भाजपा में राजेंद्र राठौड़ का सियासी कद घट रहा या बढ़ रही दूरियां? खुद को लोकसभा-राज्यसभा में मौका नहीं, अब पराक्रम सिंह के टिकट पर भी पेच
Raghvendra Singh Rathore | Oct 22, 2026, 18:35 IST
2023 में विधानसभा चुनाव हारे राजेंद्र राठौड़ को लोकसभा और राज्यसभा में मौका नहीं मिला।
राजेंद्र राठौड़ की राजनीतिक वापसी पर सवाल। लोकसभा-राज्यसभा में मौका नहीं मिला, सतीश पूनिया को बड़ी जिम्मेदारियां मिलीं। अब पराक्रम के जिला परिषद टिकट पर विवाद।
राजस्थान भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ की राजनीतिक वापसी फिर चर्चा में है। 2023 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद उन्हें लोकसभा और राज्यसभा में मौका नहीं मिला। बेटे पराक्रम सिंह ने RCA चुनाव से नामांकन वापस लिया था। अब जिला परिषद में भी पराक्रम की टिकट पर भी खींचतान सामने आई है।
राजस्थान की राजनीति में राजेंद्र राठौड़ का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। सात बार विधायक, कई बार मंत्री और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे राठौड़ लंबे समय तक भाजपा की राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे। सदन में सरकार को घेरना हो या संगठन के लिए चुनावी रणनीति बनाना, उनकी भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है।
लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव में तारानगर से मिली हार के बाद उनकी राजनीतिक यात्रा में एक ऐसा मोड़ आया, जहां से वापसी का रास्ता अब तक साफ नहीं हो पाया है। भाजपा सत्ता में लौट आई, लेकिन राठौड़ विधानसभा से बाहर हो गए। इसके बाद लोकसभा चुनाव हुए, राज्यसभा के लिए उम्मीदवार चुने गए और संगठन में कई नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां मिलीं।
राठौड़ को भी चुनावी और संगठनात्मक काम सौंपे गए, लेकिन सदन में वापसी का मौका नहीं मिला। दिलचस्प बात यह है कि उनके साथ 2023 का विधानसभा चुनाव हारे सतीश पूनिया अब राज्यसभा सांसद हैं। उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महामंत्री भी बनाया जा चुका है। दूसरी ओर राठौड़ अब भी अपनी संसदीय वापसी का इंतजार कर रहे हैं।
इसी बीच बेटे पराक्रम सिंह राठौड़ की राजनीतिक दावेदारी को लेकर दो घटनाएं सामने आईं। पहले राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) के अध्यक्ष पद से पराक्रम ने नामांकन वापस लिया। अब चूरू जिला परिषद चुनाव में उनके टिकट को लेकर भाजपा के भीतर खींचतान सामने आई है। ऐसे में सवाल केवल एक जिला परिषद सीट का नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि राजस्थान भाजपा में राजेंद्र राठौड़ की राजनीतिक भूमिका किस दिशा में जा रही है।
बुधवार, 21 अक्टूबर को जयपुर स्थित भाजपा प्रदेश मुख्यालय में पंचायत चुनाव के तीसरे चरण के उम्मीदवारों को लेकर रायशुमारी चल रही थी। चूरू जिला परिषद के टिकटों पर चर्चा के दौरान राजेंद्र राठौड़ ने बेटे पराक्रम सिंह राठौड़ और बहू कनिका सिंह की उम्मीदवारी का मामला उठाया।
बैठक में कनिका सिंह के टिकट पर सहमति जताई गई, लेकिन पराक्रम का टिकट फिलहाल होल्ड रखने की बात हुई। इसी पर राठौड़ ने नाराजगी जताई। उन्होंने सवाल उठाया कि RCA चुनाव में भी पराक्रम पीछे रह गए थे, अब जिला परिषद में उनका टिकट कब तक रोका जाएगा।
