क्यों भड़की है पानी पर जंग? पांचना बांध को लेकर कमांड और डूब वाले गांव आमने-सामने, जानिए पूरी कहानी
ओमप्रकाश सुमन@करौली/सवाई माधोपुर
पूर्वी राजस्थान की धरती पर पानी को लेकर चल रही जंग दो दशक से न सिर्फ 35 गांवों के सवा लाख किसानों की रगों में बारूद घोल रहा है, बल्कि सूबे की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था के लिए भी अबूझ पहेली बन चुका है।
यह मामला है करौली जिले में स्थित पांचना बांध का है। एक ऐसा बांध, जो बनकर तो तैयार हुआ था खुशहाली की फसलें उगाने के लिए, लेकिन आज वह आपसी अविश्वास, जातीय समीकरणों के टकराव और प्रशासनिक निष्क्रियता का एक स्मारक बनकर रह गया है। 20 साल से बांध लबालब भरा है, पानी छलक रहा है, लेकिन नहरें सूखी पड़ी हैं।
विवाद की जड़: क्या है पूरा मामला?
पांचना बांध से साल 2005 के बाद से सिंचाई के लिए एक बूंद पानी भी नहरों में नहीं छोड़ा गया है। इसके पीछे का मुख्य कारण बांध के कमांड क्षेत्र (जिन गांवों को पानी मिलना तय था) और डूब क्षेत्र/अनकमांड क्षेत्र (जिन गांवों की जमीन बांध में डूब गई) के किसानों के बीच का तीव्र गतिरोध है।
दरअसल, मूल योजना के अनुसार पांचना बांध के पानी पर पहला हक कमांड क्षेत्र के 35 गांवों का था। लेकिन बांध के डूब वाले इलाके के किसानों ने बगावत का बिगुल फूंक दिया। उनका तर्क बेहद भावनात्मक और व्यावहारिक है, बांध निर्माण के समय हमारी उपजाऊ जमीनें हमेशा के लिए जलमग्न हो गईं। हमने अपने घर, अपने खेत खो दिए। आज जब इस बांध में पानी भरा है, तो सबसे पहले पानी हमें मिलना चाहिए। यह कैसा न्याय है कि कुर्बानियां हम दें और खुशहाली की फसलें कोई और काटे?
डूब क्षेत्र के किसानों ने गुड़ला-पांचना संघर्ष समिति के बैनर पर खुद को संगठित किया और मांग रखी कि जब तक आसपास के सभी 39 गैर-कमांड (डूब क्षेत्र व नदी पेटे के) गांवों में पानी की पूरी व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक वे कमांड क्षेत्र की नहरों में पानी की एक बूंद भी बहने नहीं देंगे।
जातीय ताने-बाने का पेच
इस पानी की जंग ने समय के साथ एक गंभीर सामाजिक और जातीय रंग भी ले लिया है, जिसने इस मसले को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया है। भौगोलिक और जनसांख्यिकीय संरचना को देखें तो यह विवाद दो बड़े समाजों के बीच वर्चस्व की लड़ाई जैसा प्रतीत होने लगा है:
कमांड एरिया (35 गांव): इस क्षेत्र में आने वाले अधिकांश गांव मीणा बाहुल्य हैं। ये वे किसान हैं जो पिछले 20 वर्षों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं और राजस्थान हाई कोर्ट से अपने पक्ष में कई आदेश हासिल कर चुके हैं। इनका कहना है कि जब सरकार ने उनके लिए योजना स्वीकृत की थी, तो उन्हें उनके हक से वंचित क्यों किया जा रहा है?
