स्वामीनाथन पर किताब में खुलासा: मुश्किल काम था हरित क्रांति के बारे में किसानों को समझाना

Purshottam Kumar Joshi | Jan 16, 2026, 19:26 IST
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priyambada
Photograph: (the sootr)

हरित क्रांति के जनक एम. एस. स्वामीनाथन की जीवनी, "द मैन हू फेड इंडिया", राजस्थान के जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में साझा की गई । इसे लेखिका प्रियंबदा जयकुमार ने साझा किया। किताब में स्वामीनाथन के संघर्ष और कृषि में उनके योगदान का विस्तृत विवरण है।

News In Short

  1. प्रियंबदा जयकुमार की किताब: प्रियंबदा जयकुमार ने एम. एस. स्वामीनाथन की जीवनी पर आधारित किताब "द मैन हू फेड इंडिया" लिखी है, जिसमें उनकी हरित क्रांति में भूमिका को उजागर किया गया है।
  2. हरित क्रांति की शुरुआत: स्वामीनाथन ने 'कल्याण सोना' और 'सोनालिका' जैसे हाइब्रिड बीजों का विकास किया, जिनकी मदद से हरित क्रांति की शुरुआत हुई, जिससे भारतीय कृषि में बदलाव आया।
  3. किसानों को राज़ी करना: स्वामीनाथन को किसानों को उच्च उपज वाले बीजों के बारे में समझाने में काफी संघर्ष करना पड़ा, लेकिन उनकी मेहनत रंग लाई।
  4. स्वामीनाथन का दृष्टिकोण: वे कृषि में विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण पर भी जोर देते थे, ताकि प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन न हो।
  5. स्वामीनाथन रिपोर्ट: स्वामीनाथन ने कृषि के स्थायित्व के लिए रिपोर्ट तैयार की थी, लेकिन यह पूरी तरह से लागू नहीं हो पाई।

News In Detail

प्रियंबदा जयकुमार की किताब "द मैन हू फेड इंडिया" एम. एस. स्वामीनाथन के जीवन और उनकी हरित क्रांति की कहानी पर आधारित है। स्वामीनाथन ने भारतीय कृषि में क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए 'कल्याण सोना' और 'सोनालिका' जैसे हाइब्रिड बीजों का विकास किया, जिनसे हरित क्रांति की शुरुआत हुई। हालांकि, यह आसान नहीं था, क्योंकि किसानों को उच्च उपज वाले बीजों के लिए राज़ी करना कठिन था। स्वामीनाथन का मानना था कि कृषि में विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण भी जरूरी है। उनकी 'स्वामीनाथन रिपोर्ट' को लागू नहीं किया जा सका, लेकिन उनकी उम्मीद थी कि भारतीय कृषि भविष्य में टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बने।

एमएस स्वामीनाथन और हरित क्रांति का चमत्कार

जयपुर साहित्य महोत्सव (Jaipur Literature Festival - JLF) 2026 में एम. एस. स्वामीनाथन की जीवनी पर प्रियंबदा जयकुमार द्वारा लिखी गई किताब 'द मैन हू फेड इंडिया' को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया। स्वामीनाथन को हरित क्रांति का जनक माना जाता है, और उन्हें भारत रत्न जैसे उच्च सम्मान से नवाज़ा गया है। लेकिन उनकी जीवन यात्रा और संघर्ष बहुत कम लोग जानते हैं।

स्वामीनाथन ने भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए उन बीजों की खोज की जो भारतीय कृषि के लिए वरदान साबित हुए। इन बीजों का नाम था 'कल्याण सोना' और 'सोनालिका', जिनकी किस्में मेक्सिकन गेहूँ की बौनी प्रजातियों से विकसित की गईं।

स्वामीनाथन की संघर्षमयी यात्रा

किताब में बताया गया कि स्वामीनाथन के लिए किसानों को उच्च उपज वाले बीजों के बारे में समझाना और उन्हें इस प्रयोग के लिए राज़ी करना आसान नहीं था। हालांकि स्वामीनाथन ने कभी हार नहीं मानी और खेतों और गांवों में जाकर किसानों को विश्वास दिलाया कि ये बीज भविष्य में उनके लिए मुनाफे का कारण बनेंगे।

अंततः हरियाणा के जोंटी गांव में एक किसान ने इन बीजों को अपनाया, और नवंबर 1964 में हरित क्रांति की शुरुआत हुई। 1965 में जब पहली पैदावार हुई, तो आसपास के किसान यह चमत्कार देखने के लिए जोंटी में इकट्ठा हो गए।

स्वामीनाथन की करीबी रही हैं प्रियंबदा

प्रियंबदा जयकुमार जो एम. एस. स्वामीनाथन की नजदीकी रही हैं। उन्होने इस किताब में स्वामीनाथन के जीवन के संघर्षों और उनके योगदान को बखूबी दर्शाया है। यह किताब न केवल हरित क्रांति की कहानी है, बल्कि यह स्वामीनाथन के जीवन की यात्रा को भी उजागर करती है, जिसमें उनके संघर्ष और विश्वास ने भारत की कृषि नीति और खाद्य सुरक्षा को बदलने में अहम भूमिका निभाई।

स्वामीनाथन का दृष्टिकोण

प्रियंबदा जयकुमार के अनुसार स्वामीनाथन को हरित क्रांति के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर भी चिंता थी। वे चाहते थे कि कृषि में विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों साथ-साथ हो। उनका सपना था एक ऐसी क्रांति का, जो कृषि को टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बनाए, बिना प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुँचाए।

स्वामीनाथन रिपोर्ट

स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट भी एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है, जो आज भी चर्चा में है। हालांकि, प्रियंबदा के अनुसार, स्वामीनाथन कभी इस बात से नाराज़ नहीं हुए कि उनकी रिपोर्ट को पूरी तरह से लागू नहीं किया गया। उनका सपना था कि भारत में कृषि एक स्थिर और पर्यावरण-अनुकूल दिशा में आगे बढ़े।



मुख्य बिंदू:

  • जेएलएफ 2026 मेंस्वामीनाथन और उनकी जीवनी: प्रियंबदा जयकुमार ने एम. एस. स्वामीनाथन की जीवनी "द मैन हू फेड इंडिया" लिखी, जिसमें उनके संघर्षों और योगदान का उल्लेख है।
  • हरित क्रांति की शुरुआत: स्वामीनाथन ने हरियाणा के जोंटी गाँव में 1964 में उच्च उपज वाले बीजों के प्रयोग से हरित क्रांति की शुरुआत की।
  • कृषि विज्ञान की ओर स्वामीनाथन का झुकाव: स्वामीनाथन ने अकाल के दौरान प्रभावित होकर कृषि विज्ञान की ओर रुख किया।
  • साहसी प्रयोग और हाइब्रिड बीजों का विकास: स्वामीनाथन ने मेक्सिकन गेहूं की किस्मों को भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाने के लिए उनका क्रॉस-ब्रीडिंग किया।
  • पर्यावरणीय चिंताएँ: स्वामीनाथन को हमेशा पर्यावरणीय संतुलन और टिकाऊ कृषि की चिंता थी।


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