राठौड़ ने एक ही परिवार से कई लोगों को टिकट दिए जाने का मुद्दा भी उठाया। उनका तर्क था कि वे अपने क्षेत्र के चुनावी समीकरण अच्छी तरह समझते हैं और जानते हैं कि चुनाव कैसे जीता जाता है। बैठक में मौजूद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने राठौड़ की वरिष्ठता और उनके सुझावों को महत्व देने की बात कही। इसके बाद मामला शांत हुआ।
बैठक में नाराजगी सामने आने के बाद भी राजेंद्र राठौड़ ने सार्वजनिक तौर पर पार्टी के खिलाफ कोई मोर्चा नहीं खोला। 22 अक्टूबर को टिकट विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि वे पार्टी लाइन के खिलाफ जाने वाले नेता नहीं हैं।
उनका यह रुख भाजपा के भीतर उनकी राजनीतिक शैली को भी दर्शाता है। राठौड़ अपनी बात संगठन के सामने मजबूती से रखते रहे हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से पार्टी अनुशासन को महत्व देते हैं। जून 2026 में जब राज्यसभा के लिए सतीश पूनिया और अलका गुर्जर को उम्मीदवार बनाया गया था, तब भी राठौड़ ने दोनों नेताओं के चयन का स्वागत किया था।
राठौड़ को राजनीतिक अवसर नहीं मिलने के बावजूद उन्होंने संगठन के फैसलों के खिलाफ सार्वजनिक नाराजगी जाहिर करने से परहेज किया। लेकिन चूरू जिला परिषद टिकट पर हुई चर्चा यह बताती है कि संगठन के भीतर दावेदारी और असहमति के सवाल अब भी मौजूद हैं।
राजेंद्र राठौड़ ने 2023 का विधानसभा चुनाव तारानगर से लड़ा था। कांग्रेस के नरेंद्र बुडानिया ने उन्हें 10 हजार से अधिक वोटों से हराया। यह हार उनके राजनीतिक जीवन के लिए बड़ा झटका थी।
राठौड़ इससे पहले लगातार कई चुनाव जीत चुके थे। भाजपा की सरकारों में मंत्री रहे और विपक्ष में पार्टी की आवाज बने। लेकिन जिस चुनाव में भाजपा ने राजस्थान की सत्ता वापस हासिल की, उसी चुनाव में राठौड़ विधानसभा नहीं पहुंच सके।
भाजपा ने भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाया। सरकार में कई नए चेहरों को जिम्मेदारी मिली। पुराने नेताओं की भूमिका भी बदली। राठौड़ के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी सदन में वापसी। उनके राजनीतिक अनुभव को देखते हुए लोकसभा या राज्यसभा के जरिए वापसी की संभावनाओं पर चर्चा होती रही, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हो पाया।
2024 के लोकसभा चुनाव में राजेंद्र राठौड़ का नाम राजसमंद सीट से संभावित उम्मीदवार के तौर पर चर्चा में आया था। उनके बेटे पराक्रम सिंह राठौड़ ने दावा किया कि उनके पिता राजसमंद से चुनाव लड़ना चाहते थे। स्थानीय विधायकों ने भी उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में पार्टी नेतृत्व को लिखा था।
लेकिन भाजपा ने राजसमंद से महिमा कुमारी मेवाड़ को उम्मीदवार बनाया। यह फैसला पार्टी की चुनावी रणनीति का हिस्सा था। किसी नेता को टिकट नहीं मिलने के पीछे कई राजनीतिक और स्थानीय कारण हो सकते हैं। फिर भी राठौड़ जैसे वरिष्ठ नेता की लोकसभा चुनाव में दावेदारी आगे नहीं बढ़ने से उनकी संसदीय वापसी का एक अवसर निकल गया।
राजेंद्र राठौड़ और सतीश पूनिया की राजनीतिक स्थिति की तुलना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों 2023 का विधानसभा चुनाव हारे थे। पूनिया आमेर से चुनाव नहीं जीत सके, जबकि राठौड़ तारानगर से हारे।
इसके बाद भाजपा ने पूनिया को हरियाणा का प्रभारी बनाया। हरियाणा में भाजपा की सरकार बनने के बाद उनकी संगठनात्मक भूमिका और मजबूत हुई। जून 2026 में भाजपा ने सतीश पूनिया और अलका गुर्जर को राजस्थान से राज्यसभा भेजा। इसके बाद अगस्त में पूनिया को राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया। उन्हें पंजाब का प्रभार भी मिला।
