जमीन की फोटो और सर्वे नंबर
90 करोड़ की जमीन में पुलिस ड्राइवर फिरोज के साथ संभागायुक्त, SDM, तहसीलदार, गुंडा, भूमाफिया सब ऐसे लिंक
Sanjay Gupta | Oct 23, 2026, 16:08 IST
पुलिस ड्राइवर फिरोज से अफसर और भूमाफिया तक की पूरी कहानी।
इंदौर और उज्जैन लोकायुक्त ने 14 अक्टूबर को संयुक्त कार्रवाई की थी। टीम ने पुलिस ड्राइवर फिरोज खान के ठिकानों पर छापा मारा था। जांच में 48 अचल संपत्तियों की जानकारी सामने आई थी। इनकी कीमत करीब 65 करोड़ रुपए बताई गई है। सबसे ज्यादा चर्चा 90 करोड़ रुपए की जमीन के सौदे की है। चलिए बताते हैं क्या है पूरा मामला...
फिरोज खान पुलिस प्रशिक्षण महाविद्यालय में ड्राइवर आरक्षक है। उसके खिलाफ हुई कार्रवाई कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। जमीन खरीदने के लिए उसके पास इतनी रकम कहां से आई? संयुक्त कार्रवाई की जरूरत क्यों पड़ी? क्या इन सौदों में प्रभावशाली लोगों का पैसा लगा था?
बताया जा रहा है कि फिरोज ने कई फर्म बनाई थीं। इनमें उनकी पत्नी हिना और मां वाहिदा शामिल थीं। उनकी पुत्री और करीबी लोग भी इनसे जुड़े थे। जमीन के कुछ सौदे बैंक नीलामी के जरिए किए गए थे। सूत्रों के मुताबिक कंपनियों के माध्यम से बड़ी रकम निवेश की गई थी। यह पैसा कुछ हाईप्रोफाइल लोगों का होने की आशंका है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। जांच में 90 करोड़ की जमीन का सौदा सबसे अहम माना जा रहा है।
यह जमीन मल्हारगंज तहसील के मगरखेड़ा गांव में है। इसकी कीमत करीब 90 करोड़ रुपए बताई जा रही है। मामला आठ सर्वे नंबरों की जमीन से जुड़ा है। इनमें 189 से 195 और 229/3/5 शामिल हैं। कुल जमीन 11 हेक्टेयर यानी करीब 45 बीघा है। राजस्व रिकॉर्ड में यह जमीन कस्तूरीबाई पति बद्रीलाल के नाम रही है।
कस्तूरीबाई ने यह जमीन अपने बच्चों के नाम नहीं की थी। उन्होंने दामाद मनोज के कहने पर रविकांत पंवार को अधिकार सौंपे थे। रविकांत को जमीन की पावर ऑफ अटॉर्नी दी गई थी। यह पावर ऑफ अटॉर्नी 28 जून 2024 को रतलाम में पंजीकृत हुई थी।
पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर जमीन का सौदा हुआ था। इसे 10 अगस्त 2024 को श्याम इन्फ्रा को बेचा गया था। फर्म की ओर से सुमित जिंदल ने जमीन खरीदी थी। सौदा नौ करोड़ रुपए में तय हुआ था। भुगतान के लिए डेढ़-डेढ़ करोड़ रुपए के छह चेक दिए गए थे। जमीन का पंजीयन 27 अगस्त 2024 को हुआ था।
दस्तावेजों में विक्रेता रविकांत पंवार बताए गए हैं। वह विजय नगर के अरण्य नगर के निवासी हैं। खरीदार सुमित जिंदल निपानिया स्थित अपोलो डीबी सिटी के निवासी हैं।
जमीन की मौजूदा कीमत 90 करोड़ रुपए से ज्यादा बताई गई है। यह जमीन इंदौर-उज्जैन रोड पर स्थित है। यहां जमीन की औसत कीमत करीब दो करोड़ रुपए प्रति बीघा है।
रजिस्ट्री में कस्तूरीबाई की ओर से रविकांत ने हस्ताक्षर किए थे। पंजीयन उप-पंजीयक प्रदीप निगम ने किया था। फिरोज खान और युवराज सिंह पवार इसके गवाह बने थे।
युवराज का नाम फिरोज से जुड़ी कंपनी में भी सामने आया है। वह स्पार्कवेव रियल्टी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक हैं। इस कंपनी में फिरोज की पत्नी हिना खान भी निदेशक हैं। मोहम्मद शाकिर भी कंपनी के निदेशकों में शामिल हैं।
