IOC अग्निकांड, 16 साल से लगा हुआ है न्याय पर ताला! न ट्रायल शुरू हुआ, न मुआवजे का फैसला
Mukesh Sharma | Oct 29, 2026, 15:25 IST
जयपुर के सीतापुरा में 11 लोगों की मौत के 17 साल बाद भी परिजन न्याय को तरस रहे
2009 में हुए जयपुर के IOCL डिपो अग्निकांड के 17 साल बाद भी 11 मृतकों के परिजनों को न्याय व पूरा मुआवजा नहीं मिला है। राजस्थान हाई कोर्ट की पाबंदी के कारण ट्रायल कोर्ट में सुनवाई ठप है, जो त्वरित न्याय के संवैधानिक अधिकार पर गंभीर सवाल खड़ा करती है।
11 लोगों की मौत, करीब 300 घायल और करोड़ों रुपए का नुकसान। जयपुर के सीतापुरा स्थित इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल) डिपो में 29 अक्टूबर, 2009 को हुए भीषण अग्निकांड को 17 साल पूरे हो गए हैं। लेकिन इस हादसे के लिए जिम्मेदार कौन था, इसका फैसला अब तक नहीं हो पाया है। जिन परिवारों ने अपनों को खोया, जो लोग हादसे में घायल हुए और जिन कारोबारियों की इकाइयां तबाह हुईं, वे आज भी न्याय और पर्याप्त मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं।
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल न्याय मिलने में हो रही असाधारण देरी का है। आरोपी अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर रद्द करने की याचिका राजस्थान हाई कोर्ट में लंबित है। वहीं, हाई कोर्ट की रोक के कारण ट्रायल कोर्ट चालान पेश होने के बावजूद आगे की कार्रवाई नहीं कर पा रहा है। नतीजा यह है कि 16 साल बाद भी मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं हो सकी है। यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित न्याय के अधिकार पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) अनेक मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि त्वरित सुनवाई का अधिकार अनुच्छेद 21 के दायरे में आता है। न्याय मिलने में अनावश्यक देरी न्यायिक व्यवस्था के उद्देश्य पर ही सवाल खड़े करती है।
इस मामले में बड़ा सवाल यह है कि जब जांच के बाद चालान 16 साल पहले पेश हो चुका है,तो उसके आधार पर ट्रायल कोर्ट में आगे की कार्रवाई आखिर कब शुरू होगी ?
दूसरी ओर एफआईआर रद्द करने की याचिका का 16 साल तक लंबित रहना और निचली अदालत की कार्रवाई पर पाबंदी बने रहना पीड़ित परिवारों की न्याय पाने की उम्मीद और न्यायिक व्यवस्था को ध्वस्त कर रहा है।
29 अक्टूबर, 2009 को आग लगने के बाद मृतक आईओसी अधिकारी रविंद्र कुमार की पत्नी अलका ने सांगानेर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने की कोशिश की थी। पुलिस ने उनकी शिकायत पर एफआईआर दर्ज करने के बजाय गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की। रविंद्र कुमार का शव एसएमएस अस्पताल की मोर्चरी में होने के बावजूद एक नवंबर तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई।
दो नवंबर को अधिवक्ता महेंद्र गौड़ ने एसपी कार्यालय में शिकायत दी, लेकिन उस पर भी एफआईआर दर्ज नहीं हुई। इसी दिन रात करीब साढ़े नौ बजे जीनस ओवरसीज कंपनी के कर्मचारी पृथ्वीपाल सिंह की रिपोर्ट पर एफआईआर दर्ज की गई। हादसे से सीधे प्रभावित करीब 250 लोगों की शिकायतों पर भी एफआईआर दर्ज नहीं की गई और कहा कि एक ही मामले में दो एफआईआर नहीं हो सकती। एडवोकेट गौड़ ने इस्तगासे से आदर्श नगर थाने में आईओसी निदेशकों व अफसरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई।
बाद में तीन अलग-अलग एफआईआर और 256 शिकायतों की जांच तत्कालीन एएसपी योगेश गोयल को सौंपी गई। आदर्श नगर थाने में दर्ज एफआईआर में पुलिस ने एफआर लगा दी,जबकि जीनस कंपनी के कर्मचारी की रिपोर्ट पर दर्ज मामले में आईओसीएल के नौ अधिकारियों को दो जुलाई, 2010 को गिरफ्तार किया गया था और सभी को जमानत मिल गई थी।
