हाई कोर्ट का फैसला, स्थाई लोक अदालत को नहीं है पट्टा जारी करने का क़ानूनी अधिकार

Ashish Bhardwaj | Feb 06, 2026, 17:38 IST
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rajasthan high court patah
Photograph: (the sootr)

राजस्थान हाई कोर्ट ने एक अहम् फैसले में यह साफ कर दिया कि स्थाई लोक अदालत को पट्टा जारी करने और संपत्ति अधिकार तय करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। यह आदेश हाई कोर्ट की जोधपुर मुख्य पीठ ने दिया है

News In Short

  • हाई कोर्ट की जोधपुर मुख्य पीठ का स्थाई लोक अदालतों को आदेश
  • कोर्ट ने कहां पट्टा जारी करने का अधिकार स्थायी लोक अदालत को नहीं ।
  • कोर्ट ने बीकानेर की स्थाई लोक अदालत का 2018 का आदेश रद्द किया।
  • यूआईटी ने पट्टा जारी करने के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
  • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संपत्ति अधिकारों का निपटारा सिविल या राजस्व न्यायालय कर सकते हैं।

News In Detail

राजस्थान हाई कोर्ट ने बड़ा आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि लोक अदालतों को पट्टा जारी करने या संपत्ति को लेकर कोई आदेश जारी करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने बीकानेर की स्थाई लोक अदालत की ओर से पट्टा जारी करने के आदेश को रद्द कर दिया है। हाई कोर्ट की जोधपुर मुख्य पीठ के जस्टिस फरजंद अली ने इसे अधिकार क्षेत्र से बाहर मानते हुए यह आदेश पारित किया।

मामला क्या था?

यह मामला अर्बन इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट (यूआईटी) बीकानेर और एक निजी व्यक्ति के बीच था। वर्ष 2018 में बीकानेर की स्थाई लोक अदालत ने इस मामले में एक आदेश दिया था। इसमें उसने व्यक्ति के पक्ष में पट्टा जारी करने और मुआवजा देने के निर्देश दिए थे। यूआईटी ने हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी थी। यह दावा करते हुए कि जिस भूमि का पट्टा मांगा गया था, वह यूआईटी के नाम म्यूटेशन में दर्ज नहीं थी, और ऐसे में पट्टा जारी करना कानूनी रूप से संभव नहीं था।

हाईकोर्ट का निर्णय

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि स्थायी लोक अदालत के पास संपत्ति से जुड़े अधिकार, स्वामित्व और दस्तावेजों की वैधता जैसी जटिल समस्याओं को निपटाने का कोई अधिकार नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों का समाधान केवल सक्षम सिविल या राजस्व न्यायालय द्वारा ही किया जा सकता है। त्वरित न्याय के नाम पर विधिक प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने 17 जनवरी 2018 के स्थायी लोक अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। इससे यह साबित हो गया कि लोक अदालत का दायरा संपत्ति अधिकारों को तय करने तक नहीं है।

यूआईटी की दलीलें

यूआईटी ने कोर्ट में यह तर्क दिया कि जिस भूमि पर पट्टा मांगा गया, वह यूआईटी के नाम म्यूटेशन में दर्ज नहीं थी, और ऐसे में स्थाई लोक अदालत को उस भूमि पर पट्टा जारी करने का अधिकार नहीं था। यूआईटी ने यह भी कहा कि बिना कानूनी प्रक्रिया के पट्टा जारी करने से भूमि विवाद बढ़ सकते हैं और इसके परिणामस्वरूप अन्य कानूनी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

स्थाई लोक अदालत के अधिकार

हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि स्थाई लोक अदालत का उद्देश्य विवादों का समाधान जल्दी और सुलभ तरीके से करना है, लेकिन यह न्यायिक प्रक्रिया से बाहर जाकर जटिल कानूनी मुद्दों का समाधान नहीं कर सकती। कोर्ट ने इस फैसले के जरिए यह भी बताया कि स्वामित्व, दस्तावेजों की वैधता और तृतीय पक्ष के अधिकार जैसे मुद्दों को केवल सिविल और राजस्व न्यायालयों द्वारा हल किया जा सकता है।

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