धरे रह गए नेताओं के दावे, दोनों ही दलों में प्रत्याशी चयन के लिए समय के हिसाब से बदलती दिखी रणनीति
Pratibha Rana | Nov 01, 2023, 24:00 IST
धरे रह गए नेताओं के दावे, दोनों ही दलों में प्रत्याशी चयन के लिए समय के हिसाब से बदलती दिखी रणनीति
राजस्थान के विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया, उनका चयन और सूचियां जारी करने की टाइमिंग को देखा जाए तो साफ दिख रहा हैं।
मनीष गोधा@ JAIPUR.
प्रत्याशी का जिताऊ होना एकमात्र मापदंड
आइए देखते हैं कैसे धराशाई होते दिख रहे हैं दावे....
जल्द घोषित होंगे प्रत्याशी
सर्वे और कार्यकर्ताओं का फीडबैक
बीजेपी ने किया 51 विधायकों को रिपीट
नेताओं का प्रभाव
उधर भाजपा में चुनाव के दौरान और पहली सूची में हाशिए पर दिख रही पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे दूसरी सूची के बाद मुख्य धारा में आती दिखी। इस सूची में लगभग दो दर्जन नाम उनके समर्थकों के थे। जबकि पहले माना जा रहा था कि इस बार वसुंधरा राजे के समर्थकों को बहुत ज्यादा अहमियत नहीं मिलेगी। पहली सूची में उनके नजदीकी माने जाने वाले राजपाल सिंह जैसे नेताओं के टिकट कटने से इस बात के संकेत मिले भी थे लेकिन दूसरी सूची ने प्रत्याशी चयन में वसुंधरा राजे के प्रभाव को स्पष्ट कर दिया।
उम्र और परिवारवाद
वहीं बीजेपी की बात करें तो यहां भी पिछला चुनाव हारे हुए करीब 17 लोगों को फिर से मैदान में उतार दिया गया है। वहीं 70 साल से कम उम्र वाले भी तीन टिकट दिए गए है। हालांकि उम्र के आधार पर ही छह बार की विधायक सूर्यकांका व्यास का टिकट काट दिया गया है। वही परिवारवाद की बात करें तो पार्टी अब तक 11 ऐसे प्रत्याशियों को टिकट दे चुकी है, जो किसी न किसी नेता के रिश्तेदार हैं।
दल बदलुओं को टिकट
वहीं भाजपा की बात करें तो चंद्र मोहन मीणा, ज्योति मिर्धा, सुभाष महरिया वो प्रमुख नाम हैं जो चुनाव से कुछ समय पहले पार्टी में शामिल हुए और टिकट पा गए। अभी पार्टी की एक बड़ी सूची बाकी है, उसमें कुछ और नए नाम जुड़ सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि चुनाव के दौरान रणनीति में स्थितियों को देखते हुए बदलाव करना कई बार जरूरी हो जाता है, वही इस चुनाव में भी होता दिख रहा है, लेकिन यह सही है कि इस बार दोनों ही दलों में प्रत्याशियों के चयन में कोई खास मापदंड नजर नहीं आ रहे हैं।
कितना सफल होगा प्रयोग ?
राजनीतिक विश्लेषक जगदीश शर्मा ने कहा कि कांग्रेस के करीब 150 और बीजेपी के 120 उम्मीदवारों की सूची साफ दिखाती है कि पार्टियां जिन सिद्धांतों की बातें कर रही थी वे सब कहने की बातें थीं। उम्मीदवार तो नेता जी की समझ से ही बनाए जाएंगे। हांलाकि दोनों ही दलों के नेताओं को कहना पड़ रहा है कि जिताऊ का चुनाव करना मजबूरी है। बीजेपी ने पहली सूची, जिसमें 7 सांसदों को मैदान में उतारा था, वो प्रयोग कितना सफल होगा, देखना है। कांग्रेस में मुख्यमंत्री गहलोत की चली है जिससे सूची में उन तमाम नेताओं के टिकट दिए गए, जिन्होंने पिछले चुनाव में में कांग्रेस के ही अधिकृत प्रत्याशी को हराया था। गंभीर इनकंबैंसी के होते हुए भी उन्हें 'ओब्लाइज' करना बताता है कि गहलोत संकट के समय मदद करने वालों के साथ खड़े हैं, भले ही पार्टी हार जाए।
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