भ्रष्टाचार के सहारे आबकारी अफसरों ने खड़े किए कारोबार, कोई होटल, खेती तो कोई प्रॉपटी से कर रहा कमाई
Sanjay Sharma | Apr 01, 2026, 20:39 IST
Photograph: (the sootr)
मध्य प्रदेश के आबकारी अधिकारियों ने भ्रष्टाचार के जरिए करोड़ों की संपत्ति अर्जित की। जानिए किसने किस कारोबार में पैसा लगाया और कैसे लोकायुक्त की कार्रवाई हो रही है।
BHOPAL. मध्य प्रदेश में आबकारी विभाग में भ्रष्टाचार के मामले नए नहीं हैं। बीते पांच सालों में आबकारी के अफसर काली कमाई से जुटाए धन और संपत्ति से अब दूसरे काम धंधों में उतर चुके हैं। परिवार के सदस्यों के नाम से शुरू धंधों में कोई प्रत्यक्ष रूप से शामिल है तो कोई पर्दे के पीछे रहकर काम कर रहा है। इनमें से ज्यादातर के खिलाफ विभाग में रहते हुए काली कमाई करने की वजह से लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू में केस भी दर्ज हुए हैं।
हांलाकि अभी इनमें से कुछ मामले कोर्ट में विचाराधीन है तो कुछ में विभाग से चालान पेश करने की अनुमति ही नहीं मिली है। वहीं, कुछ अब विभागीय सेवा को छोड़ चुके हैं। द सूत्र ने प्रदेश के ऐसे आबकारी अधिकारियों की जानकारी जुटाई है, जो आय से अधिक संपत्ति जुटाने के बाद अब दूसरे कारोबार से करोड़ों कमा रहे हैं।
आबकारी विभाग बीते सालों में भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों के आरोपों में घिरा रहा है। लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू (EOW) के साथ ही अब विभाग के कई अफसर प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की नजर में भी आ चुके हैं। किस अधिकारी ने कितनी काली कमाई की और विभाग के खजाने में सेंध लगाकर कैसे करोड़पति बने द सूत्र ने इसकी जानकारी भी जुटाई है। इसी पड़ताल की दूसरी कड़ी में प्रदेश के परिवहन में रहकर काली कमाई करने वाले किरदार भी आपके सामने होंगे।
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आबकारी विभाग में बेहिसाब कमाई करने वालों में पहला नाम रिटायर्ड जिला आबकारी अधिकारी धर्मेन्द्र सिंह भदौरिया का है। भदौरिया अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, लेकिन नौकरी के दौरान इंदौर, आलीराजपुर, ग्वालियर, धार जिलों में करोड़ों रुपए के आलीशन बंगले, फ्लैट, जमीन और जेवर के अलावा दूसरी संपत्तियां जमा कीं।
लोकायुक्त ने अक्टूबर 2025 में छापेमार कार्रवाई के दौरान भदौरिया की करीब 20 करोड़ की अघोषित चल- अचल संपत्ति जब्त की थी। भदौरिया ने जिला आबकारी अधिकारी रहते हुए जो कमाई की उसके सहारे नौकरी के दौरान ही अघोषित रूप से ठेकेदारी भी शुरू कर दी थी। आबकारी ठेकेदार के रूप में उन्होंने अपने समधी को भी पार्टनर बनाया। यही नहीं, लोकायुक्त की जांच में भदौरिया के पुत्र के जरिए फिल्म इंडस्ट्री में निवेश की जानकारी भी सामने आई थी। वहीं, उनके पुत्र सूर्यांश के जरिए इंदौर में चाइनीज फूड चेन रेस्टॉरेंट, अन्नपूर्णा और विजयनगर की कुछ दुकानों में पार्टनरशिप का भी पता चला है।
फिलहाल इसकी जांच भी की जा रही है। भदौरिया को अपनी नौकरी से 2 करोड़ रुपए की आय हुई थी, जबकि लोकायुक्त ने उनके पास 18 करोड़ से भी ज्यादा संपत्ति का पता लगाकर उसे जब्त किया है। उनकी यह संपत्ति आय से 829 गुना ज्यादा है।