इस तरह विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद पूनिया की राजनीति राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ी। दूसरी ओर राठौड़ को राज्यसभा में मौका नहीं मिला। यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों नेता राजस्थान भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष या विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष जैसे बड़े पदों पर रह चुके हैं।
राजेंद्र राठौड़ के बेटे पराक्रम सिंह राठौड़ सितंबर 2026 में राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद के दावेदार बने थे। उन्होंने चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया। उनके पास जिला क्रिकेट संघों का समर्थन होने का दावा भी सामने आया।
लेकिन 28 सितंबर को पराक्रम ने अपना नामांकन वापस ले लिया। उस समय पराक्रम ने कहा था कि वे पार्टी और सरकार के स्तर पर बनी सहमति का सम्मान कर रहे हैं। उन्होंने किसी दबाव में नामांकन वापस लेने से इनकार किया था।
उन्होंने बृजकिशोर उपाध्याय के समर्थन में चुनाव से पीछे हटने का फैसला किया। अब पंचायत चुनाव में पराक्रम ने चूरू जिला परिषद के वार्ड 39 से नामांकन दाखिल किया है। उनकी पत्नी कनिका सिंह ने वार्ड 23 से नामांकन भरा है।
लेकिन पराक्रम के टिकट पर भाजपा की रायशुमारी में तत्काल सहमति नहीं बन सकी। दोनों घटनाओं में एक समानता दिखाई देती है। पराक्रम की राजनीतिक दावेदारी सामने आई, लेकिन अंतिम फैसला संगठन के स्तर पर तय हुआ। हालांकि, RCA चुनाव और जिला परिषद टिकट विवाद को किसी एक राजनीतिक साजिश का हिस्सा बताने का प्रमाण नहीं है।
चूरू जिला परिषद टिकट पर विवाद का एक दूसरा पहलू भी है। राजेंद्र राठौड़ अपने बेटे और बहू दोनों को चुनाव मैदान में उतारना चाहते हैं। लेकिन संगठन के सामने स्थानीय कार्यकर्ताओं की दावेदारी और एक ही परिवार को कई टिकट देने का सवाल भी है।
भाजपा में परिवारवाद को लेकर सार्वजनिक रूप से सख्त राजनीतिक रुख अपनाया जाता रहा है। ऐसे में प्रभावशाली नेताओं के परिवारों को टिकट देने के फैसले पार्टी के लिए संवेदनशील हो सकते हैं। राठौड़ ने बैठक में दूसरे राजनीतिक परिवारों को एक से अधिक टिकट मिलने का मुद्दा उठाया।
लेकिन संगठन के सामने चूरू और शेखावाटी के स्थानीय समीकरण भी हैं। यदि एक ही परिवार से दो लोगों को टिकट दिया जाता है तो दूसरे दावेदार नाराज हो सकते हैं। वहीं किसी वरिष्ठ नेता के परिवार की उम्मीदवारी रोकने से भी असंतोष पैदा हो सकता है।
राजेंद्र राठौड़ को भाजपा ने पूरी तरह संगठन से अलग नहीं किया है। पंचायत चुनावों में उन्हें चुनावी जिम्मेदारियां मिली हैं। संगठन और सरकार से जुड़े अन्य कार्यों में भी उनकी भूमिका रही है।
पराक्रम सिंह ने दावा किया था कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने उनके पिता को कैबिनेट मंत्री के दर्जे वाले पदों का प्रस्ताव भी दिया था, लेकिन उन्होंने इन्हें स्वीकार नहीं किया। इससे राठौड़ की राजनीतिक स्थिति का एक दूसरा पहलू सामने आता है। यदि संगठन उन्हें जिम्मेदारियां दे रहा है और वे कुछ पदों को स्वीकार नहीं कर रहे, तो उनकी मौजूदा स्थिति को केवल पार्टी की उपेक्षा के रूप में नहीं देखा जा सकता।
राजेंद्र राठौड़ की राजनीति का बड़ा आधार चूरू और आसपास का क्षेत्र रहा है। ऐसे में जिला परिषद चुनाव में बेटे पराक्रम और बहू कनिका सिंह की दावेदारी केवल पारिवारिक मामला नहीं है।