आरोपी अधिकारियों ने 2010 में ही एफआईआर रद्द करने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया। हाई कोर्ट ने जीनस ओवरसीज के कर्मचारी की रिपोर्ट पर दर्ज एफआईआर को रद्द करने की याचिका में पहले चालान पेश करने पर रोक लगा दी थी। 27 सितंबर, 2010 को अदालत ने हालांकि, चालान पेश करने पर लगी पाबंदी तो हटा ली,लेकिन ट्रायल कोर्ट पर चालान के आधार पर आगे की कार्रवाई करने पर पाबंदी लगा दी। 16 साल बाद भी यह पाबंदी आज तक लगी हुई है।
यानी एक ओर एफआईआर रद्द करने की याचिका का फैसला नहीं हुआ, दूसरी तरफ ट्रायल कोर्ट में मुकदमा आगे नहीं बढ़ रहा है। ऐसे में पीड़ितों के लिए न्याय की राह लगातार लंबी होती जा रही है।
हादसे के करीब एक सप्ताह के भीतर आईओसीएल ने क्षतिपूर्ति के लिए 50 करोड़ रुपए रीको को भेजे थे। मृतकों के परिजनों को 10-10 लाख रुपए अतिरिक्त मुआवजा देने की घोषणा भी हुई थी। लेकिन पीड़ित पक्ष का कहना है कि छह मृतकों के परिवारों को यह राशि नहीं मिली।
एक मृत अधिकारी की पत्नी सविता सरोहा ने कंपनी की नीति के तहत बेटे को इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद नौकरी देने का विकल्प चुना था। बेटा इंजीनियरिंग पूरी नहीं कर पाया तो नौकरी भी नहीं मिली। अब कंपनी उनके पति का अंतिम मूल वेतन देने से भी इनकार कर रही है। जीनस ओवरसीज, सीतापुरा इंडस्ट्री एसोसिएशन और लालचंद मोरानी भी पर्याप्त मुआवजे के लिए अदालत के फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
आईओसीएल का कहना है कि मुआवजा दिया जा चुका है और अतिरिक्त 10 लाख रुपए देने का उसका कोई दायित्व नहीं है। सरकार का रुख है कि मुआवजे की जिम्मेदारी आईओसीएल की है।
मैंने बेटी की नौकरी का विकल्प चुना था,लेकिन उसकी इंजिनियरिंग पूरी नहीं हुई तो आईओसी ने नौकरी नहीं दी। इस पर मैंने पति के आखिरी वेतन की मांग की लेकिन,कंपनी वह भी नहीं दे रही है। इतना ही नहीं आईओसी ने मेरे पति के ग्रेच्यूटी के पैसे भी आज तक नहीं दिए हैं। मुझे अदालत से ही न्याय की उम्मीद है,लेकिन वहां से भी न्याय अब तक तो मिला नहीं है। मैं यूपी के शामली में रहती हूं और बार-बार कंपनी के दफ्तर के चक्कर नहीं काट सकती। इसलिए सिर्फ कोर्ट का ही सहारा बचा है।
- सविता सरोहा, मृतक अफसर की पत्नी।
नुकसान तो हमारा करीब 10 करोड़ से ज्यादा का हुआ था। रीको के जरिए हमें करीब सवा करोड़ रुपए मुआवजे का मिला भी था। लेकिन, हमने कंपनी से पांच करोड़ का मुआवजा मांगा है लेकिन,अब तक मामला हाईकोर्ट में लंबित चल रहा है।
- डॉ.लाल मोरानी, मोरानी मोटर्स।
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल न्याय मिलने में हो रही असाधारण देरी का है। आरोपी अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर रद्द करने की याचिका राजस्थान हाई कोर्ट में लंबित है। वहीं, हाई कोर्ट की रोक के कारण ट्रायल कोर्ट चालान पेश होने के बावजूद आगे की कार्रवाई नहीं कर पा रहा है। नतीजा यह है कि 16 साल बाद भी मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं हो सकी है। यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित न्याय के अधिकार पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
न्याय में देरी गंभीर सवाल
इस मामले में बड़ा सवाल यह है कि जब जांच के बाद चालान 16 साल पहले पेश हो चुका है,तो उसके आधार पर ट्रायल कोर्ट में आगे की कार्रवाई आखिर कब शुरू होगी ?
