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Photograph: (the sootr)
News In Short
- राजस्थान में एनजीटी के आए सख्त आदेश कागजों तक हो रहे सीमित।
- अल्ट्राटेक सीमेंट के खिलाफ 1160 दिन से आंदोलन पर बैठे ग्रामीण।
- एनजीटी ने अल्ट्राटेक के खिलाफ दिया आदेश, पर हो कुछ नहीं रहा।
- सीमेंट प्लांट की ब्लॉस्टिंग ने आसपास के ग्रामीणों का छीना सुख-चैन
- अन्य मामलों में भी एनजीटी के आदेश नहीं कर पाए कमाल।
News In Detail
योगेंद्र योगी @ जयपुर
राजस्थान में जल, जमीन और जंगल बचाने के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) एक के बाद एक कड़े फैसले सुना रहा है, लेकिन विडंबना देखिए कि जंग खा चुकी सरकारी मशीनरी और रसूखदार लोगों के गठजोड़ के आगे ये आदेश दम तोड़ रहे हैं।
​कोटपूतली से लेकर भीलवाड़ा और अजमेर से लेकर अलवर तक प्रदेश की आबोहवा प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ रही है। हालात ये हैं कि एनजीटी के स्पष्ट आदेशों के बावजूद जनता को उन्हें लागू करवाने के लिए हजारों दिनों तक धरने पर बैठना पड़ रहा है।
​अल्ट्राटेक प्लांट पर 1160 दिन से धरना
​राजस्थान में कोटपूतली-बहरोड़ ज़िले में अल्ट्राटेक सीमेंट प्लांट के विरोध में जोधपुरा गेट पर तीन साल (1160 दिन) से ग्रामीण धरने पर बैठे हैं। इनके हाथों में तख्तियां और इनहेलर (दमा के रोगियों के लिए) हैं, जो इस क्षेत्र की भयावह स्थिति को बयां करते हैं। 3 नवंबर 2025 को एनजीटी ने अल्ट्राटेक सीमेंट प्लांट के खिलाफ सख्त आदेश जारी किए थे।
ट्रिब्यूनल ने साफ कहा था कि ​आबादी, स्कूल और मंदिर से 500 मीटर के दायरे में ब्लास्टिंग बंद हो। ​प्रभावित ग्रामीणों के स्वास्थ्य और घरों की क्षति के लिए मुआवजा (50,000 और 20,000 रुपये) दिया जाए। ​6 महीने के भीतर इलाके को 'ग्रीन बेल्ट' में बदला जाए।
​लेकिन, एनजीटी के आदेश के तीन महीने बीत जाने के बाद भी धरातल पर कुछ नहीं बदला है। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन कंपनी के दबाव में है। पुलिस के आश्वासनों के बावजूद ब्लास्टिंग जारी है। सवाल उठाया जा रहा है कि क्या एक कंपनी का मुनाफा हजारों ग्रामीणों की सांसों से ज्यादा कीमती है
​भूजल पर डाका, फिर भी कलेक्टरों पर असर नहीं
​प्रदेश में पानी का संकट किसी से छिपा नहीं है, लेकिन सरकारी नाक के नीचे भूजल की जो डकैती हुई, उसने तंत्र की पोल खोल दी है। वर्ष 2017 में 160 औद्योगिक क्षेत्रों में 460 ट्यूबवेल बिना केंद्रीय भूजल प्राधिकरण की अनुमति के खोद दिए गए। प्रशासन को कठोर कदम उठाने थे, लेकिन नहीं उठाए गए।
एक अनुमान के अनुसार इन ट्यूबवेलों से प्रतिदिन 6.90 करोड़ लीटर पानी का दोहन हो रहा है। सरकार को 1400 करोड़ रुपये से अधिक की राजस्व हानि हो रही है। ​एनजीटी ने बीकानेर के ताहिर हुसैन की याचिका पर सख्त नाराजगी जताते हुए 17 जिलों के कलेक्टरों को व्यक्तिगत शपथ पत्र पेश करने का नोटिस दिया है। जब कानून के रखवाले ही बिना अनुमति के धरती का सीना चीरने की छूट दे दें, तो आम आदमी से नियम पालन की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
