रितु बराला केस: जयपुर पुलिस ने क्यों नहीं दर्ज की जीरो FIR? जानिए कानून क्या कहता है
Mukesh Sharma | Oct 21, 2026, 18:27 IST
क्या है जीरो FIR
रितु बराला के साथ मारपीट का मामला कानूनी और राजनीतिक बहस का कारण बन गया है। कांग्रेस ने इस मामले में जीरो FIR दर्ज करने की मांग की थी, लेकिन पुलिस ने इनकार कर दिया। धरने के बाद कांग्रेस ने अदालत जाने का निर्णय लिया है। जीरो FIR का उद्देश्य महिलाओं और बच्चों की शिकायतों को जल्दी दर्ज करना है।
NSUI की राष्ट्रीय सचिव रितु बराला से दिल्ली में कथित मारपीट का मामला राजस्थान में कानूनी और राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया है। कांग्रेस जयपुर में जीरो FIR दर्ज करने की मांग कर रही थी, लेकिन पुलिस ने इससे इनकार कर दिया। करीब 43 घंटे तक चला कांग्रेस का धरना बुधवार को खत्म हो गया। अब पार्टी ने अदालत जाने का फैसला किया है। इस विवाद के बीच सवाल उठ रहा है कि जीरो FIR क्या है, पुलिस इसे कब दर्ज कर सकती है और इनकार होने पर पीड़ित के पास कौन से कानूनी रास्ते हैं।
भारत में जीरो नंबर FIR की शुरुआत वर्ष 2012 के बहुचर्चित निर्भया कांड के बाद हुई थी। महिलाओं के खिलाफ अपराधों में त्वरित न्याय के लिए जस्टिस जे.एस.वर्मा समिति ने इसकी सिफारिश की थी।
जीरो FIR एक ऐसी FIR है जिसे कोई भी पुलिस स्टेशन, चाहे उसका अधिकार क्षेत्र कुछ भी हो, किसी संज्ञेय अपराध के बारे में शिकायत मिलने पर दर्ज कर सकता है ।
दर्ज करते समय इसका नियमित FIR नंबर नहीं दिया जाता है।
जीरो FIR दर्ज करने के बाद इसे उस संबंधित पुलिस स्टेशन में ट्रांसफर कर दिया जाता है,जिसके अधिकार क्षेत्र में वास्तव में अपराध घटित हुआ हो। वहां इसे नियमित नंबर देकर आगे की जांच शुरू की जाती है।
इसका उद्देश्य गंभीर अपराध के पीड़ितों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों को, एक पुलिस स्टेशन से दूसरे पुलिस स्टेशन जाए बिना जल्दी और आसानी से शिकायत दर्ज कराने में मदद करना है।
जीरो FIR जस्टिस वर्मा कमेटी की सिफारिश के बाद शुरू की गई थी। जीरो FIR के नियम को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के अलग-अलग फैसलों का भी सपोर्ट मिला है।
उदाहरण के लिए, ललिता कुमारी बनाम UP सरकार (2014) मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब किसी संज्ञेय अपराध के होने की जानकारी मिलती है, तो FIR दर्ज करना ज़रूरी है।
सतविंदर कौर बनाम राज्य (1999) मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि एक महिला को घटना स्थल के अलावा किसी भी अन्य स्थान से अपनी शिकायत दर्ज करवाने का अधिकार है।
पहले यह प्रक्रिया अदालती फैसलों और दिशा-निर्देशों के आधार पर चलती थी। अब भारतीय कानून में बदलाव के तहत भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 173 में इसे कानूनी रूप से स्पष्ट किया है।
BNSS की धारा 173 पुरानी CrPC की धारा 154 की जगह आई है। यह संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की स्थिति में पुलिस द्वारा प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने के नियमों,शून्य एफआईआर (Zero FIR), और इलेक्ट्रॉनिक शिकायतों से संबंधित है।
अपराध कहीं भी हुआ हो, शिकायतकर्ता देश के किसी भी पुलिस स्टेशन में जाकर एफआईआर दर्ज करा सकते हैं। पुलिस प्राथमिक जांच के बाद इसे संबंधित थाने में ट्रांसफर कर देती है।
अपराध की सूचना मौखिक (बोलकर) या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम (ईमेल, व्हाट्सएप, ऑनलाइन पोर्टल) से दी जा सकती है।
यदि डिजिटल/इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से शिकायत दी है,तो तीन दिनों के भीतर थाने जाकर उस पर हस्ताक्षर करने होंगे,अन्यथा वह निष्क्रिय (deactivate) हो सकती है।
एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद शिकायतकर्ता को इसकी एक प्रति मुफ्त में दी जाती है।