आय से ज्यादा संपत्ति जुटाने में आबकारी विभाग में दूसरा नाम आलोक खरे का है। सहायक आबकारी आयुक्त रहे आलोक खरे कई जिलों में पदस्थ रह चुके हैं। उनके भोपाल, रायसेन सहित कई शहरों में फार्म हाउस, आलीशान मकान और जमीनें हैं। रायसेन जिले में ही दो बड़े फार्म हाउस और बगीचों में फलों की व्यावसायिक खेती करते हैं। यह कारोबार उनकी पत्नी के नाम पर है।
यह संपत्ति और जमीन उन्होंने आबकारी विभाग में सेवा में रहते हुए खरीदी है। लोकायुक्त पुलिस ने उनके खिलाफ 2019 में केस दर्ज किया था तब उनके पास करीब 150 करोड़ रुपए की अघोषित संपत्ति का खुलासा हुआ था। पांच साल के बाद हाल ही में उनके इस केस को अभियोजन स्वीकृति मिलने के बाद अब मामले की सुनवाई कोर्ट में हो रही है।
सहायक आबकारी आयुक्त खरे व्यावसायिक खेती को अपना कारोबार बना चुके हैं। उनके बगीचों के फल देश के कई बड़े शहरों की मंडियों में सप्लाई होते हैं। इससे उन्हें हर साल करोड़ों रुपए की कमाई होती है। इस कमाई को उन्होंने आयकर रिटर्न में भी दर्शाया है। लोकायुक्त कार्रवाई में खरे के पास नौकरी से मिलने वाले वेतन 90 लाख के मुकाबले 150 गुना अघोषित चल-अचल संपत्ति मिली थी।
आबकारी विभाग के केवल अधिकारी ही नहीं, छोटे ओहदेदार भी अवैध कमाई में पीछे नहीं हैं। आबकारी आरक्षक रामचंद्र जायसवाल ने विभागीय नौकरी के दौरान ठेकेदारों से साठगांठ के जरिए जमकर कमाई थी और इस कमाई को दूसरे काम धंधों में निवेश किया। जायसवाल ने अपनी अवैध कमाई को इंदौर के होटल और प्रॉपर्टी में लगाया और इसके जरिए आय के दूसरे साधन खड़े किए।
लोकायुक्त पुलिस की कार्रवाई में आबकारी आरक्षक रामचंद्र जायसवाल की संपत्ति को खुलासा हुआ था। जिसके बाद जायसवाल पर भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत केस भी दर्ज किया गया था। इस केस में कोर्ट रामचंद्र जायसवाल की दो करोड़ से ज्यादा संपत्ति जब्त करने के आदेश दे चुका है। रामचंद्र आबकारी में मामूली आरक्षक था, इसके बावजूद उसने बेहिसाब कमाई कर अपनी पत्नी और पुत्र- पुत्रियों के नाम से इंदौर में कई मकान और जमीनें खरीदी थीं।
इसी कड़ी में एक नाम है पूर्व सहायक आबकारी आयुक्त संजीव दुबे का। फर्जी आबकारी चालान के जरिए विभाग को 72 करोड़ का नुकसान पहुंचाने के घोटाले में भी दुबे की भूमिका संदेहास्पद रही है। जिसकी जांच अब ईडी के हाथ में है। ईडी ने ठेकेदारों की मिलीभगत से फर्जी चालान के जरिए की गई गड़बड़ी के आधार पर 70 करोड़ की संपत्ति भी अटैच की है। दुबे पर जबलपुर में पदस्थापना के दौरान शराब ठेकेदारों से वसूली की शिकायतों भी हुई हैं। जिनके बाद उनकी विभागीय स्तर पर जांच जारी है। बीते सप्ताह हाईकोर्ट जबलपुर भी संजीव दुबे पर कड़ी टिप्पणी कर उन्हें सोम डिस्टलरी के एजेंट की तरह काम करने वाला कह चुका है।