​विकास के नाम पर 'हरियाली' की बलि
नेशनल हाईवे ऑथोरिटी (एनएचएआई) ने सड़कें तो चौड़ी कर दीं, लेकिन उसके बदले जो लाखों पेड़ (करीब 8.5 लाख) लगाए जाने थे, वे फाइलों में ही लहलहा रहे हैं। एनजीटी ने इस मामले पर एक फरवरी 2026 को वन विभाग की उदासीनता को आड़े हाथों लिया है। 19 मार्च 2026 को प्रधान मुख्य वन संरक्षक को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का अल्टीमेटम दिया गया है।
इसी तरह चित्तौड़गढ़ के बड़ा मगरा-गंगरार आरक्षित वन क्षेत्र में रेड कैटेगरी के उद्योगों (ईशान कॉपर इंडस्ट्रीज) की अवैध स्थापना और अलवर में वन भूमि के भीतर अवैध खनन यह बताने के लिए काफी है कि वन विभाग और खनन माफिया के बीच की साठगांठ कितनी गहरी है।
चित्तौड़गढ़ किला और खारी नदी का दम घुटता दम
​राजस्थान की शान चित्तौड़गढ़ किले को बचाने के लिए खुद सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। कोर्ट ने किले के 5 किलोमीटर के दायरे में ब्लास्टिंग पर रोक लगाई है, जिससे ऐतिहासिक स्मारकों को कंपन से बचाया जा सके। लेकिन क्या प्रशासन इसे सख्ती से लागू कर पाएगा?
वहीं केकड़ी जिले की खारी नदी का हाल और भी बुरा है। सैटेलाइट तस्वीरों ने साफ कर दिया है कि खनन पट्टों के कारण नदी का प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध हो गया है। एनजीटी ने अधिकारियों की रिपोर्टों पर गहरा असंतोष जताते हुए पूछा है कि आखिर नदी के रास्ते से अवरोध क्यों नहीं हटाए गए?
अजमेर का 'सेवन वंडर्स'
अजमेर के आनासागर वेटलैंड में बना 'सेवन वंडर्स पार्क' सरकारी लापरवाही का सबसे बड़ा उदाहरण बना। जनता के टैक्स के 12 करोड़ रुपये से बना यह पार्क अब मलबे में तब्दील हो चुका है। एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इसे इसलिए ढहाया गया, क्योंकि इसका निर्माण पर्यावरणीय नियमों को ताक पर रखकर आनासागर वेटलैंड में किया गया था। सवाल यह है कि जब यह बन रहा था, तब जिम्मेदार अधिकारी कहां थे? क्या जनता के पैसों की बर्बादी की भरपाई उन अधिकारियों के वेतन से नहीं होनी चाहिए?
​एनजीटी के आदेश बेअसर क्यों
​राजस्थान में एनजीटी के आदेशों की आधी-अधूरी पालना के पीछे कई गंभीर कारण हैं
​प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी: स्थानीय प्रशासन अक्सर बड़े औद्योगिक घरानों और खनन माफियाओं के प्रभाव में रहता है।
​कानूनी दांव-पेच: जब भी एनजीटी भारी जुर्माना लगाती है, सरकार या कंपनियां सुप्रीम कोर्ट से 'स्टे' ले आती हैं, जिससे मामला सालों तक लटक जाता है।
निगरानी तंत्र का फेल होना: प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और वन विभाग केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित रह गए हैं।
​प्राथमिकताओं का टकराव: सरकारें पर्यावरण संरक्षण के बजाय औद्योगिक विकास को तरजीह देती हैं, भले ही उसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़े।
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