इससे यह भी पता चलेगा कि स्थानीय टिकट वितरण में राठौड़ के सुझावों को संगठन कितना महत्व देता है। अगर पराक्रम को टिकट मिलता है तो यह उनके सक्रिय चुनावी सफर की नई शुरुआत हो सकती है। अगर टिकट नहीं मिलता तो RCA के बाद यह दूसरा अवसर होगा, जब उनकी उम्मीदवारी आगे नहीं बढ़ पाएगी।
राजस्थान भाजपा में 2023 के बाद नेतृत्व का नया दौर शुरू हुआ है। भजनलाल शर्मा सरकार चला रहे हैं। सतीश पूनिया राष्ट्रीय संगठन और संसद में भूमिका निभा रहे हैं। कई दूसरे नेताओं को भी नई जिम्मेदारियां मिली हैं। इस बदले हुए राजनीतिक माहौल में राजेंद्र राठौड़ की स्थिति अलग दिखाई देती है।
वे सक्रिय हैं, संगठन में उनकी भूमिका है और पार्टी के चुनावी फैसलों में उनकी राय ली जा रही है। लेकिन उनकी संसदीय वापसी को लेकर अब भी अनिश्चितता है। बेटे के टिकट पर सामने आई नाराजगी ने इसी राजनीतिक स्थिति को फिर चर्चा में ला दिया है।
राठौड़ के लिए यह केवल परिवार की अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाने का सवाल नहीं है। उनके सामने अपने लंबे राजनीतिक अनुभव और प्रभाव के अनुरूप भूमिका बनाए रखने की चुनौती भी है। दूसरी ओर भाजपा के सामने यह तय करने का सवाल है कि वह अपने अनुभवी नेताओं और नए नेतृत्व के बीच संतुलन किस तरह बनाए।
2023 की एक चुनावी हार ने राठौड़ की राजनीति समाप्त नहीं की है। लेकिन उसके बाद हुए फैसलों ने उनकी भूमिका जरूर बदल दी है। अब चूरू जिला परिषद चुनाव और आने वाले संगठनात्मक फैसले बताएंगे कि राजेंद्र राठौड़ की राजनीति का अगला अध्याय किस दिशा में बढ़ता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा उन्हें फिर सदन की राजनीति में लौटने का अवसर देगी, या उनका अनुभव संगठन और चुनावी रणनीति तक ही सीमित रहेगा?
लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव में तारानगर से मिली हार के बाद उनकी राजनीतिक यात्रा में एक ऐसा मोड़ आया, जहां से वापसी का रास्ता अब तक साफ नहीं हो पाया है। भाजपा सत्ता में लौट आई, लेकिन राठौड़ विधानसभा से बाहर हो गए। इसके बाद लोकसभा चुनाव हुए, राज्यसभा के लिए उम्मीदवार चुने गए और संगठन में कई नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां मिलीं।
राठौड़ को भी चुनावी और संगठनात्मक काम सौंपे गए, लेकिन सदन में वापसी का मौका नहीं मिला। दिलचस्प बात यह है कि उनके साथ 2023 का विधानसभा चुनाव हारे सतीश पूनिया अब राज्यसभा सांसद हैं। उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महामंत्री भी बनाया जा चुका है। दूसरी ओर राठौड़ अब भी अपनी संसदीय वापसी का इंतजार कर रहे हैं।
इसी बीच बेटे पराक्रम सिंह राठौड़ की राजनीतिक दावेदारी को लेकर दो घटनाएं सामने आईं। पहले राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) के अध्यक्ष पद से पराक्रम ने नामांकन वापस लिया। अब चूरू जिला परिषद चुनाव में उनके टिकट को लेकर भाजपा के भीतर खींचतान सामने आई है। ऐसे में सवाल केवल एक जिला परिषद सीट का नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि राजस्थान भाजपा में राजेंद्र राठौड़ की राजनीतिक भूमिका किस दिशा में जा रही है।
बेटे का टिकट होल्ड हुआ तो राठौड़ ने उठाए सवाल
बैठक में कनिका सिंह के टिकट पर सहमति जताई गई, लेकिन पराक्रम का टिकट फिलहाल होल्ड रखने की बात हुई। इसी पर राठौड़ ने नाराजगी जताई। उन्होंने सवाल उठाया कि RCA चुनाव में भी पराक्रम पीछे रह गए थे, अब जिला परिषद में उनका टिकट कब तक रोका जाएगा।
