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Photograph: (the sootr)
News In Short
- राजस्थान में गोशालाओं के पोषण में शराब की कमाई का भी योगदान
- राज्य सरकार शराब की हर बोतल पर वसलूती है गो-सेस
- भजनलाल सरकार के दो साल में शराब पर वसूला 1380 करोड़ गो-सेस
- राजस्थान में 3500 रजिस्टर्ड गोशाला, इन्हें मिलता है सरकार से अनुदान
- वसुंधरा सरकार के समय 2018 से शुरू हुई शराब पर गो-सेस की परंपरा
News In Detail
राजस्थान की सियासत व समाज में गाय भावनात्मक और महत्वपूर्ण विषय रही है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि मरुधरा में गोवंश के संरक्षण और संवर्धन के पीछे उन लोगों का भी बड़ा योगदान है, जो शाम ढलते ही मयखानों का रुख करते हैं? जी हां, यह सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन राजस्थान सरकार के आंकड़े यही हकीकत बयां कर रही है। राज्य में शराब की हर बोतल पर लगने वाला 'गो-सेस' आज प्रदेश की हज़ारों गौशालाओं की लाइफलाइन बन चुका है।
दो साल में शराब से मिला 1300 करोड़ गो-सेस
भजनलाल शर्मा सरकार के दो साल के कार्यकाल में शराब पर लगने वाले गो—सेस से 1380.70 करोड़ की कमाई हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्तीय ​वर्ष 2023-24 में शराब पर गो—सेस से 631.04 करोड़ आए। इसी तरह 2024-25 के दौरान गो—सेस की यह कमाई बढ़कर 749.66 करोड़ रुपए हो गई। हालांकि, सरकार ने दो साल में गोशालाओं को 2,339.54 करोड़ रुपए का अनुदान बांटा। अधिकारियों का कहना है कि इस अनुदान में स्टांप पेपर पर वसलू जाने वाले गो-सेस का हिस्सा भी रहा।
​क्या है यह 'गो-सेस' का गणित
​राजस्थान में गो-संरक्षण के लिए धन जुटाने का यह सिलसिला 23 जून 2018 को भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार के कार्यकाल में शुरू हुआ था। सरकार ने बाकायदा अधिसूचना जारी कर विदेशी शराब (IMFL), बीयर और देशी शराब पर 20 फीसदी का सरचार्ज लगा दिया। यह सरचार्ज शराब की मूल कीमत पर नहीं, बल्कि उस पर लगने वाले वैट (VAT) पर वसूला जाता है।
प्रदेश में 2018 के आखिर में सत्ता परिवर्तन हुआ, अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार आई। लेकिन गो-सेवा का यह वित्तीय मॉडल इतना सफल रहा कि इसे निरंतर जारी रखा गया। वर्तमान भाजपा सरकार ने भी इसे न केवल बरकरार रखा, बल्कि इसके दायरे और बजट को और विस्तार दिया है।
​कैसे पहुंचती है गोशालाओं तक मदद
​राजस्थान में गोसेवा केवल कागजों तक सीमित नहीं है। प्रदेश में 3,310 से 3,335 रजिस्टर्ड गोशालाएं हैं। इनमें लगभग 13.75 लाख गोवंश पल रहे हैं। इन गोशालाओं को चलाने के लिए सरकार 'गोपालन निदेशालय' के माध्यम से सीधा आर्थिक सहयोग देती है।
अनुदान की शर्तें और प्रक्रिया
गोपालन निदेशालय के अनुसार प्रदेश में अनुदान पाने के लिए गोशाला में कम से कम 100 गौ-वंश होना अनिवार्य है। यह पैसा दो से तीन चरणों में दिया जाता है। पहले गायों की फिजिकल गणना होती है, फिर उनके प्रकार (बछड़ा, बूढ़ी गाय आदि) के आधार पर राशि तय की जाती है।
​पिछले बजट में बड़ा उछाल
वर्ष 2025 के बजट में सरकार ने इस अनुदान राशि में 15 फीसदी की बढ़ोतरी कर गौ-पालकों को बड़ी राहत दी है। एक गौशाला को साल में अधिकतम 270 दिनों के लिए चारे-पानी का अनुदान दिया जाता है।
​सिर्फ चारा ही नहीं, छत भी दे रही सरकार
गोपालन निदेशालय के एक अधिकारी का कहना है कि ​सरकार का ध्यान सिर्फ गायों के पेट भरने पर नहीं, बल्कि उनके रहने की स्थिति सुधारने पर भी है। गोशाला विकास योजना के तहत अगर कोई गोशाला अपना बुनियादी ढांचा (शेड, पानी की टंकी, बाउंड्री वॉल) मजबूत करना चाहती है, तो सरकार उसे 10 लाख रुपए तक की एकमुश्त सहायता अलग से प्रदान करती है।
​सामाजिक-आर्थिक पहलू: अनोखा विरोधाभास
​ये आंकड़े राजस्थान के एक दिलचस्प सामाजिक विरोधाभास को भी दर्शाती है। एक तरफ शराब का सेवन स्वास्थ्य और समाज के लिए हानिकारक माना जाता है, वहीं दूसरी तरफ उसी शराब से प्राप्त राजस्व प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान यानी 'गो-माता' के संरक्षण का आधार बना हुआ है।
​आंकड़ों की माने तो
​2023-24 में: ₹631.04 करोड़ शराब पर गो—सेस से मिले, गोशालाओं को अनुदान ₹1122.86 करोड़ दिया गया।
​2024-25 में: ₹749.66 करोड़ शराब से गो—सेस से मिले। गोशालाओं को अनुदान ₹1216.28 करोड़ दिया गया।
नशामुक्ति के लिए सरचार्ज नहीं
मजेदार बात यह है कि प्रदेश में नशामुक्ति के लिए कोई सरचार्ज सरकारी स्तर पर नहीं वसूजा जाता है। विधानसभा में कांग्रेस विधायक रफीक खान के एक सवाल के जवाब में सरकार ने स्वीकार किया कि आबकारी विभाग को नशामुक्ति के लिए किसी प्रकार का सरचार्ज नहीं वसूला गया है। हाल ही में यह जवाब आबकारी विभाग से प्राप्त हुआ है।
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