अनकमांड/डूब क्षेत्र (39 गांव): जिन 13 गांवों की जमीन बांध निर्माण के वक्त पूरी तरह अधिग्रहण (Acquire) की गई थी और नदी पेटे के जो अन्य गांव हैं, उनमें अधिकांश गुर्जर बाहुल्य आबादी है। इस समाज का साफ स्टैंड है कि बांध का पानी पहले उनके खेतों और पशुओं को मिलना चाहिए, क्योंकि त्याग उनका है।
इस जातीय ध्रुवीकरण के कारण स्थानीय प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व हमेशा फूंक-फूंक कर कदम रखता रहा है। कोई भी सरकार या नेता किसी एक पक्ष को नाराज कर राजनीतिक जीवन में जोखिम नहीं लेना चाहता। यही वजह है कि दो दशकों से यह फाइलें सिर्फ टेबल दर टेबल घूमती रहीं, लेकिन जमीन पर कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।
आंकड़े जो बयां करते हैं नुकसान का मंजर
पांचना बांध परियोजना कोई छोटी-मोटी परियोजना नहीं थी। यह पूर्वी राजस्थान के दो बड़े जिलों की तकदीर बदलने का एक महत्वाकांक्षी खाका था, जो अब फाइलों में दफन है।
इस बांध पर वर्ष 1977 से 2004 के दौरान 125 करोड़ रुपए की भारी-भरकम लागत आई। बांध की कुल जल क्षमता 2100 मिलियन क्यूबिक फ़ीट (MCFT) है। इस बांध के जरिए करौली और सवाई माधोपुर जिलों के 35 गांवों की 9,985 हेक्टेयर (लगभग 40,000 बीघा) भूमि सिंचाई का कुल लक्ष्य रखा गया।
बांध से कमांड एरिया के 35 गांवों के लगभग 1.25 लाख किसान, मजदूर और कारोबारियों को प्रभावित आबादी माना गया।
किसानों का कहना है कि पांचना बांध से सिंचाई नहीं होने से किसानों को प्रतिवर्ष 200 करोड़ रुपए की चपत लगी है। यानी 20 साल के दौरान अब तक कुल 4000 करोड़ से अधिक रुपए का नुकसान हो चुका है।
13 साल तक नहरों में छोड़ा गया नियमित पानी
रिकॉर्ड बताते हैं कि वर्ष 1992 से 2005 तक (13 साल) इस बांध से नहरों में नियमित पानी छोड़ा गया था। उस दौर में संपूर्ण कमांड एरिया के किसान, मजदूर और व्यवसायी बेहद समृद्ध थे।
खेतों में सरसों और गेहूं की लहलहाती फसलें देखकर हर चेहरा मुस्कुराता था। लेकिन वर्ष 2006 में जो ताला लगा, वह आज 2026 तक नहीं खुल सका है।
बांध में वर्तमान में भी 1500 MCFT से अधिक पानी उपलब्ध है, लेकिन कमांड क्षेत्र की नियति में सिर्फ सूखा लिखा है।
समाधान जो खुद समस्या बन गया
उधर, डूब क्षेत्र के किसानों के आक्रोश को शांत करने और विवाद को सुलझाने के लिए सरकार ने बीच का रास्ता निकाला था। गुड़ला-पांचना लिफ्ट परियोजना। इसके तहत बांध से पानी को लिफ्ट करके अनकमांड और नदी पेटे के 39 गांवों तक पहुंचाने की योजना स्वीकृत की गई थी।
कागजों पर तो यह योजना बेहतरीन थी, लेकिन धरातल पर आते ही यह फ्लॉप साबित हुई। डूब क्षेत्र के किसानों का साफ कहना है कि इस लिफ्ट परियोजना का बुनियादी ढांचा इतना लचर है कि इससे क्षेत्र के सभी गांवों के खेतों तक पानी पहुंच ही नहीं रहा है।
जब तक अंतिम छोर (Tail) पर बैठे किसान के खेत तक पानी पहुंचने की शत-प्रतिशत गारंटी नहीं मिलती, तब तक वे संतुष्ट नहीं होंगे। प्रशासन ने दोनों पक्षों को आमने-सामने बिठाकर दर्जनों दौर की वार्ताएं कीं, समझौते के कई मसौदे तैयार हुए, लेकिन अविश्वास की खाई इतनी गहरी थी कि हर बैठक बेनतीजा खत्म होती रही।
कानूनी लड़ाई और अदालती हंटर का घटनाक्रम
जब प्रशासन और राजनेता पूरी तरह नाकाम हो गए तो कमांड क्षेत्र के नागरिकों को न्याय दिलाने के लिए ग्रामोत्थान संस्था ने मोर्चा संभाला।
संस्था ने कमांड एरिया के किसानों के हक के लिए हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की। इसके बाद कोर्ट ने जो आदेश दिए, उसने सरकार की चूलें हिला दीं।
कोर्ट ने 08 जुलाई 2022 को निर्णय देते हुए स्पष्ट आदेश जारी किया कि पांचना बांध के बने हुए सिंचाई सिस्टम को संचालित करके नहरों में तुरंत पानी खोला जाये! लेकिन सरकार इस आदेश को जमीन पर लागू नहीं करवा सकी।
जब दिसंबर 2022 तक भी पानी नहीं छूटा, तो ग्रामोत्थान संस्था ने 12 जनवरी 2023 को कोर्ट में अवमानना याचिका (Contempt Petition) दायर कर दी। खंडपीठ ने 23 अप्रैल 2026 ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई।
