नाता प्रथा पर हाई कोर्ट का अहम फैसला, रामप्यारी को मिलेगा पेंशन का अधिकार

राजस्थान हाई कोर्ट ने नाता प्रथा के तहत बड़ा फैसला सुनाते हुए महिला को पेंशन का अधिकार दिया। यह फैसला नाता प्रथा से जुड़ी महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।

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Purshottam Kumar Joshi
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Photograph: (the sootr)

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News In Short

  • राजस्थान हाई कोर्ट ने नाता प्रथा के तहत रामप्यारी को पति की मृत्यु के बाद पेंशन का अधिकार दिया।

  • रामप्यारी को पेंशन मिलने का रास्ता साफ हुआ, कोर्ट ने उन्हें वैधानिक पत्नी माना।

  • नाता प्रथा राजस्थान की पुरानी परंपरा है, जिसमें महिला को दूसरे पुरुष से संबंध बनाने की सहमति मिलती है।

  • रामप्यारी की कानूनी लड़ाई की जीत को एक महत्वपूर्ण फैसला माना जा रहा है।

  • रामप्यारी ने कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए आभार व्यक्त किया।

News In Detail

राजस्थान हाई कोर्ट ने नाता प्रथा के तहत पत्नी के तौर पर रह रही रामप्यारी को पति की मृत्यु के बाद पेंशन का अधिकार देने का मंगलवार को फैसला सुनाया। रामप्यारी ने 2022 में पेंशन के लिए याचिका दायर की थी। हकीकत में उसे 30 साल बाद न्याय मिला है। वह 1995 से अपने हक के लिए लड़ाई लड़ रही थी। नाता प्रथा में पत्नी के रुप में रहने वाली महिलाओं के लिए यह एक अहम फैसला है। यह फैसला उनके सामाजिक और आर्थिक अधिकारों को मान्यता देता है। 

रामप्यारी का मामला 

कोटा की रहने वाली रामप्यारी सुमन ने करीब 36 साल पहले सरकारी सेवा में तैनात पटवारी पूरनलाल सुमन के घर नाता प्रथा के तहत पत्नी के तौर पर प्रवेश किया था। यह तब हुआ जब पूरनलाल की पत्नी की मौत हो गई थी।  मौत के बाद समाज की सहमति से रामप्यारी को नाता प्रथा के तहत पूरनलाल के साथ बैठा दिया। रामप्यारी सुमन को एक बेटी हुई, लेकिन परिवार में होने वाले झगड़ों के कारण वह अपने पिता के घर वापस आ गईं।

रामप्यारी की कानूनी लड़ाई

रामप्यारी ने 1995 में अपनी बेटी और खुद की परवरिश के लिए पति से गुजारा भत्ता प्राप्त करने के लिए निचली अदालत में अर्जी दी थी। इसे अदालत ने मंजूर किया। इसके बाद 2020 में उनके पटवारी पति की मृत्यु हो गई और 2022 में रामप्यारी ने हाई कोर्ट में पेंशन के लिए याचिका दायर की थी। हाई कोर्ट ने उन्हें पति की वैधानिक पत्नी मानते हुए पेंशन का हक देने का फैसला किया।

नाता प्रथा की परिभाषा 

नाता प्रथा राजस्थान की एक सामाजिक परंपरा है। यह विशेष रूप से ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में प्रचलित है। इसमें महिला को पति से अलग होने के बाद समाज की सहमति से किसी अन्य पुरुष के साथ रहने की स्वतंत्रता मिलती है। इस संबंध को समाज में विवाह जैसा ही दर्जा दिया जाता है। इसका उद्देश्य महिला को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा देना माना जाता है।

हाई कोर्ट का फैसला

हाई कोर्ट के इस फैसले से रामप्यारी को पति की मृत्यु के बाद दी जाने वाली पेंशन का अधिकार मिल गया है। रामप्यारी ने इस फैसले का स्वागत करते हुए आभार व्यक्त किया और कहा, "मेरे अधिकार के लिए जो मैंने लड़ाई लड़ी, उसकी जीत हुई है। मैं अदालत का धन्यवाद करती हूं कि उन्होंने मेरी पीड़ा को समझा और न्याय दिया।" उन्होंने यह भी कहा कि, "मेरी तरह और भी महिलाएं अगर इस तरह परेशान होती हैं तो उन्हें भी न्याय मिलना चाहिए।"

नाता प्रथा के मुख्य पहलू:

  • इसे सामाजिक रूप से मान्य 'पुनर्विवाह' या 'सहमति से साथ रहना' (Live-in) माना जाता है। परंपरागत रूप से, यह विधवा या परित्यक्ता महिलाओं को नया जीवन शुरू करने का अवसर प्रदान करती थी।
  • जब एक विवाहित महिला किसी दूसरे पुरुष के साथ 'नाता' करती है, तो नए साथी को महिला के पूर्व पति या उसके परिवार को एक निश्चित राशि देनी पड़ती है, जिसे 'झगड़ा राशि' कहा जाता है। यह राशि समुदाय के पंचों द्वारा तय की जाती है।
  • इसे ब्राह्मण, वैश्य और राजपूत समाजों को छोड़कर अन्य कई जातियों जैसे गुर्जर, अहीर, और दलित समुदायों में मान्यता प्राप्त है। 

वर्तमान स्थिति और कानूनी दृष्टिकोण

  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इस प्रथा के दुरुपयोग (जैसे कि महिलाओं और नाबालिग लड़कियों की खरीद-फरोख्त) पर गहरी चिंता व्यक्त की है। आयोग ने इसे खत्म करने के लिए सख्त कानून बनाने का सुझाव दिया है।
  •  हाल की रिपोर्टों के अनुसार, नाता प्रथा के कारण कानूनी तलाक के दस्तावेजों की कमी होती है। इसमें प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) जैसी योजनाओं के लाभ मिलने में बाधा आती है क्योंकि रिकॉर्ड अपडेट नहीं हो पाते।
  • इस प्रथा के कारण कई बार बच्चों को अपनी मां से अलग होना पड़ता है, जिससे उनके पालन-पोषण और शिक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है

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