पंचायत चुनाव में भाईचारे की मिसाल हुई पेश, सरपंच का चुनाव हारे प्रत्याशी को दिए 25 लाख
Ashish Bhardwaj | Oct 27, 2026, 16:19 IST
हारे हुए प्रत्याशी को ग्रामीणों ने दिए 25 लाख
राजस्थान के नागौर जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने चुनाव के बाद रंजिश की धारणा को बदल दिया है। यहां सरपंच का चुनाव हारने वाली महिला प्रत्याशी के परिवार को ग्रामीणों ने 25 लाख रुपये की सम्मान राशि भेंट की। गांव वालों का कहना है कि चुनाव में हार-जीत अपनी जगह है, लेकिन आपसी रिश्ते और भाईचारा उससे कहीं ऊपर हैं।
चुनाव में हार के बाद अक्सर प्रत्याशियों और उनके समर्थकों के बीच दूरियां बढ़ जाती हैं। कई बार चुनावी रंजिश लंबे समय तक चलती है। लेकिन राजस्थान में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने भाईचारे की अलग ही मिशाल पेश कर दी है।
यह मामला नागौर जिले के मूंडवा पंचायत समिति की भदौरा ग्राम पंचायत के मोड़ी गांव का है। यहां हेमाराम राव की पत्नी चिड़ी देवी सरपंच पद का चुनाव लड़ रही थीं। वे एक साधारण किसान परिवार से आती हैं। ग्रामीणों ने उनके समर्थन में प्रचार किया था। लोगों को उम्मीद थी कि चिड़ी देवी चुनाव जीतकर गांव की जिम्मेदारी संभालेंगी, लेकिन नतीजा उनके पक्ष में नहीं आया।
भदौरा ग्राम पंचायत (Bhadaura Gram Panchayat) के सरपंच चुनाव में चिड़ी देवी का मुकाबला गिरिजा सांदू से था। चुनाव में गिरिजा सांदू को 1,317 वोट मिले, जबकि चिड़ी देवी के खाते में 1,155 वोट आए। इस तरह चिड़ी देवी को 162 वोटों से हार का सामना करना पड़ा।
हालांकि, गांव के लोगों ने इस हार को परिवार के लिए मायूसी की वजह नहीं बनने दिया। ग्रामीणों ने आपस में चर्चा की और चिड़ी देवी के परिवार को सम्मान देने का फैसला किया। इसके बाद अलग-अलग समाजों के लोगों ने मिलकर 25 लाख रुपये जुटाए।
रिपोर्टों के मुताबिक, ग्रामीण ढोल-नगाड़ों के साथ चिड़ी देवी के घर पहुंचे। वहां फूलमालाओं और साफा पहनाकर उनका सम्मान किया गया। इसके बाद 25 लाख रुपये की राशि थाल में सजाकर परिवार को भेंट की गई। इस पूरे घटनाक्रम ने चुनाव हारने के बाद परिवार में छाई निराशा को खुशी और गर्व में बदल दिया।
हेमाराम राव ने ग्रामीणों के प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा कि सरपंच (Sarpanch) नहीं बन पाने का मलाल जरूर था, लेकिन गांव के लोगों से मिले प्यार और सहयोग ने उस निराशा को बदल दिया। उनके लिए यह सम्मान चुनावी जीत से कम नहीं था।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, हेमाराम राव गांव में सामाजिक कामों से भी जुड़े रहे हैं। उन्होंने करीब दो साल पहले गांव की गोशाला को ट्रैक्टर भेंट किया था। इसके अलावा प्याऊ बनवाने और बोरवेल खुदवाने की घोषणा भी की थी। ग्रामीणों के सहयोग को उनके परिवार के प्रति सम्मान और भरोसे से जोड़कर देखा जा रहा है।
