राजस्थान में खाद की ऑनलाइन बिक्री पर लगी रोक, 23 दिन में ही 17 खामियां आईं सामने
समझें क्या है पूरा मामला
- राजस्थान में खाद की ऑनलाइन बिक्री व्यवस्था पर लगी रोक।
- 18 जिलों में 23 दिन में 5.20 लाख क्विंटल खाद बिकी।
- कृषि विभाग ने एफएफएस व्यवस्था में 17 खामियां बताईं।
- दूसरे के खसरे पर खाद खरीदने जैसी गड़बड़ियां सामने आईं।
- रबी सीजन में खाद संकट की आशंका से सरकार सतर्क।
राजस्थान में खाद की ऑनलाइन बिक्री व्यवस्था पर रोक लगा दी गई है। यह व्यवस्था प्रदेश के 18 जिलों में लागू की गई थी। 23 दिन में ही 5.20 लाख क्विंटल यूरिया और डीएपी बिक गया। कृषि विभाग को आगामी रबी सीजन में खाद की किल्लत का डर है। विभाग ने 17 खामियां गिनाते हुए केंद्र सरकार को पत्र भेजा है।
किसानों को आसानी से खाद मिले इसके लिए सरकार ने ऑनलाइन बिक्री शुरू की थी। पर यह व्यवस्था एक महीना भी नहीं चल सकी। अब इसे अगले आदेश तक स्थगित कर दिया गया है। इस व्यवस्था का नाम फ्रेमवर्क फॉर फर्टिलाइजर सेल यानी एफएफएस है। इसके जरिए 23 दिन में 5.20 लाख क्विंटल यूरिया और डीएपी बिक गया। इतनी तेज बिक्री देखकर सरकार ने कदम पीछे खींच लिए।
क्यों लगानी पड़ी रोक
कम समय में इतनी ज्यादा खाद बिकने से कृषि विभाग चिंता में आ गया। विभाग को आशंका है कि इसी रफ्तार से खरीद होती रही तो आगे खाद कम पड़ सकती है। सबसे बड़ी चिंता आगामी रबी सीजन को लेकर है। रबी में गेहूं, सरसों और चने जैसी फसलें बोई जाती हैं। इन फसलों के लिए यूरिया और डीएपी की भारी मांग रहती है। ऐसे में पहले ही स्टॉक खत्म होना किसानों के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है।
केंद्र को भेजा पत्र
कृषि विभाग की प्रमुख शासन सचिव मंजू राजपाल ने केंद्र सरकार को पत्र लिखा है। इसमें एफएफएस व्यवस्था की 17 खामियां और समस्याएं गिनाई गई हैं।
दूसरे के खसरे पर खरीद
पत्र में सबसे गंभीर खामी खसरा नंबर से जुड़ी बताई गई है। खसरा नंबर जमीन की पहचान का सरकारी नंबर होता है। खाद की मात्रा आमतौर पर जमीन के हिसाब से तय की जाती है। ऑनलाइन व्यवस्था में एक किसान दूसरे किसान के खसरा नंबर पर भी खाद खरीद सकता था। यानी कोई भी दूसरे की जमीन दिखाकर ज्यादा खाद ले सकता था। इससे भी बड़ी दिक्कत यह थी कि गलत खसरा जुड़ने पर उसे हटाया नहीं जा सकता था। ऐप में इसका कोई विकल्प ही नहीं था। ऐसे में असली जमीन मालिक का हिस्सा दूसरे के खाते में जा सकता था।
सरकारी केंद्रों की जमीन गायब
एक और खामी सरकारी संस्थानों से जुड़ी है। कृषि विज्ञान केंद्रों की जमीन ऑनलाइन बुकिंग में दिखाई ही नहीं दे रही थी। अनुसंधान केंद्रों की जमीन भी सिस्टम में उपलब्ध नहीं थी। इन केंद्रों पर खेती से जुड़े प्रयोग और बीज उत्पादन का काम होता है। इन्हें भी खाद की जरूरत पड़ती है। पर ऑनलाइन व्यवस्था में इनके लिए बुकिंग संभव नहीं थी।
ऐप में बार-बार अटके किसान
किसानों और खाद विक्रेताओं को ऐप में कई तकनीकी दिक्कतें आईं। खरीद के समय स्क्रीन पर बार-बार एरर मैसेज आते रहे। कई बार संदेश आया कि इस क्यूआर कोड के लिए कोई वैध बुकिंग नहीं मिली। कहीं डीलर का स्टॉक ब्लॉक दिखा। कहीं उपलब्ध मात्रा से ज्यादा खरीद का संदेश आया। कुछ मामलों में क्यूआर कोड प्रतिनिधि या दूसरे मोड में बुक बताया गया। कई बार बुकिंग की कोशिश को ही संदिग्ध गतिविधि बता दिया गया। इन दिक्कतों से किसानों को दुकानों पर घंटों इंतजार करना पड़ा।
किन जिलों में थी व्यवस्था
ऑनलाइन खरीद पहले प्रयोग के तौर पर राजसमंद और सिरोही में शुरू हुई थी। इसके बाद 25 अगस्त को पांच और जिलों में इसे लागू किया गया। इनमें बांसवाड़ा, चित्तौड़गढ़, चूरू, धौलपुर और बूंदी शामिल थे। 27 अगस्त को 11 जिले और जोड़े गए। ये जिले थे बारां, दौसा, हनुमानगढ़, डूंगरपुर, जालोर और झालावाड़। करौली, कोटा, प्रतापगढ़, सवाई माधोपुर और टोंक में भी व्यवस्था शुरू हुई। इस तरह कुल 18 जिलों में खाद ऑनलाइन बिक रही थी। अब इन सभी जिलों में यह व्यवस्था रुक गई है।
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