इस जमीन की कहानी कस्तूरीबाई के परिवार से शुरू हुई थी। उनका अपनी संतानों से विवाद चल रहा था। इसी दौरान उन्होंने कई लोगों से जमीन बेचने के करार किए थे। ये सौदे गांव के लोगों से छोटी-छोटी रकम लेकर किए गए थे।
इंदौर के एक बड़े भूमाफिया से भी सौदा हुआ था। हालांकि जमीन की पूरी खरीद-बिक्री नहीं हो सकी। बाद में इस जमीन पर गुंडे हेमंत यादव की नजर पड़ी।
बताया जा रहा है कि कुछ लोगों ने हेमंत को इसकी जिम्मेदारी सौंपी थी। उसे जमीन का सौदा पूरा कराने के लिए कहा गया था। वारिसों को रकम देकर उनके दावे हटाने की जिम्मेदारी भी उसे मिली थी।
हेमंत ने कथित तौर पर दबाव बनाना शुरू किया था। इसी बीच एक पुराने हत्या के मामले में उस पर कार्रवाई हुई थी। अक्टूबर 2023 में उसे दोबारा जेल भेज दिया गया था। इसके बाद जमीन से जुड़ा मामला ठंडा पड़ गया।
इसके बाद मामले में फिरोज खान की एंट्री हुई थी। यह इलाके की सबसे चर्चित जमीनों में शामिल थी। कस्तूरीबाई लगातार जमीन के खरीदार तलाश रही थीं।
कस्तूरीबाई के दामाद मनोज रतलाम में रहते थे। उन्होंने अपने मित्र रविकांत पंवार को पावर ऑफ अटॉर्नी दिलाई। रविकांत का फिरोज खान से संबंध बताया गया है। इसी रास्ते फिरोज इस सौदे से जुड़ गया था।
पावर ऑफ अटॉर्नी 28 जून 2024 को पंजीकृत हुई थी। इसके बाद रजिस्ट्री की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ी थी। श्याम इन्फ्रा ने नौ करोड़ रुपए का भुगतान किया था। यह रकम छह किस्तों में दो महीने के भीतर दी गई थी। जमीन की रजिस्ट्री 27 अगस्त 2024 को पूरी हुई थी।
इसके बाद कस्तूरीबाई की तबीयत बिगड़ गई थी। उन्हें इंदौर के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था। आरोप है कि फिरोज वहां पुलिसकर्मियों के साथ मौजूद रहा। आशंका थी कि वारिस उनसे किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करा सकते हैं या कोई नई वसीयत बनवा सकते हैं। इससे जुड़ी तस्वीरें और वीडियो मौजूद होने का दावा है।
रजिस्ट्री के करीब एक सप्ताह बाद कस्तूरीबाई की मौत हो गई थी। उनका निधन सितंबर 2024 में हुआ था।
रजिस्ट्री के बाद मामला जिला प्रशासन के पास पहुंचा था। जमीन के नामांतरण का आवेदन मल्हारगंज तहसील में लगाया गया था। उस समय नारायण नांदेड़ा वहां तहसीलदार थे।
नामांतरण प्रक्रिया के दौरान कस्तूरीबाई के वारिसों ने आपत्ति दर्ज कराई थी। उन्होंने खुद को जमीन का कानूनी वारिस बताया था। उनका आरोप था कि पावर ऑफ अटॉर्नी फर्जी है। यह पावर दामाद मनोज और रविकांत ने कूटरचित तरीके से तैयार कराई थी। इसी आधार पर जमीन बेचने का आरोप लगाया गया था।
वारिसों ने जमीन का सौदा रद्द करने की मांग की थी। उन्होंने नामांतरण रोकने के लिए भी आवेदन दिया था। इसी विवाद को लेकर जिला न्यायालय में मामला दायर किया गया था।
आरोप है कि तहसीलदार नारायण नांदेड़ा ने आपत्तियों के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया था। इसके बाद कस्तूरीबाई की पुत्री लीलाबाई ने संभागायुक्त न्यायालय में आवेदन लगाया था। यह आवेदन भू-राजस्व संहिता की धारा 29 के तहत दिया गया था।
