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Photograph: (the sootr)
News In Short
- राजेश कुशवाहा पेनल्टी के पैसे नहीं होने से नहीं निकल पा रहा था जेल से
- हाई कोर्ट ने पेनल्टी के एक लाख रुपए जमा करने की शर्त हटाई
- राजेश ने रिहाई नहीं होने को लेकर हाई कोर्ट की ली थी शरण
- कोर्ट में अधिवक्ताओं की हड़ताल पर जताई गहरी नाराजगी
- कोर्ट ने कहा, अधिकवक्ताओं को हड़ताल का अधिकार नहीं
News In Detail
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि अदालती आदेश के बावजूद गरीबी के कारण पेनल्टी जमा नहीं करने पर किसी व्यक्ति को जीवन जीने और स्वतंत्रता के संविधानिक अधिकार से वंचित नहीं​ किया जा सकता। कोर्ट ने कहा है कि सजा सस्पेंड करते समय कोर्ट कुछ शर्तें लगाती ही है। इन शर्तों में पैसा जमा करने की शर्त भी होती है। अगर अभियुक्त पैसा जमा करने की स्थिति में नहीं है तो, यह शर्त ना केवल उसके अपील करने के अधिकार को बेकार कर देती है, बल्कि यह जीवन जीने व स्वतंत्रता के संविधानिक अधिकार का उल्लंघन है।
रिहाई आदेश के बावजूद 3 महीने से जेल में
दरअसल, राजेश कुशवाह एनडीपीएस मामले में अजमेर जेल में 10 साल की सजा काट रहा है। वह अब तक सात साल 11 महीने की सजा भुगत चुका है। हाई कोर्ट ने 7 अक्टूबर,2025 को उसकी सजा सस्पेंड करके कुछ शर्तो के साथ रिहा करने के आदेश दिए थे। इसमें एक शर्त यह भी थी कि वह ट्रायल कोर्ट की लगाई गई एक लाख रुपए की पेनल्टी भी जमा करवाएगा।
पैसे नहीं थे तो नहीं हुआ रिहा
अपीलकर्ता राजेश गरीबी के कारण एक लाख रुपए जमा नहीं करवा पाया। रिहाई के आदेश के बावजूद वह तीन महीने से ज्यादा समय से जेल में ही है। शनिवार के पहले कार्यदिवस पर जस्टिस अनूप ढंड ने एक लाख रुपए की शर्त को हटा दिया और बाकी शर्तें पूरी करने पर रिहा करने के आदेश दिए हैं।
अधिकवक्ताओं को हड़ताल का अधिकार नहीं...
जस्टिस अनूप ढंड ने इस मामले में हड़ताल के कारण अपीलकर्ता और सरकार के अधिवक्ताओं के उपस्थित नहीं होने पर नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पूर्व कैप्टन हरीश उप्पल के मामले में तय कर चुका हैं कि अधिवक्ता हड़ताल तो क्या टोकन स्ट्राइक भी नहीं कर सकते और ना ही बॉयकॉट का आह्रान ही कर सकते हैं।
अधिवक्ता हड़ताल की आड़ में मुवक्किलों को बंधक भी नहीं बना सकते। अधिवक्ताओं की हड़ताल के कारण अदालती कार्रवाई रोकी नहीं जा सकती विशेषकर जेल में बंद कैदियों की व्यक्तिगत स्वत़ंत्रता के मामलों में।
काम नहीं करना समाधान नहीं
कोर्ट ने कहा है कि अधिवक्ता महीने में दो शनिवार को कार्यदिवस घोषित करने के विरोध में न्यायिक कार्यों का बहिष्कार कर रहे हैं। बार एसोसिएशन इसके विरोध में प्रतिवेदन दे चुकी हैं। इस पर विचार के लिए एक कमेटी भी बना दी है जिसकी रिपोर्ट आनी बाकी है।
लेकिन, हड़ताल करना और काम नहीं करना कोई समाधान नहीं है। हर समस्या का समाधान होता है। हर समस्या को बातचीत से सुलझाया जा सकता है।
जब स्वैच्छिक​ कर दिया तो फिर बहिष्कार क्यों
कोर्ट ने कहा है कि शनिवार की मुकदमों की लिस्ट में स्वेच्छा से व आग्रह करने पर पुराने मामलों की ही सुनवाई की व्यवस्था कर दी है तथा अधिवक्ताओं की उपस्थिति को अनिवार्य नहीं रखा है।
कोर्ट ने कहा है कि अधिवक्ताओं की हड़ताल से मुकदमा करने वालों के त्वरित न्याय के अधिकार का हनन है। एडवोकेट्स एमेंडमेंट बिल-2025 में भी अधिवक्ताओं के हड़ताल पर नहीं करने का प्रावधान किया है।
विरोध का अधिकार है लेकिन...
राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा है कि लोकतंत्र में सभी को विरोध करने तथा अपनी राय प्रकट करने का मूलभूत अधिकार है। लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल जनशांति को भंग किए बिना या न्याय के रास्ते में बाधा पहुंचाए बिना करना चाहिए। विरोध अहिंसात्मक होना चाहिए और अन्य नागरिकों के जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में संतुलन होना चाहिए। कोर्ट ने आदेश की प्रति प्रदेश की बार कौंसिल और बार कौंसिल आॅफ इंडिया केा भेजने को कहा है।
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