राठौड़ ने एक ही परिवार से कई लोगों को टिकट दिए जाने का मुद्दा भी उठाया। उनका तर्क था कि वे अपने क्षेत्र के चुनावी समीकरण अच्छी तरह समझते हैं और जानते हैं कि चुनाव कैसे जीता जाता है। बैठक में मौजूद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने राठौड़ की वरिष्ठता और उनके सुझावों को महत्व देने की बात कही। इसके बाद मामला शांत हुआ।
सार्वजनिक बयान में फिर दिखा पार्टी अनुशासन
उनका यह रुख भाजपा के भीतर उनकी राजनीतिक शैली को भी दर्शाता है। राठौड़ अपनी बात संगठन के सामने मजबूती से रखते रहे हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से पार्टी अनुशासन को महत्व देते हैं। जून 2026 में जब राज्यसभा के लिए सतीश पूनिया और अलका गुर्जर को उम्मीदवार बनाया गया था, तब भी राठौड़ ने दोनों नेताओं के चयन का स्वागत किया था।
राठौड़ को राजनीतिक अवसर नहीं मिलने के बावजूद उन्होंने संगठन के फैसलों के खिलाफ सार्वजनिक नाराजगी जाहिर करने से परहेज किया। लेकिन चूरू जिला परिषद टिकट पर हुई चर्चा यह बताती है कि संगठन के भीतर दावेदारी और असहमति के सवाल अब भी मौजूद हैं।
2023 की हार के बाद बदली राठौड़ की राजनीतिक स्थिति
राठौड़ इससे पहले लगातार कई चुनाव जीत चुके थे। भाजपा की सरकारों में मंत्री रहे और विपक्ष में पार्टी की आवाज बने। लेकिन जिस चुनाव में भाजपा ने राजस्थान की सत्ता वापस हासिल की, उसी चुनाव में राठौड़ विधानसभा नहीं पहुंच सके।
भाजपा ने भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाया। सरकार में कई नए चेहरों को जिम्मेदारी मिली। पुराने नेताओं की भूमिका भी बदली। राठौड़ के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी सदन में वापसी। उनके राजनीतिक अनुभव को देखते हुए लोकसभा या राज्यसभा के जरिए वापसी की संभावनाओं पर चर्चा होती रही, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हो पाया।
लोकसभा चुनाव में राजसमंद से उम्मीदवारी की थी चर्चा
लेकिन भाजपा ने राजसमंद से महिमा कुमारी मेवाड़ को उम्मीदवार बनाया। यह फैसला पार्टी की चुनावी रणनीति का हिस्सा था। किसी नेता को टिकट नहीं मिलने के पीछे कई राजनीतिक और स्थानीय कारण हो सकते हैं। फिर भी राठौड़ जैसे वरिष्ठ नेता की लोकसभा चुनाव में दावेदारी आगे नहीं बढ़ने से उनकी संसदीय वापसी का एक अवसर निकल गया।
राज्यसभा में पूनिया को मौका, राठौड़ फिर रह गए बाहर
इसके बाद भाजपा ने पूनिया को हरियाणा का प्रभारी बनाया। हरियाणा में भाजपा की सरकार बनने के बाद उनकी संगठनात्मक भूमिका और मजबूत हुई। जून 2026 में भाजपा ने सतीश पूनिया और अलका गुर्जर को राजस्थान से राज्यसभा भेजा। इसके बाद अगस्त में पूनिया को राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया। उन्हें पंजाब का प्रभार भी मिला।
इस तरह विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद पूनिया की राजनीति राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ी। दूसरी ओर राठौड़ को राज्यसभा में मौका नहीं मिला। यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों नेता राजस्थान भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष या विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष जैसे बड़े पदों पर रह चुके हैं।
RCA में पराक्रम ने नाम वापस लिया, अब जिला परिषद में भी पेच
लेकिन 28 सितंबर को पराक्रम ने अपना नामांकन वापस ले लिया। उस समय पराक्रम ने कहा था कि वे पार्टी और सरकार के स्तर पर बनी सहमति का सम्मान कर रहे हैं। उन्होंने किसी दबाव में नामांकन वापस लेने से इनकार किया था।