लीलाबाई ने तहसीलदार की अदालत पर भरोसा नहीं होने की बात कही। उन्होंने मामला किसी दूसरी अदालत में भेजने की मांग की। संभागायुक्त न्यायालय ने 17 फरवरी 2025 को आदेश जारी किया था। मामला बिचौली हप्सी तहसीलदार की अदालत में भेज दिया गया था।
इसी दौरान नामांतरण मामले की सुनवाई तेजी से आगे बढ़ती रही। पहले 10 फरवरी 2025 को सुनवाई की तारीख रखी गई थी। इसके बाद 11 फरवरी और 13 फरवरी को सुनवाई हुई थी। फिर 14 फरवरी को भी मामले की तारीख लगी थी। आखिरकार 17 फरवरी को जमीन के नामांतरण का आदेश जारी हो गया। इसी दिन मामला दूसरी तहसील में भेजने का आदेश भी हुआ था।
कस्तूरीबाई के वारिसों ने संभागायुक्त कोर्ट में आवेदन लगाया था। यह आवेदन भू-राजस्व संहिता की धारा 29 के तहत दिया गया था। उन्होंने मामला तहसीलदार नारायण नांदेड़ा की अदालत से हटाने की मांग की थी।
लीलाबाई ने 14 फरवरी को तहसीलदार कोर्ट को इसकी जानकारी दी थी। उन्होंने बताया कि मामला स्थानांतरित कराने का आवेदन लंबित है। इसलिए नामांतरण मामले में आगे सुनवाई नहीं करने की मांग रखी गई।
संभागायुक्त डॉ. सुदाम खाड़े की कोर्ट ने 17 फरवरी को आदेश दिया था। आदेश में तहसीलदार को मामला नहीं सुनने के लिए कहा गया था। साथ ही केस को दूसरी अदालत में भेजने का निर्देश दिया गया।
आरोप है कि इसी दिन तहसीलदार नांदेड़ा ने नामांतरण आदेश जारी कर दिया था। वारिसों का कहना है कि संभागायुक्त कोर्ट के आदेश को नजरअंदाज किया गया था।
तहसीलदार ने एक और काम किया। लीलाबाई ने बताया कि जमीन को लेकर सिविल केस चल रहा है। कोर्ट ने 27 अक्टूबर 2024 को यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था।
इसके बाद तहसीलदार नारायण नांदेड़ा ने कानूनी राय मांगी थी। उन्होंने अतिरिक्त महाधिवक्ता से इस मामले में अभिमत लिया था। राय में कहा गया कि नामांतरण पर स्पष्ट रोक नहीं है। साथ ही जमीन पर यथास्थिति का आदेश होने की बात भी कही गई थी।
आरोप है कि तहसीलदार ने उस अभिमत की अपने तरीके से व्याख्या की। इसके बाद नामांतरण प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ाई गई। सात दिनों में पांच दिन मामले की लगातार सुनवाई हुई। आखिरकार जमीन के नामांतरण का आदेश जारी कर दिया गया।
![जमीन की रजिस्ट्री में फिरोज खान और उसकी कंपनी में पत्नी के साथ डायरेक्टर युवराज दोनों गवाह]()
नामांतरण आदेश के खिलाफ एसडीएम निधि वर्मा की कोर्ट में अपील हुई थी। अपीलकर्ताओं ने पावर ऑफ अटॉर्नी को फर्जी बताया था। उनका आरोप था कि मनोज और रविकांत ने इसी आधार पर सौदा किया था।
अपील में कई गंभीर खामियां भी बताई गईं। खरीदार फर्म की पूरी जानकारी नहीं लेने का आरोप लगा था। वारिसों का पक्ष नहीं सुनने की बात कही गई और संभागायुक्त कोर्ट का आदेश नजरअंदाज करने का आरोप भी लगाया गया था। साथ ही जिला कोर्ट के यथास्थिति आदेश का पालन नहीं होने की बात कही गई थी।
