प्यासा राजस्थान! पाताल से पानी खत्म, क्या अगली पीढ़ी को मिलेगा सिर्फ सूखा

राजस्थान में भूजल दोहन की तस्वीर भयावह है। हम हर साल 4.23 बीसीएम यानी 4.23 अरब घनमीटर ज्यादा पानी जमीन से निकाल रहे हैं। कड़वा सच यह है कि हम भावी पीढ़ी के लिए जल बिन जमीन छोड़ने की तैयारी में लगे हैं।

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Jinesh Jain
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Photograph: (the sootr)

News In Short

  • सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हर साल 12.87 बीसीएम पानी वापस जाता है जमीन में।
  • हम हर साल पानी जमीन से खींच रहे हैं 17.10 बीसीएम यानी 17.10 अरब घनमीटर पानी।
  • प्रदेश में 4.23 बीसीएम यानी 4.23 अरब घनमीटर ज्यादा पानी निकाल रहे जमीन से।
  • अगर भूजल दोहन की यही रफ्तार रही तो भावी पीढ़ी रह जाएगी प्यासी। 
  • प्रदेश के कई जिलों में जमीन से 800 से 1000 फीट की गहराई पर जा चुका पानी।

News In Detail

राजस्थान की धरती के भीतर दबा 'अमृत' अब खत्म होने की कगार पर है। हम उस मोड़ पर खड़े हैं, जहां नल खोलते समय आने वाली पानी की आवाज भविष्य में सिर्फ एक याद बनकर रह सकती है। हालिया सरकारी आंकड़ों ने राजस्थान की जल स्थिति की जो भयावह तस्वीर पेश की है, वह न केवल डराने वाली है, बल्कि यह बताने के लिए काफी है कि हम अपने बच्चों का हिस्सा आज ही पी रहे हैं।

आंकड़ों का मायाजाल और कड़वी सच्चाई

  • हर साल बारिश और अन्य स्रोतों से जमीन के अंदर करीब 12.87 बीसीएम पानी वापस जाता है। 
  • ​हम कितना निकाल रहे हैं? हम हर साल 17.10 बीसीएम पानी जमीन से खींच रहे हैं।
  • ​घाटा कितना है? हर साल हम अपनी 'जमा जल पूंजी' से करीब 4.23 बीसीएम ज्यादा पानी निकाल रहे हैं। ​

यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आपकी आमदनी 12 रुपण् हो और आप हर महीने 17 रुपये खर्च कर रहे हों। यह 5 रुपये का घाटा ही है, जो आज राजस्थान के कुओं और बोरवेल को सुखा रहा है।

8 करोड़ की आबादी पर क्या है असर

​अगर हम राजस्थान की लगभग 8 करोड़ (800 लाख) आबादी के हिसाब से इस पानी की खपत को देखें, तो आंकड़े रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं:

प्रति व्यक्ति घाटा: राजस्थान का हर नागरिक साल भर में अपनी सीमा से 52,800 लीटर ज्यादा पानी जमीन से निकाल रहा है, जिसे प्रकृति वापस नहीं भर पा रही है।

लाख करोड़ का गणित: प्रदेश में सालाना 17.10 लाख करोड़ लीटर पानी निकाला जा रहा है। अगर इसे प्रदेश की 8 करोड़ जनता में बराबर बांट दिया जाए, तो हर व्यक्ति के हिस्से में सालाना 2,13,750 लीटर पानी आता है।

संकट की गहराई: चूंकि खेती में सबसे ज्यादा पानी (लगभग 90%) खर्च होता है, इसलिए पीने के लिए मिलने वाला पानी अब 'लॉटरी' जैसा हो गया है। आज प्रदेश के कई जिलों में 800 से 1000 फीट की गहराई पर भी पानी नहीं मिल रहा है।

अन्नदाता के लिए 'अग्निपरीक्षा' ​

राजस्थान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है, लेकिन आज यही क्षेत्र सबसे बड़े संकट में है। 