दूसरी ओर एफआईआर रद्द करने की याचिका का 16 साल तक लंबित रहना और निचली अदालत की कार्रवाई पर पाबंदी बने रहना पीड़ित परिवारों की न्याय पाने की उम्मीद और न्यायिक व्यवस्था को ध्वस्त कर रहा है।
हादसे के बाद एफआईआर दर्ज कराने के लिए भी संघर्ष
दो नवंबर को अधिवक्ता महेंद्र गौड़ ने एसपी कार्यालय में शिकायत दी, लेकिन उस पर भी एफआईआर दर्ज नहीं हुई। इसी दिन रात करीब साढ़े नौ बजे जीनस ओवरसीज कंपनी के कर्मचारी पृथ्वीपाल सिंह की रिपोर्ट पर एफआईआर दर्ज की गई। हादसे से सीधे प्रभावित करीब 250 लोगों की शिकायतों पर भी एफआईआर दर्ज नहीं की गई और कहा कि एक ही मामले में दो एफआईआर नहीं हो सकती। एडवोकेट गौड़ ने इस्तगासे से आदर्श नगर थाने में आईओसी निदेशकों व अफसरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई।
बाद में तीन अलग-अलग एफआईआर और 256 शिकायतों की जांच तत्कालीन एएसपी योगेश गोयल को सौंपी गई। आदर्श नगर थाने में दर्ज एफआईआर में पुलिस ने एफआर लगा दी,जबकि जीनस कंपनी के कर्मचारी की रिपोर्ट पर दर्ज मामले में आईओसीएल के नौ अधिकारियों को दो जुलाई, 2010 को गिरफ्तार किया गया था और सभी को जमानत मिल गई थी।
2010 से हाई कोर्ट में अटकी कार्रवाई
यानी एक ओर एफआईआर रद्द करने की याचिका का फैसला नहीं हुआ, दूसरी तरफ ट्रायल कोर्ट में मुकदमा आगे नहीं बढ़ रहा है। ऐसे में पीड़ितों के लिए न्याय की राह लगातार लंबी होती जा रही है।
मुआवजे की लड़ाई भी खत्म नहीं हुई
एक मृत अधिकारी की पत्नी सविता सरोहा ने कंपनी की नीति के तहत बेटे को इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद नौकरी देने का विकल्प चुना था। बेटा इंजीनियरिंग पूरी नहीं कर पाया तो नौकरी भी नहीं मिली। अब कंपनी उनके पति का अंतिम मूल वेतन देने से भी इनकार कर रही है। जीनस ओवरसीज, सीतापुरा इंडस्ट्री एसोसिएशन और लालचंद मोरानी भी पर्याप्त मुआवजे के लिए अदालत के फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
आईओसीएल का कहना है कि मुआवजा दिया जा चुका है और अतिरिक्त 10 लाख रुपए देने का उसका कोई दायित्व नहीं है। सरकार का रुख है कि मुआवजे की जिम्मेदारी आईओसीएल की है।
मैंने बेटी की नौकरी का विकल्प चुना था,लेकिन उसकी इंजिनियरिंग पूरी नहीं हुई तो आईओसी ने नौकरी नहीं दी। इस पर मैंने पति के आखिरी वेतन की मांग की लेकिन,कंपनी वह भी नहीं दे रही है। इतना ही नहीं आईओसी ने मेरे पति के ग्रेच्यूटी के पैसे भी आज तक नहीं दिए हैं। मुझे अदालत से ही न्याय की उम्मीद है,लेकिन वहां से भी न्याय अब तक तो मिला नहीं है। मैं यूपी के शामली में रहती हूं और बार-बार कंपनी के दफ्तर के चक्कर नहीं काट सकती। इसलिए सिर्फ कोर्ट का ही सहारा बचा है।
- सविता सरोहा, मृतक अफसर की पत्नी।
नुकसान तो हमारा करीब 10 करोड़ से ज्यादा का हुआ था। रीको के जरिए हमें करीब सवा करोड़ रुपए मुआवजे का मिला भी था। लेकिन, हमने कंपनी से पांच करोड़ का मुआवजा मांगा है लेकिन,अब तक मामला हाईकोर्ट में लंबित चल रहा है।
- डॉ.लाल मोरानी, मोरानी मोटर्स।
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