एसडीएम कोर्ट ने मामले से जुड़े सभी पक्षों को सुना था। इसके बाद 24 दिसंबर 2025 को विस्तृत आदेश जारी हुआ था। कोर्ट ने तहसीलदार नारायण नांदेड़ा का नामांतरण आदेश खारिज कर दिया था। राजस्व रिकॉर्ड में पुरानी स्थिति बहाल करने का निर्देश भी दिया गया। यह स्थिति 17 फरवरी 2025 से पहले वाली रखी जानी थी।
श्याम इन्फ्रा के निदेशक सुमित जिंदल के खिलाफ यह अपील हुई थी। अपीलकर्ताओं में कस्तूरीबाई के पुत्र कैलाश शर्मा शामिल थे। बच्चनलाल उर्फ उखराज और पुत्री लीलाबाई भी अपीलकर्ता थीं।
इनके साथ लक्ष्मीबाई पति नंदलाल शर्मा भी शामिल थीं। राधाबाई पति सूरजमल ने भी अपील दायर की थी। अशोक पिता दशरथ शर्मा और संतोष पिता दशरथ शर्मा भी इससे जुड़े थे। अर्जुन पिता दशरथ शर्मा और सीताबाई पिता दशरथ शर्मा भी अपीलकर्ता थे।
लोकायुक्त छापे के दौरान इस जमीन सौदे की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद पूरे सौदे को जांच के दायरे में लिया गया है। लोकायुक्त ने औपचारिक रूप से इसकी पुष्टि भी की है।
अब नौ करोड़ रुपए के भुगतान की जांच होगी। यह रकम वास्तव में किसने दी थी? सौदे में फिरोज खान की क्या भूमिका थी? वह किसके पैसे जमीन में लगा रहा था? इन सवालों के जवाब जांच में सामने आ सकते हैं।
लोकायुक्त सौदे से जुड़े दूसरे लोगों की भूमिका भी खंगाल सकता है। जांच आगे बढ़ने पर कई छिपे हुए नाम सामने आने की संभावना है।
बताया जा रहा है कि फिरोज ने कई फर्म बनाई थीं। इनमें उनकी पत्नी हिना और मां वाहिदा शामिल थीं। उनकी पुत्री और करीबी लोग भी इनसे जुड़े थे। जमीन के कुछ सौदे बैंक नीलामी के जरिए किए गए थे। सूत्रों के मुताबिक कंपनियों के माध्यम से बड़ी रकम निवेश की गई थी। यह पैसा कुछ हाईप्रोफाइल लोगों का होने की आशंका है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। जांच में 90 करोड़ की जमीन का सौदा सबसे अहम माना जा रहा है।
90 करोड़ की जमीन कहां है
जमीन की पूरी कहानी
पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर जमीन का सौदा हुआ था। इसे 10 अगस्त 2024 को श्याम इन्फ्रा को बेचा गया था। फर्म की ओर से सुमित जिंदल ने जमीन खरीदी थी। सौदा नौ करोड़ रुपए में तय हुआ था। भुगतान के लिए डेढ़-डेढ़ करोड़ रुपए के छह चेक दिए गए थे। जमीन का पंजीयन 27 अगस्त 2024 को हुआ था।
दस्तावेजों में विक्रेता रविकांत पंवार बताए गए हैं। वह विजय नगर के अरण्य नगर के निवासी हैं। खरीदार सुमित जिंदल निपानिया स्थित अपोलो डीबी सिटी के निवासी हैं।
जमीन की मौजूदा कीमत 90 करोड़ रुपए से ज्यादा बताई गई है। यह जमीन इंदौर-उज्जैन रोड पर स्थित है। यहां जमीन की औसत कीमत करीब दो करोड़ रुपए प्रति बीघा है।
रजिस्ट्री में कस्तूरीबाई की ओर से रविकांत ने हस्ताक्षर किए थे। पंजीयन उप-पंजीयक प्रदीप निगम ने किया था। फिरोज खान और युवराज सिंह पवार इसके गवाह बने थे।
युवराज का नाम फिरोज से जुड़ी कंपनी में भी सामने आया है। वह स्पार्कवेव रियल्टी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक हैं। इस कंपनी में फिरोज की पत्नी हिना खान भी निदेशक हैं। मोहम्मद शाकिर भी कंपनी के निदेशकों में शामिल हैं।
जमीन के मामले में गुंडे और भूमाफिया की एंट्री
