौल में काम करना महिला का मौलिक अधिकार है। इसी फैसले ने आगे चलकर 2013 के 'कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न' कानून का मार्ग प्रशस्त किया।
आर्थिक सशक्तिकरण: संपत्ति में बराबर की हिस्सेदार
​कहा जाता है कि आर्थिक स्वतंत्रता ही वास्तविक स्वतंत्रता है। न्यायपालिका ने इस दिशा में क्रांतिकारी कदम उठाए हैं:
​पैतृक संपत्ति: 1977 और फिर 1986 के केरल ईसाई महिलाओं से जुड़े मामलों में कोर्ट ने संपत्ति के बंटवारे में भेदभाव को खत्म किया।
​हिंदू उत्तराधिकार कानून : 2005 के संशोधन के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न फैसलों (जैसे विनीता शर्मा केस) में यह स्थापित किया कि बेटी जन्म से ही पिता की संपत्ति में बेटे के समान 'सह-दायिक' (Coparcener) है।
आदिवासी महिलाओं के अधिकार: 2022 में कोर्ट ने एक और ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा कि आदिवासी महिलाओं को भी गैर-आदिवासी महिलाओं की तरह पिता की संपत्ति में बराबरी का हक मिलना चाहिए, चाहे इसके लिए पुराने कानूनों में बदलाव ही क्यों न करना पड़े।
सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार: तीन तलाक और शाहबानो
​भारतीय न्यायपालिका ने हमेशा संवैधानिक नैतिकता को धार्मिक रूढ़ियों से ऊपर रखा है। 1985 का शाहबानो केस देश की राजनीति और न्यायशास्त्र का टर्निंग पॉइंट था, जहाँ कोर्ट ने तलाकशुदा मुस्लिम महिला के भरण-पोषण के अधिकार को मान्यता दी। हालांकि उस वक्त राजनीति ने इस फैसले को पलटने की कोशिश की, लेकिन 2017 और फिर 2022 के 'शमीम आरा' और अन्य फैसलों में कोर्ट ने 'तीन तलाक' (तलाक-ए-बिद्दत) को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर महिलाओं को एक गरिमापूर्ण जीवन की सुरक्षा दी।
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मां की ममता और स्वाभिमान का सम्मान
​अदालतों ने यह समझा कि एक मां का दर्जा केवल परवरिश तक सीमित नहीं है।
​कस्टडी और सरनेम: 2015 में कोर्ट ने तय किया कि 5 साल तक के बच्चों की कस्टडी मां को मिलेगी। वहीं, 2022 के एक फैसले ने मां को यह अधिकार दिया कि वह अपने बच्चे का उपनाम (Surname) खुद तय कर सकती है और उसे गोद भी दे सकती है। यह फैसला पितृसत्तात्मक समाज के मुंह पर करारा तमाचा था।
​प्रजनन अधिकार: 2022 में गर्भपात कानून की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने विवाहित और अविवाहित महिलाओं के अंतर को मिटा दिया। कोर्ट ने कहा कि 'इच्छा विरुद्ध गर्भधारण' महिला की गरिमा के खिलाफ है और 24 सप्ताह तक का सुरक्षित गर्भपात उसका अधिकार है।
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​सुरक्षा और गरिमा: टू-फिंगर टेस्ट से जेल सुधार तक
न्यायपालिका ने यौन हिंसा की शिकार महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाने के लिए कड़े निर्देश दिए हैं। 2022 में टू-फिंगर टेस्ट को प्रतिबंधित करना पीड़िता की निजता और गरिमा की रक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम था। इसके साथ ही, जेलों में बंद महिला कैदियों और उनके बच्चों के लिए जेल मैनुअल में बदलाव के निर्देश देकर कोर्ट ने यह साबित किया कि न्याय की रोशनी सलाखों के पीछे भी पहुंचनी चाहिए।
​आधुनिक भारत की नई दिशा: 2025-26 के मील के पत्थर
​हालिया वर्षों में भी अदालतों का रुख बेहद प्रगतिशील रहा है:
​महिला वकील आरक्षण: 2025 में बार काउंसिल में महिलाओं के लिए 30% सीटें आरक्षित करने का फैसला कानूनी पेशे में महिलाओं की भागीदारी को नई ऊंचाई देगा।
विवाह की वैधता: 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादी सिर्फ कागजी सर्टिफिकेट नहीं है। व्यक्तिगत कानूनों के अनुसार रस्में पूरी होना जरूरी है, ताकि महिलाओं को 'फर्जी विवाह' के जाल से बचाया जा सके।
​ऐतिहासिक फैसलों की एक झलक
वर्ष फैसला/मामला प्रभाव
1997 विशाखा गाइडलाइंस कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से सुरक्षा।
2005 हिंदू उत्तराधिकार कानून संशोधन बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर हक।
2017 सायरा बानो केस तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित किया गया।
2022 गर्भपात अधिकार अविवाहित महिलाओं को भी 24 सप्ताह तक गर्भपात का हक।
2022 टू-फिंगर टेस्ट बैन यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं की गरिमा सुनिश्चित की।
2025 बार काउंसिल आरक्षण महिला वकीलों के लिए 30% सीटों का आरक्षण।
बदल रही है समाज की सोच
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इन फैसलों ने न केवल कानून की किताबों को बदला है, बल्कि समाज की मानसिकता में भी 'साइलेंट रिवोल्यूशन' (मौन क्रांति) पैदा की है। आज महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक हैं। वे जानती हैं कि यदि समाज या परिवार उनके साथ भेदभाव करता है, तो देश की सबसे बड़ी अदालत के दरवाजे उनके लिए हमेशा खुले हैं।
​न्यायपालिका के ये निर्णय केवल कागजी आदेश नहीं हैं, बल्कि वे उस 'नए भारत' का घोषणापत्र हैं, जहां लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा। जैसा कि एक प्रसिद्ध न्यायिक टिप्पणी में कहा गया था- एक राष्ट्र की प्रगति का आकलन उस राष्ट्र की महिलाओं की प्रगति से किया जा सकता है। भारतीय न्यायपालिका ने इस कसौटी पर खुद को बखूबी खरा साबित किया है।
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