नागौर जिले की भूंडेल ग्राम पंचायत से भी चुनाव हारने वाले प्रत्याशी गंगाराम को ग्रामीणों की ओर से आर्थिक सहायता दिए जाने की जानकारी सामने आई है। मीडिया के अनुसार, भूंडेल, श्रीयादे नगर और नेनाऊ के ग्रामीणों ने मिलकर 15 लाख रुपये जुटाए। बताया गया है कि गंगाराम ने इसमें से 51 हजार रुपये स्थानीय गोशाला को दान किए।
हालांकि, इस दूसरे मामले में 15 लाख रुपये की सहायता और गोशाला को दान की बात की स्वतंत्र पुष्टि विश्वसनीय प्रकाशित रिपोर्टों से नहीं हो सकी है। इसलिए इन विवरणों को आधिकारिक रूप से पुष्ट तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
मोड़ी गांव की घटना समाज को एक संदेश भी देता है। चुनाव में जीतने वाला सरपंच बनता है, लेकिन हारने वाला व्यक्ति समाज से बाहर नहीं हो जाता। ग्रामीणों ने चिड़ी देवी के परिवार को सम्मान देकर दिखाया कि सामाजिक रिश्ते किसी चुनावी नतीजे के मोहताज नहीं हैं।
आज जब कई जगह चुनावी मुकाबले के बाद कटुता की खबरें सामने आती हैं, तब नागौर की यह पहल अलग तस्वीर पेश करती है। गांव वालों ने अपने सहयोग से बताया कि किसी प्रत्याशी का सम्मान सिर्फ उसके चुनाव जीतने से तय नहीं होता। कई बार हार के बाद मिलने वाला साथ ही सबसे बड़ी जीत बन जाता है।
यह मामला नागौर जिले के मूंडवा पंचायत समिति की भदौरा ग्राम पंचायत के मोड़ी गांव का है। यहां हेमाराम राव की पत्नी चिड़ी देवी सरपंच पद का चुनाव लड़ रही थीं। वे एक साधारण किसान परिवार से आती हैं। ग्रामीणों ने उनके समर्थन में प्रचार किया था। लोगों को उम्मीद थी कि चिड़ी देवी चुनाव जीतकर गांव की जिम्मेदारी संभालेंगी, लेकिन नतीजा उनके पक्ष में नहीं आया।
162 वोट से हार गईं चिड़ी देवी
हालांकि, गांव के लोगों ने इस हार को परिवार के लिए मायूसी की वजह नहीं बनने दिया। ग्रामीणों ने आपस में चर्चा की और चिड़ी देवी के परिवार को सम्मान देने का फैसला किया। इसके बाद अलग-अलग समाजों के लोगों ने मिलकर 25 लाख रुपये जुटाए।
ढोल-नगाड़ों के साथ घर पहुंचे ग्रामीण
हेमाराम राव ने ग्रामीणों के प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा कि सरपंच (Sarpanch) नहीं बन पाने का मलाल जरूर था, लेकिन गांव के लोगों से मिले प्यार और सहयोग ने उस निराशा को बदल दिया। उनके लिए यह सम्मान चुनावी जीत से कम नहीं था।
समाजसेवा से जुड़ा रहा है परिवार
भूंडेल में भी मदद की चर्चा
हालांकि, इस दूसरे मामले में 15 लाख रुपये की सहायता और गोशाला को दान की बात की स्वतंत्र पुष्टि विश्वसनीय प्रकाशित रिपोर्टों से नहीं हो सकी है। इसलिए इन विवरणों को आधिकारिक रूप से पुष्ट तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
चुनाव से बड़ा है गांव का भाईचारा
आज जब कई जगह चुनावी मुकाबले के बाद कटुता की खबरें सामने आती हैं, तब नागौर की यह पहल अलग तस्वीर पेश करती है। गांव वालों ने अपने सहयोग से बताया कि किसी प्रत्याशी का सम्मान सिर्फ उसके चुनाव जीतने से तय नहीं होता। कई बार हार के बाद मिलने वाला साथ ही सबसे बड़ी जीत बन जाता है।
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