कोर्ट ने कहा कि आपसी विवाद का बहाना बनाकर सरकार पल्ला नहीं झाड़ सकती। सिंचाई सुविधाएं सभी के लिए आवश्यक हैं। राज्य अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि योजना को चालू किया जाए।
कोर्ट ने 01 मई 2026 को सरकार को अंतिम चेतावनी देते हुए तीन सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया और साफ कहा कि आगे कोई समय नहीं मिलेगा। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 26 मई 2026 तय की है।
जमीन पर उबल रहा है आक्रोश
जैसे-जैसे कोर्ट की समय-सीमा 26 मई 2026 नजदीक आ रही है, दोनों पक्षों के बीच तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। भीषण गर्मी के इस मौसम में पानी की डिमांड भयंकर है। नागरिक, पशु और पक्षी बूंद-बूंद पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रहे हैं।
इसी बीच, 15 मई 2026 को पांचना गुड़ला संघर्ष समिति (डूब क्षेत्र) के बैनर पर महापंचायत का आयोजन किया गया। इस महापंचायत में बांध के आसपास के गांवों के अलावा दूर-दूर से हजारों की संख्या में लोग जुटे। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार वहां सरेआम सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने और किसी भी कीमत पर नहरों में पानी नहीं खुलने देने के भड़काऊ बयान दिए गए।
दूसरी ओर, कमांड क्षेत्र के किसानों की एक महापंचायत 24 मई को सवाईमाधोपुर की वजीरपुर तहसील के गांव नयागांव धूनी में आयोजित की गई। कमांड एरिया के किसानों ने राजस्थान सरकार को चेतावनी दी है और चार प्रमुख मांगें रखी हैं कि कोर्ट के आदेशों की अनुपालना में कमांड एरिया की नहरों में बिना किसी देरी के तुरंत पानी छोड़ा जाए।
नहरों में पानी खोलने का विरोध करने वाले और महापंचायत में उपद्रव व भड़काऊ भाषण देने वाले उपद्रवियों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
पिछले 20 वर्षों से नहरों को बंद रखने और अदालती आदेशों की अवहेलना करने वाले दोषी अधिकारियों के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
20 वर्षों से कमांड एरिया के किसानों की भूमि असिंचित रहने के कारण जो 4000 करोड़ रुपए का आर्थिक नुकसान हुआ है, उसका उचित मुआवजा प्रत्येक प्रभावित किसान को दिया जाए।
हम अफसरों को पीछा छोड़ने वाले नहीं
ग्रामोत्थान संस्था के महासचिव महेंद्र सिंह मीना ने बताया कि हालांकि अनुपालना सुनवाई 26 मई को निर्धारित है। पांचना बांध की नहरों में पानी खोलने के संबंध में अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की है, लेकिन हम भी पीछा छोड़ने वाले नहीं है। पाँचना डैम की नहरों में पानी खुलवा कर ही दम लेंगे। यह धर्म युद्ध है। न्याय व सत्य की लड़ाई है।
महेंद्र सिंह मीणा के अनुसार हमने 23 मई को ही मुख्य सचिव, अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह), अतिरिक्त मुख्य सचिव (जल संसाधन), प्रिसिंपल सेक्रेटरी (ग्रामीण विकास), मुख्य इंजीनियर (जल संसाधन), संभागीय आयुक्त, भरतपुर, जिला कलेक्टर, करौली, जिला कलेक्टर, सवाईमाधोपुर, अधिशासी अभियन्ता (सिंचाई विभाग, करौली) को हाई कोर्ट के 1 मई 2026 व 23 अप्रैल 2026 के आदेश की अवमानना के लिए नोटिस ईमेल एवं स्पीड पोस्ट, दोनों से भेजे है। 26 मई की सुनवाई एवं कंटेम्ट नोटिसों के जवाब पर विचार-विमर्श करके कार्यवाही की जाएगी।
बांध पर 29 मई तक 39 गांवों का पहरा, हो रही निगरानी
दूसरी तरफ गुडला-पांचना संघर्ष समिति के अध्यक्ष अशोक सिंह धाबाई का कहना है कि पांचना बांध के पानी पर पहला हक हमारा है। इसलिए पहले बांध के समीप बसे 39 गांवों को पानी दिया जाए, फिर नहरों में पानी खोलने की सोचें।
धाबाई ने बताया कि बांध निर्माण के समय हमारी जमीने चली गई, कई गांवों को विस्थापन का दर्द झेलना पड़ा, हमें ही बांध का पानी नहीं मिल रहा है, यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने बताया कि कमांड एरिया की नहरों में पानी छोड़े जाने की आशंका में बांध के समीप के 39 गांव बारी-बारी से बांध पर निगरानी रखे हुए हैं। एक गांव के लोग दिन-रात निगरानी रखते है। 29 मई तक बांध पर निगरानी की ड्यूटी गांव वाइज लगाई गई है। इसके बाद आगे की समीक्षा की जाएगी।
