राजस्थान के इस गांव में कभी हाथ उठाकर चुने जाते थे सरपंच, रस्सी के इस पार या उस पार खड़े होकर होता था फैसला
Ashish Bhardwaj | Oct 23, 2026, 17:06 IST
राजस्थान में हाथ उठाकर चुने जाते थे सरपंच
आज पंचायत चुनाव में प्रचार, बैनर, पोस्टर, चुनाव चिह्न और मतदान केंद्रों पर लंबी कतारें दिखती हैं। लेकिन कभी राजस्थान के गांवों में चुनाव का तरीका कभी इतना सादा हुआ करता था कि प्रत्याशी की जीत का फैसला लोगों के उठे हुए हाथों से हो जाता था। तो कहीं मैदान में बंधी रस्सी के दूसरी तरफ जाकर प्रत्याशी के पक्ष में खड़े हो जाते थे।
मतदान का फैसला होता था सबके सामने
चौपाल पर जुटते थे ग्रामीण, हाथ उठाकर होता था फैसला
चुनाव अधिकारी लोगों से कहते थे कि जिस प्रत्याशी को वोट देना चाहते हैं, उसके समर्थन में हाथ उठाएं। हर उम्मीदवार के लिए अलग-अलग हाथ उठवाए जाते थे। जिस प्रत्याशी के पक्ष में ज्यादा लोग हाथ उठाते, उसे विजयी घोषित कर दिया जाता था।
इस तरीके में मतदान सबके सामने होता था। यानी किसने किस उम्मीदवार का समर्थन किया, यह छिपा नहीं रहता था। आज की तरह गोपनीय मतदान की व्यवस्था से यह तरीका काफी अलग था।
बीच में रस्सी बांधते, फिर दो पाले बन जाते
इसके बाद गांव के लोग जिस उम्मीदवार को पसंद करते, वे रस्सी पार करके उसके पक्ष में जाकर खड़े हो जाते थे। चुनाव का नतीजा इस बात से तय होता था कि किस प्रत्याशी के पाले में ज्यादा लोग जुटे।
यह तरीका देखने में बेहद सरल था। न मशीन की जरूरत, न मतपत्रों की गिनती और न ही मतदान की लंबी प्रक्रिया। समर्थकों की संख्या देखकर ही जीत-हार तय कर दी जाती थी। हालांकि, ये तरीके संबंधित बुजुर्गों की यादों पर आधारित हैं। इन्हें राजस्थान के हर गांव में लागू एक समान चुनावी नियम नहीं माना जा सकता।
चुनाव प्रचार में न बैनर, न लाउडस्पीकर का शोर
चाय-पानी से लेकर लोगों के बैठने तक की व्यवस्था गांव वाले मिलकर कर लेते थे। चुनाव केवल उम्मीदवार की जीत-हार का मामला नहीं होता था, बल्कि ग्रामीणों के एक साथ आने का अवसर भी बनता था।
हार-जीत के बाद भी बना रहता था भाईचारा
आज पंचायत चुनावों में प्रचार का तरीका बदल गया है। संचार के नए साधन, सोशल मीडिया और चुनावी रणनीतियों ने गांवों की राजनीति को नया रूप दिया है। इसके बावजूद स्थानीय मुद्दे और आपसी रिश्ते अब भी अहम भूमिका निभाते हैं।
राजस्थान में 1960 में हुए थे पहले आम चुनाव
करीब छह दशक में राजस्थान के पंचायत चुनावों का स्वरूप काफी बदल चुका है। लेकिन पुराने ग्रामीणों की ये यादें बताती हैं कि गांवों के लोकतंत्र की शुरुआती यात्रा कई जगह कितने सादे और सामुदायिक तरीकों से आगे बढ़ी थी।
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