​बढ़ती लागत: पानी के लिए किसान गहरे बोरवेल करवा रहे हैं। 1000 फीट गहरा बोरवेल करवाने में लाखों का खर्च आता है, जो छोटे किसान के बस की बात नहीं।

सूखती जमीन: कई इलाकों में भूजल स्तर इतना गिर गया है कि जमीन के नीचे अब पत्थर निकल रहे हैं। इससे आने वाले 10 सालों में राजस्थान के कई हिस्सों में खेती बंद होने की कगार पर पहुंच जाएगी।

​स्वास्थ्य पर हमला: पानी नहीं, 'जहर' पी रहे हैं हम

​जब हम जमीन की आखिरी परतों से पानी खींचते हैं, तो वह केवल पानी नहीं होता। आंकड़ों के अनुसार, जैसे-जैसे जलस्तर गिर रहा है, वैसे-वैसे पानी में फ्लोराइड, नाइट्रेट और भारी धातुओं की मात्रा बढ़ रही है।

​राजस्थान के आधे से ज्यादा जिलों में फ्लोराइड की समस्या है, जिससे हड्डियां टेढ़ी होना (फ्लोरोसिस) और दांतों का खराब होना आम बात हो गई है। ​कम पानी मतलब ज्यादा खारापन। यह पानी न केवल शरीर को बीमार कर रहा है, बल्कि जमीन को भी बंजर बना रहा है।

​क्यों हो रहा है ऐसा (प्रकृति बनाम मानव)

​राजस्थान का 60% हिस्सा रेगिस्तान है। यहां बारिश पहले से ही कम होती है। लेकिन संकट प्राकृतिक से ज्यादा 'मानव निर्मित' है:

परंपराओं को भूलना: हमने टांके, बावड़ी और कुओं जैसी पुरानी जल संचयन प्रणालियों को त्याग दिया और सिर्फ मशीनों (बोरवेल) पर निर्भर हो गए।

​फसल चक्र: कम पानी वाले प्रदेश में हम ऐसी फसलें उगा रहे हैं जिनमें पानी की खपत बहुत ज्यादा है।

​शहरी बर्बादी: शहरों में गाड़ियों को धोने से लेकर सड़कों की सफाई तक में भूजल का अंधाधुंध दुरुपयोग हो रहा है।

​147% दोहन का मतलब क्या

​सरकार ने राजस्थान को 'ओवर-एक्सप्लॉइटेड' (अति-दोहित) श्रेणी में रखा है। 147% दोहन दर का मतलब है कि हम विनाश की तरफ डेढ़ गुना तेजी से भाग रहे हैं। अगर आज हमने लगाम नहीं लगाई, तो 2030-35 तक राजस्थान के कई प्रमुख शहर 'डे ज़ीरो' का सामना करेंगे, जहाँ नलों में बूंद भर पानी नहीं होगा।

​समाधान: अब नहीं तो कभी नहीं

​आंकड़े डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए हैं। राजस्थान के पास अब सिर्फ तीन रास्ते बचे हैं:

​बूंद-बूंद सिंचाई : खेती में फव्वारा और ड्रिप सिस्टम अनिवार्य करना होगा।

वर्षा जल संचयन : हर घर और हर खेत में बारिश के पानी को सहेजने का ढांचा बनाना होगा।

​सामुदायिक जिम्मेदारी: पानी को 'मुफ्त की वस्तु' समझना बंद करना होगा।

द सूत्र अलार्म

राजस्थान की 8 करोड़ आबादी के लिए यह अलार्म बेल है। 17.10 बीसीएम का दोहन हमें प्यास की उस आग की ओर ले जा रहा है जिसे बुझाना नामुमकिन होगा। याद रखिए, सोना-चांदी खरीदने के लिए पैसे मिल सकते हैं, लेकिन जमीन के नीचे खत्म हो चुके पानी को कोई भी दौलत वापस नहीं ला सकती।

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