आगे की राह
पांचना बांध का यह विवाद महज़ दो गुटों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह इस बात का उदाहरण है कि कैसे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी एक बेहतरीन बुनियादी ढांचे को कबाड़ में तब्दील कर सकती है।
वर्तमान में सरकार ने बजट में पांचना बांध के आसपास के वंचित गांवों में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के लिए ₹50 करोड़ का प्रावधान किया है, साथ ही ₹11.46 करोड़ से नहरों की मरम्मत का काम भी सिंचाई विभाग ने पूरा कर लिया है।
अब गेंद पूरी तरह से राजस्थान सरकार और स्थानीय प्रशासन के पाले में है। होने वाली अदालती सुनवाई सरकार के लिए अग्निपरीक्षा जैसी होगी। सरकार को एक तरफ जहां न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए नहरों में पानी छोड़ना होगा, वहीं दूसरी तरफ दोनों समाजों के बीच सामाजिक समरसता बनाए रखने के लिए भारी पुलिस बल और कड़े प्रशासनिक नियंत्रण की आवश्यकता होगी।
जानकारों का कहना है कि यदि समय रहते इस बारूद के ढेर पर पानी नहीं छिड़का गया तो पूर्वी राजस्थान में जल-क्रांति की जगह जल-संग्राम की स्थिति पैदा हो सकती है।
FAQs
पांचना बांध विवाद की मुख्य वजह क्या है और यह कब से चल रहा है?
पांचना बांध विवाद मुख्य रूप से बांध के कमांड क्षेत्र और डूब/अनकमांड क्षेत्र के किसानों के बीच पानी के अधिकार को लेकर है। यह विवाद पिछले 20 वर्षों (वर्ष 2005-2006 से) लगातार चला आ रहा है, जिसके कारण बांध भरा होने के बावजूद नहरों में पानी नहीं छोड़ा जा सका है।
इस विवाद में जातीय समीकरण किस तरह जुड़े हुए हैं?
इस जल-विवाद ने समय के साथ जातीय रूप ले लिया है। बांध का कमांड क्षेत्र मुख्य रूप से मीण बाहुल्य है, जो अदालती आदेशों के तहत अपने हक के पानी की मांग कर रहे हैं। डूब/अनकमांड क्षेत्र में मुख्य रूप से गुर्जर बाहुल्य आबादी है, जिनका स्टैंड है कि जब तक उनके खेतों और पशुओं के लिए पानी की व्यवस्था नहीं होती, वे नहरों को चालू नहीं होने देंगे।
इसी जातीय ध्रुवीकरण के कारण स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन कोई कड़ा फैसला लेने से बचता रहा है।
गुड़ला-पांचना लिफ्ट परियोजना क्या है और यह समाधान निकालने में विफल क्यों रही?
डूब क्षेत्र और नदी पेटे के 39 गैर-कमांड गांवों के किसानों के आक्रोश को शांत करने के लिए सरकार ने गुड़ला-पांचना लिफ्ट परियोजना शुरू की थी। इसके तहत बांध से पानी लिफ्ट करके इन गांवों तक पहुंचाना था। हालांकि, यह धरातल पर नाकाम साबित हुई क्योंकि इसका बुनियादी ढांचा बेहद लचर है।
इस 20 साल के गतिरोध के कारण किसानों को कितना आर्थिक नुकसान हुआ है?
आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1992 से 2005 तक इस बांध से नियमित सिंचाई होती थी, जिससे क्षेत्र में भारी समृद्धि थी। लेकिन पिछले दो दशकों से नहरें बंद होने के कारण लगभग 9,985 हेक्टेयर (करीब 40,000 बीघा) भूमि असिंचित पड़ी है। इससे कमांड क्षेत्र के सवा लाख किसानों को प्रतिवर्ष 200 करोड़ का नुकसान हो रहा है, जो अब तक कुल मिलाकर 4,000 करोड़ रुपए से अधिक की आर्थिक हानि में बदल चुका है।
राजस्थान हाई कोर्ट का इस मामले में क्या रुख है और ताजा घटनाक्रम क्या है?
राजस्थान हाई कोर्ट ने वर्ष 2022 में ही स्पष्ट आदेश दिया था कि नहरों में तुरंत पानी खोला जाए। सरकार द्वारा इसे लागू न कर पाने पर कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की गई। हाल ही में, 23 अप्रैल और 01 मई 2026 को खंडपीठ ने सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए अंतिम चेतावनी दी है और तीन सप्ताह का समय दिया है। इस मामले की अगली निर्णायक सुनवाई 26 मई 2026 को तय है। इसके कारण दोनों पक्षों में तनाव चरम पर है।
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