उन्होंने बृजकिशोर उपाध्याय के समर्थन में चुनाव से पीछे हटने का फैसला किया। अब पंचायत चुनाव में पराक्रम ने चूरू जिला परिषद के वार्ड 39 से नामांकन दाखिल किया है। उनकी पत्नी कनिका सिंह ने वार्ड 23 से नामांकन भरा है।
लेकिन पराक्रम के टिकट पर भाजपा की रायशुमारी में तत्काल सहमति नहीं बन सकी। दोनों घटनाओं में एक समानता दिखाई देती है। पराक्रम की राजनीतिक दावेदारी सामने आई, लेकिन अंतिम फैसला संगठन के स्तर पर तय हुआ। हालांकि, RCA चुनाव और जिला परिषद टिकट विवाद को किसी एक राजनीतिक साजिश का हिस्सा बताने का प्रमाण नहीं है।
परिवारवाद का सवाल, संगठन के सामने भी चुनौती
भाजपा में परिवारवाद को लेकर सार्वजनिक रूप से सख्त राजनीतिक रुख अपनाया जाता रहा है। ऐसे में प्रभावशाली नेताओं के परिवारों को टिकट देने के फैसले पार्टी के लिए संवेदनशील हो सकते हैं। राठौड़ ने बैठक में दूसरे राजनीतिक परिवारों को एक से अधिक टिकट मिलने का मुद्दा उठाया।
लेकिन संगठन के सामने चूरू और शेखावाटी के स्थानीय समीकरण भी हैं। यदि एक ही परिवार से दो लोगों को टिकट दिया जाता है तो दूसरे दावेदार नाराज हो सकते हैं। वहीं किसी वरिष्ठ नेता के परिवार की उम्मीदवारी रोकने से भी असंतोष पैदा हो सकता है।
जिम्मेदारियां मिलीं, लेकिन सदन में वापसी का रास्ता साफ नहीं
पराक्रम सिंह ने दावा किया था कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने उनके पिता को कैबिनेट मंत्री के दर्जे वाले पदों का प्रस्ताव भी दिया था, लेकिन उन्होंने इन्हें स्वीकार नहीं किया। इससे राठौड़ की राजनीतिक स्थिति का एक दूसरा पहलू सामने आता है। यदि संगठन उन्हें जिम्मेदारियां दे रहा है और वे कुछ पदों को स्वीकार नहीं कर रहे, तो उनकी मौजूदा स्थिति को केवल पार्टी की उपेक्षा के रूप में नहीं देखा जा सकता।
क्या चूरू का चुनाव राठौड़ के प्रभाव की परीक्षा बनेगा?
इससे यह भी पता चलेगा कि स्थानीय टिकट वितरण में राठौड़ के सुझावों को संगठन कितना महत्व देता है। अगर पराक्रम को टिकट मिलता है तो यह उनके सक्रिय चुनावी सफर की नई शुरुआत हो सकती है। अगर टिकट नहीं मिलता तो RCA के बाद यह दूसरा अवसर होगा, जब उनकी उम्मीदवारी आगे नहीं बढ़ पाएगी।
राठौड़ की राजनीति का अगला अध्याय क्या होगा?
वे सक्रिय हैं, संगठन में उनकी भूमिका है और पार्टी के चुनावी फैसलों में उनकी राय ली जा रही है। लेकिन उनकी संसदीय वापसी को लेकर अब भी अनिश्चितता है। बेटे के टिकट पर सामने आई नाराजगी ने इसी राजनीतिक स्थिति को फिर चर्चा में ला दिया है।
राठौड़ के लिए यह केवल परिवार की अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाने का सवाल नहीं है। उनके सामने अपने लंबे राजनीतिक अनुभव और प्रभाव के अनुरूप भूमिका बनाए रखने की चुनौती भी है। दूसरी ओर भाजपा के सामने यह तय करने का सवाल है कि वह अपने अनुभवी नेताओं और नए नेतृत्व के बीच संतुलन किस तरह बनाए।
2023 की एक चुनावी हार ने राठौड़ की राजनीति समाप्त नहीं की है। लेकिन उसके बाद हुए फैसलों ने उनकी भूमिका जरूर बदल दी है। अब चूरू जिला परिषद चुनाव और आने वाले संगठनात्मक फैसले बताएंगे कि राजेंद्र राठौड़ की राजनीति का अगला अध्याय किस दिशा में बढ़ता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा उन्हें फिर सदन की राजनीति में लौटने का अवसर देगी, या उनका अनुभव संगठन और चुनावी रणनीति तक ही सीमित रहेगा?
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