महिलाओं के खिलाफ अपराध (जैसे यौन उत्पीड़न आदि) होने पर उसकी सूचना सिर्फ महिला पुलिस अधिकारी ही दर्ज करेंगी।
यदि अपराध 3 साल से 7 साल तक की सजा वाला है, तो डीएसपी की अनुमति से अधिकतम 14 दिनों की प्रारंभिक जांच की जा सकती है कि मामला प्रथम दृष्टया बनता है या नहीं।
पुलिस थाना FIR दर्ज न करे तो लिखित या डाक के जरिए एसपी को शिकायत भेज सकते हैं।
पुलिस के FIR दर्ज करने से इंकार करने पर पीड़ित BNSS की धारा-223 के तहत संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट की अदालत में शिकायत कर सकते हैं।
मजिस्ट्रेट को शिकायतकर्ता के बयान लेने के बाद यदि लगता है कि अपराध हुआ है, तो वह आरोपी को बुलाकर जांच के बाद मुकदमा शुरू कर सकता है।
मजिस्ट्रेट BNSS की धारा 175(3) के तहत संबंधित पुलिस थाने को FIR दर्ज करने व जांच करने के आदेश दे सकता है। बशर्ते मजिस्ट्रेट शिकायत व सबूतों से संतुष्ट हो। इस आदेश के बाद पुलिस के लिए एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है।
निचली अदालत से राहत नहीं मिलने पर नागरिक भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट जा सकते हैं। हाईकोर्ट पुलिस को अपनी कानूनी ड्यूटी निभाने और शिकायत पर FIR दर्ज करके निष्पक्ष अनुसंधान करने के आदेश दे सकता है।
नहीं कर सकती
राजस्थान हाईकोर्ट के एडवोकेट कपिल गुप्ता का कहना है कि यदि रितु बराला का परिवाद दिल्ली पुलिस के संबंधित थाने में ले लिया है तो जयपुर पुलिस धारा 173(1) में FIR दर्ज नहीं कर सकती। यदि दिल्ली पुलिस FIR नहीं करती है तो शिकायतकर्ता को संबंधित मजिस्ट्रेट कोर्ट में जाना होगा। लेकिन,रितु बराला की ओर से यह काउंटर FIR होगी, इसलिए इस दृष्टिकोण से जयपुर पुलिस चाहती तो जीरो नंबर की FIR दर्ज करके दिल्ली संबंधित पुलिस थाने को भेज सकती है।
क्या है जीरो FIR शुरु कैसे हुई ?
जीरो FIR एक ऐसी FIR है जिसे कोई भी पुलिस स्टेशन, चाहे उसका अधिकार क्षेत्र कुछ भी हो, किसी संज्ञेय अपराध के बारे में शिकायत मिलने पर दर्ज कर सकता है ।
दर्ज करते समय इसका नियमित FIR नंबर नहीं दिया जाता है।
जीरो FIR दर्ज करने के बाद इसे उस संबंधित पुलिस स्टेशन में ट्रांसफर कर दिया जाता है,जिसके अधिकार क्षेत्र में वास्तव में अपराध घटित हुआ हो। वहां इसे नियमित नंबर देकर आगे की जांच शुरू की जाती है।
क्या है जीरो FIR उद्देश्य
सुप्रीम कोर्ट से भी मिला सपोर्ट
उदाहरण के लिए, ललिता कुमारी बनाम UP सरकार (2014) मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब किसी संज्ञेय अपराध के होने की जानकारी मिलती है, तो FIR दर्ज करना ज़रूरी है।
सतविंदर कौर बनाम राज्य (1999) मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि एक महिला को घटना स्थल के अलावा किसी भी अन्य स्थान से अपनी शिकायत दर्ज करवाने का अधिकार है।
अब है कानून
BNSS की धारा 173 पुरानी CrPC की धारा 154 की जगह आई है। यह संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की स्थिति में पुलिस द्वारा प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने के नियमों,शून्य एफआईआर (Zero FIR), और इलेक्ट्रॉनिक शिकायतों से संबंधित है।
क्या हैं धारा 173 के प्रावधान
शून्य एफआईआर Zero FIR - धारा 173(1)
मौखिक या इलेक्ट्रॉनिक सूचना
इलेक्ट्रॉनिक शिकायत नियम
निःशुल्क कॉपी
महिलाओं से जुड़े अपराध
प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry):
एसपी को आवेदन (धारा 173(4))
FIR दर्ज न हो तो जा सकते हैं कोर्ट
मजिस्ट्रेट को शिकायतकर्ता के बयान लेने के बाद यदि लगता है कि अपराध हुआ है, तो वह आरोपी को बुलाकर जांच के बाद मुकदमा शुरू कर सकता है।
पुलिस को FIR दर्ज करने का निर्देश
हाईकोर्ट में याचिका
नहीं कर सकती जयपुर पुलिस जीरो FIR दर्ज
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