इंदौर के एक बड़े भूमाफिया से भी सौदा हुआ था। हालांकि जमीन की पूरी खरीद-बिक्री नहीं हो सकी। बाद में इस जमीन पर गुंडे हेमंत यादव की नजर पड़ी।
बताया जा रहा है कि कुछ लोगों ने हेमंत को इसकी जिम्मेदारी सौंपी थी। उसे जमीन का सौदा पूरा कराने के लिए कहा गया था। वारिसों को रकम देकर उनके दावे हटाने की जिम्मेदारी भी उसे मिली थी।
हेमंत ने कथित तौर पर दबाव बनाना शुरू किया था। इसी बीच एक पुराने हत्या के मामले में उस पर कार्रवाई हुई थी। अक्टूबर 2023 में उसे दोबारा जेल भेज दिया गया था। इसके बाद जमीन से जुड़ा मामला ठंडा पड़ गया।
फिरोज खान की एंट्री कैसे हुई
कस्तूरीबाई के दामाद मनोज रतलाम में रहते थे। उन्होंने अपने मित्र रविकांत पंवार को पावर ऑफ अटॉर्नी दिलाई। रविकांत का फिरोज खान से संबंध बताया गया है। इसी रास्ते फिरोज इस सौदे से जुड़ गया था।
पावर ऑफ अटॉर्नी 28 जून 2024 को पंजीकृत हुई थी। इसके बाद रजिस्ट्री की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ी थी। श्याम इन्फ्रा ने नौ करोड़ रुपए का भुगतान किया था। यह रकम छह किस्तों में दो महीने के भीतर दी गई थी। जमीन की रजिस्ट्री 27 अगस्त 2024 को पूरी हुई थी।
इसके बाद कस्तूरीबाई की तबीयत बिगड़ गई थी। उन्हें इंदौर के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था। आरोप है कि फिरोज वहां पुलिसकर्मियों के साथ मौजूद रहा। आशंका थी कि वारिस उनसे किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करा सकते हैं या कोई नई वसीयत बनवा सकते हैं। इससे जुड़ी तस्वीरें और वीडियो मौजूद होने का दावा है।
रजिस्ट्री के करीब एक सप्ताह बाद कस्तूरीबाई की मौत हो गई थी। उनका निधन सितंबर 2024 में हुआ था।
कस्तूरीबाई जब मेदांता अस्पताल में एडमिट थी फिरोज खान की फोटो
अब संभागायुक्त, एसडीएम और तहसीलदार की भूमिका
नामांतरण प्रक्रिया के दौरान कस्तूरीबाई के वारिसों ने आपत्ति दर्ज कराई थी। उन्होंने खुद को जमीन का कानूनी वारिस बताया था। उनका आरोप था कि पावर ऑफ अटॉर्नी फर्जी है। यह पावर दामाद मनोज और रविकांत ने कूटरचित तरीके से तैयार कराई थी। इसी आधार पर जमीन बेचने का आरोप लगाया गया था।
वारिसों ने जमीन का सौदा रद्द करने की मांग की थी। उन्होंने नामांतरण रोकने के लिए भी आवेदन दिया था। इसी विवाद को लेकर जिला न्यायालय में मामला दायर किया गया था।
रजिस्ट्री
तहसीलदार ने क्या किया
लीलाबाई ने तहसीलदार की अदालत पर भरोसा नहीं होने की बात कही। उन्होंने मामला किसी दूसरी अदालत में भेजने की मांग की। संभागायुक्त न्यायालय ने 17 फरवरी 2025 को आदेश जारी किया था। मामला बिचौली हप्सी तहसीलदार की अदालत में भेज दिया गया था।
इसी दौरान नामांतरण मामले की सुनवाई तेजी से आगे बढ़ती रही। पहले 10 फरवरी 2025 को सुनवाई की तारीख रखी गई थी। इसके बाद 11 फरवरी और 13 फरवरी को सुनवाई हुई थी। फिर 14 फरवरी को भी मामले की तारीख लगी थी। आखिरकार 17 फरवरी को जमीन के नामांतरण का आदेश जारी हो गया। इसी दिन मामला दूसरी तहसील में भेजने का आदेश भी हुआ था।
संभागायुक्त कोर्ट की भूमिका
