सचिन पायलट और अन्य विधायकों की अयोग्यता वाले मामले में फिर से विचार करने से हाई कोर्ट का इनकार
News In Short
- सचिन पायलट व अन्य विधायकों की अयोग्यता मामले में पुनर्विचार से भी इनकार।
- कांग्रेस नेता सचिन पायलट व अन्य को स्पीकर ने दिए थे अयोग्य घोषित करने के नोटिस।
- जुलाई 2020 में स्पीकर के नोटिस पर हुए थे यथास्थिति के आदेश।
- दिसंबर 2023 में याचिका को सारहीन होने के आधार पर किया था खारिज।
News In Detail
राजस्थान हाईकोर्ट ने सचिन पायलट व अन्य विधायकों को अयोग्यता संबंधी नोटिस के खिलाफ दायर याचिका को खारिज करने के आदेश पर पुनर्विचार करने से इनकार कर दिया है। एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा व जस्टिस शुभा मेहता ने यह आदेश मोहनलाल नामा की याचिका खारिज करते हुए दिए।
यह है पूरा मामला
दरअसल, जुलाई 2020 में हुए राजनीतिक ड्रामे के दौरान तत्कालीन विधानसभा स्पीकर सीपी जोशी ने सचिन पायलट व अन्य विधायकों को अयोग्य घोषित करने के नोटिस दिए थे। स्पीकर ने यह नोटिस पार्टी व्हिप का उल्लंघन करने पर दिए थे।
पायलट व उनके साथ के विधायकों ने इन नोटिस को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकेार्ट ने मामले में यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए थे। स्पीकर सीपी जोशी ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी जो अब तक लंबित है।
19 दिसंबर, 2023 को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता विधायकों की ओर से कहा गया कि राज्य में 16 वीं विधानसभा गठित हो चुकी है। ऐसे में याचिका सारहीन हो चुकी है। इसे चलाने का कोई अर्थ नहीं है। इस पर अदालत ने याचिका को सारहीन होने के आधार पर खारिज कर दिया था।
कानूनी बिंदू तय करने चाहिए
मोहनलाल नामा ने 19 दिसंबर, 2023 के आदेश पर पुनर्विचार करने के लिए याचिका दायर की थी। उनका कहना था कि उन्हें सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। मामले में कोर्ट ने ही विचार के लिए 13 बिंदू तय किए थे।
इन कानूनी बिंदूओं को तय किए बिना याचिका खारिज करना सही नहीं है। मामले में संविधान का 10 वें अनुच्छेद के साथ ही दल-बदल कानून भी शामिल है। राजस्थान के नागरिक इससे प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित हैं। इसलिए याचिका पर पुनर्विचार किया जाए और मेरिट पर सुनवाई की जाए।
कोई जरुरत नहीं
हाई कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए कहा है कि 19 दिसंबर, 2023 के आदेश से साफ है कि मामला सारहीन हो चुका है। इसलिए इसे चलाने की जरुरत नहीं है। आदेश में कोई भी गलती नहीं है। वैसे भी पुनर्विचार का स्कोप बेहद सीमित है और पुनर्विचार याचिका की आड़ में मामले में नए सिरे से सुनवाई नहीं हो सकती।
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