चांद पर पहुंच रहा भारत, लेकिन मरुधरा में नहीं बदली दलित दूल्हों की नियति

राजस्थान में सत्ता बदली, साल बदले, लेकिन दलित दूल्हों की नियति नहीं बदली। आज भी प्रदेश में दलितों का घोड़ी चढ़ना 'गुनाह' माना जा रहा है। डीग से लेकर मारवाड़ तक दबंगों की लाठियां कानून और खाकी पर भारी पड़ रही हैं।

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योगेन्द्र योगी@जयपुर

देश अपनी आजादी का अमृत काल मना रहा है। हम डिजिटल इंडिया, 5जी तकनीक और अंतरिक्ष में छलांग लगाने की बातें कर रहे हैं, लेकिन राजस्थान के गांवों में आज भी एक कड़वी सच्चाई धूल उड़ा रही है। सच्चाई यह है कि आजादी के 78 साल बाद भी प्रदेश के कई हिस्सों में 'सामंती मानसिकता' का पहरा है। यहां दलितों की बारातें आज भी सुरक्षित नहीं हैं। दबंगों की लाठियां और पत्थर तय करते हैं कि कौन घोड़ी चढ़ेगा और किसकी बिंदौली शांति से निकलेगी। आलम यह है कि खाकी वर्दी के साये में भी दलित दूल्हा खुद को असुरक्षित महसूस करता है।

​सत्ता बदली, पर नहीं बदली दबंगई

राजस्थान की सियासत में भले ही 5 साल में राज बदल जाता हो, लेकिन दलितों के प्रति सवर्ण मानसिकता का कठोर ढांचा टस से मस नहीं हो रहा। दबंगों को न कानून की परवाह है और न ही इस बात का डर कि सत्ता में कांग्रेस है या भाजपा। उनकी 'समानांतर सरकार' गांवों की गलियों में चलती है। डीग से लेकर जालौर और उदयपुर से लेकर झुंझुनूं तक घटनाओं का एक लंबा काला इतिहास है। 

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​पुलिस की मौजूदगी में 'खूनी संघर्ष'

​अभी हाल ही में 21 फरवरी को डीग जिले के बनी गांव में जो हुआ, वह रूह कंपा देने वाला है। एक दलित दूल्हे की बारात में आतिशबाजी क्या हुई, गांव के दबंगों ने उसे अपनी शान के खिलाफ मान लिया। देखते ही देखते खुशियों का माहौल चीख-पुकार में बदल गया। पथराव और लाठी-डंडों के उस खूनी संघर्ष में दुल्हन पक्ष के 6 लोग घायल होकर अस्पताल पहुंच गए। 
​हैरानी तो तब होती है जब पुलिस की मौजूदगी भी सुरक्षा की गारंटी नहीं बन पाती।

भरतपुर के नौगाया गांव की घटना इसका जीवंत प्रमाण है। वहां 100 पुलिसकर्मियों के घेरे में बिंदौली निकल रही थी, लेकिन दबंगों ने कानून की धज्जियां उड़ाते हुए पथराव कर दिया। पुलिस की गाड़ियां तोड़ दी गईं और बैंड की जगह लट्ठ बजने लगे। 

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​IPS और कांस्टेबल भी निशाने पर

​यह लड़ाई सिर्फ गरीबी या रुतबे की नहीं, बल्कि जातिगत श्रेष्ठता के अहंकार की है। फरवरी 2022 में जयपुर के शाहपुरा में एक दलित आईपीएस अधिकारी सुनील कुमार धनवंता को अपनी ही शादी में घोड़ी चढ़ने के लिए पुलिस छावनी का सहारा लेना पड़ा। अगर एसपी स्तर का अधिकारी अपने गांव में बिना सुरक्षा के घोड़ी नहीं चढ़ सकता, तो कल्पना कीजिए कि एक दिहाड़ी मजदूर दलित दूल्हे की क्या बिसात होगी?

यही कहानी उदयपुर के कांस्टेबल कमलेश मेघवाल की भी रही। कानून का सिपाही होने के बावजूद उसे डर था कि गांव के दबंग उसे घोड़ी से उतार देंगे। अंततः उसे अपने ही विभाग से सुरक्षा मांगनी पड़ी और दो थानों के जाप्ते के बीच उसकी शादी संपन्न हुई।

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घर छोड़ने को मजबूर परिवार

​करौली की एक घटना ने तो मानवता को भी शर्मसार कर दिया। 27 नवंबर 2025 में एक पीड़ित परिवार ने पुलिस अधीक्षक के सामने अपनी दास्तान सुनाते हुए कहा था, साहब! हड्डियां तोड़ दीं, कपड़े फाड़ दिए... अब वो जान से मार देंगे। दबंगों ने एक महिला को इस कदर पीटा कि उसे चार फ्रैक्चर हुए। आरोप है कि पुलिस ने हल्की धाराओं में केस दर्ज किया, जिससे आरोपी जमानत पर बाहर आ गए और पीड़ित परिवार को अपना घर छोड़कर दर-दर भटकना पड़ा। क्या इसे ही हम 'सभ्य समाज' कहेंगे?

​जहां घोड़ी छीन ले गए दबंग

​जालौर के सांचौर में 2025 में दबंगों ने मर्यादा की सारी हदें पार कर दीं। दूल्हा महज 50 फीट की दूरी तक घोड़ी पर बैठ पाया था कि दबंगों ने गाली-गलौच करते हुए उससे घोड़ी ही छीन ली और फरार हो गए। बाद में प्रशासन को दखल देना पड़ा और दोबारा रस्में पूरी कराई गईं। राजसमंद के झुठिया गांव में भी मंदिर के पास से बिंदौली निकालने पर मारपीट की गई। ये घटनाएं अपवाद नहीं, बल्कि एक पैटर्न बन चुकी हैं।

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उम्मीद की किरण: जहां समाज ने तोड़ी बेड़ियां

​हालांकि, इस स्याह मंजर के बीच कहीं-कहीं बदलाव की ताजी हवा भी महसूस होती है। राजस्थान के कुछ इलाकों में सामाजिक स्तर पर सराहनीय पहल हुई है:

​पाली (निम्बाड़ा): यहां राजपुरोहित समाज ने पहल करते हुए 550 साल पुरानी रूढ़िवादी परंपरा को तोड़ा और जून 2022 में बिना पुलिस सुरक्षा के दलित दूल्हे को घोड़ी पर बिठाया।

​अजमेर (लोहागल): यहां राजपूत समाज ने मिसाल पेश की और दलित बेटी साक्षी की बिंदौली घोड़ी पर निकलवाई।

बूंदी: तत्कालीन कलेक्टर रेनू जयपाल और एसपी जय यादव ने खुद दलित दूल्हे की बिंदौली पर पुष्प वर्षा कर एक कड़ा संदेश दिया कि प्रशासन समानता के साथ खड़ा है।

कानून की सख्ती और चेतना की दरकार

​आजादी के सात दशक बाद भी अगर किसी नागरिक को अपनी शादी के सबसे खुशी के पल के लिए 'पुलिस प्रोटेक्शन' मांगनी पड़े, तो यह हमारे लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है। केवल कानून बना देने से मानसिकता नहीं बदलती। इसके लिए कड़ी कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ उन 'सामंती किलों' को ढहाने की जरूरत है जो आज भी गांवों में अपनी अदालतें चलाते हैं।

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