लीलाबाई ने 14 फरवरी को तहसीलदार कोर्ट को इसकी जानकारी दी थी। उन्होंने बताया कि मामला स्थानांतरित कराने का आवेदन लंबित है। इसलिए नामांतरण मामले में आगे सुनवाई नहीं करने की मांग रखी गई।
संभागायुक्त डॉ. सुदाम खाड़े की कोर्ट ने 17 फरवरी को आदेश दिया था। आदेश में तहसीलदार को मामला नहीं सुनने के लिए कहा गया था। साथ ही केस को दूसरी अदालत में भेजने का निर्देश दिया गया।
आरोप है कि इसी दिन तहसीलदार नांदेड़ा ने नामांतरण आदेश जारी कर दिया था। वारिसों का कहना है कि संभागायुक्त कोर्ट के आदेश को नजरअंदाज किया गया था।
संभागायुक्त डॉ. सुदाम खाड़े का आदेश।
जिला कोर्ट के स्टे को भी तहसीलदार ने खारिज किया
इसके बाद तहसीलदार नारायण नांदेड़ा ने कानूनी राय मांगी थी। उन्होंने अतिरिक्त महाधिवक्ता से इस मामले में अभिमत लिया था। राय में कहा गया कि नामांतरण पर स्पष्ट रोक नहीं है। साथ ही जमीन पर यथास्थिति का आदेश होने की बात भी कही गई थी।
आरोप है कि तहसीलदार ने उस अभिमत की अपने तरीके से व्याख्या की। इसके बाद नामांतरण प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ाई गई। सात दिनों में पांच दिन मामले की लगातार सुनवाई हुई। आखिरकार जमीन के नामांतरण का आदेश जारी कर दिया गया।
जमीन की रजिस्ट्री में फिरोज खान और उसकी कंपनी में पत्नी के साथ डायरेक्टर युवराज दोनों गवाह
जमीन की रजिस्ट्री में फिरोज खान और उसकी कंपनी में पत्नी के साथ डायरेक्टर युवराज दोनों गवाह-2
एसडीएम ने जारी किया स्पीकिंग ऑर्डर
अपील में कई गंभीर खामियां भी बताई गईं। खरीदार फर्म की पूरी जानकारी नहीं लेने का आरोप लगा था। वारिसों का पक्ष नहीं सुनने की बात कही गई और संभागायुक्त कोर्ट का आदेश नजरअंदाज करने का आरोप भी लगाया गया था। साथ ही जिला कोर्ट के यथास्थिति आदेश का पालन नहीं होने की बात कही गई थी।
एसडीएम कोर्ट ने मामले से जुड़े सभी पक्षों को सुना था। इसके बाद 24 दिसंबर 2025 को विस्तृत आदेश जारी हुआ था। कोर्ट ने तहसीलदार नारायण नांदेड़ा का नामांतरण आदेश खारिज कर दिया था। राजस्व रिकॉर्ड में पुरानी स्थिति बहाल करने का निर्देश भी दिया गया। यह स्थिति 17 फरवरी 2025 से पहले वाली रखी जानी थी।
श्याम इन्फ्रा के निदेशक सुमित जिंदल के खिलाफ यह अपील हुई थी। अपीलकर्ताओं में कस्तूरीबाई के पुत्र कैलाश शर्मा शामिल थे। बच्चनलाल उर्फ उखराज और पुत्री लीलाबाई भी अपीलकर्ता थीं।
इनके साथ लक्ष्मीबाई पति नंदलाल शर्मा भी शामिल थीं। राधाबाई पति सूरजमल ने भी अपील दायर की थी। अशोक पिता दशरथ शर्मा और संतोष पिता दशरथ शर्मा भी इससे जुड़े थे। अर्जुन पिता दशरथ शर्मा और सीताबाई पिता दशरथ शर्मा भी अपीलकर्ता थे।
एसडीएम का आदेश।
जमीन सौदे के नौ करोड़ किसके, लोकायुक्त ने शुरू की जांच
अब नौ करोड़ रुपए के भुगतान की जांच होगी। यह रकम वास्तव में किसने दी थी? सौदे में फिरोज खान की क्या भूमिका थी? वह किसके पैसे जमीन में लगा रहा था? इन सवालों के जवाब जांच में सामने आ सकते हैं।
लोकायुक्त सौदे से जुड़े दूसरे लोगों की भूमिका भी खंगाल सकता है। जांच आगे बढ़ने पर कई छिपे हुए नाम सामने आने की संभावना है।
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