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जिला आबकारी अधिकारी के रूप में खंडवा और होशंगाबाद में पदस्थ रहे भवानी प्रसाद भारके ने भी आबकारी विभाग से जमकर मलाई खाई है। इस कमाई से उन्होंने दर्जनभर वाहन खरीदे, इंदौर सहित कई शहर में प्रॉपर्टी में निवेश किया। 100 एकड़ जमीन भी खरीदी थी। लोकायुक्त की कार्रवाई में उनके पास करोड़ों रुपए की अचल संपत्ति के दस्तावेज बरामद हुए थे। इसके आधार पर भारके के पास 10 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति का खुलासा हुआ था। आबकारी की अवैध कमाई के सहारे उनके प्रॉपर्टी के कारोबार में उतरने की भी जांच लोकायुक्त टीम के पास है।
शराब अवैध कमाई
हांलाकि अभी इनमें से कुछ मामले कोर्ट में विचाराधीन है तो कुछ में विभाग से चालान पेश करने की अनुमति ही नहीं मिली है। वहीं, कुछ अब विभागीय सेवा को छोड़ चुके हैं। द सूत्र ने प्रदेश के ऐसे आबकारी अधिकारियों की जानकारी जुटाई है, जो आय से अधिक संपत्ति जुटाने के बाद अब दूसरे कारोबार से करोड़ों कमा रहे हैं।
आबकारी विभाग बीते सालों में भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों के आरोपों में घिरा रहा है। लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू (EOW) के साथ ही अब विभाग के कई अफसर प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की नजर में भी आ चुके हैं। किस अधिकारी ने कितनी काली कमाई की और विभाग के खजाने में सेंध लगाकर कैसे करोड़पति बने द सूत्र ने इसकी जानकारी भी जुटाई है। इसी पड़ताल की दूसरी कड़ी में प्रदेश के परिवहन में रहकर काली कमाई करने वाले किरदार भी आपके सामने होंगे।
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बॉलीवुड, होटल, दुकान और प्रॉपर्टी में निवेश
लोकायुक्त ने अक्टूबर 2025 में छापेमार कार्रवाई के दौरान भदौरिया की करीब 20 करोड़ की अघोषित चल- अचल संपत्ति जब्त की थी। भदौरिया ने जिला आबकारी अधिकारी रहते हुए जो कमाई की उसके सहारे नौकरी के दौरान ही अघोषित रूप से ठेकेदारी भी शुरू कर दी थी। आबकारी ठेकेदार के रूप में उन्होंने अपने समधी को भी पार्टनर बनाया। यही नहीं, लोकायुक्त की जांच में भदौरिया के पुत्र के जरिए फिल्म इंडस्ट्री में निवेश की जानकारी भी सामने आई थी। वहीं, उनके पुत्र सूर्यांश के जरिए इंदौर में चाइनीज फूड चेन रेस्टॉरेंट, अन्नपूर्णा और विजयनगर की कुछ दुकानों में पार्टनरशिप का भी पता चला है।
फिलहाल इसकी जांच भी की जा रही है। भदौरिया को अपनी नौकरी से 2 करोड़ रुपए की आय हुई थी, जबकि लोकायुक्त ने उनके पास 18 करोड़ से भी ज्यादा संपत्ति का पता लगाकर उसे जब्त किया है। उनकी यह संपत्ति आय से 829 गुना ज्यादा है।
फलों की खेती को बनाया कारोबार
यह संपत्ति और जमीन उन्होंने आबकारी विभाग में सेवा में रहते हुए खरीदी है। लोकायुक्त पुलिस ने उनके खिलाफ 2019 में केस दर्ज किया था तब उनके पास करीब 150 करोड़ रुपए की अघोषित संपत्ति का खुलासा हुआ था। पांच साल के बाद हाल ही में उनके इस केस को अभियोजन स्वीकृति मिलने के बाद अब मामले की सुनवाई कोर्ट में हो रही है।
सहायक आबकारी आयुक्त खरे व्यावसायिक खेती को अपना कारोबार बना चुके हैं। उनके बगीचों के फल देश के कई बड़े शहरों की मंडियों में सप्लाई होते हैं। इससे उन्हें हर साल करोड़ों रुपए की कमाई होती है। इस कमाई को उन्होंने आयकर रिटर्न में भी दर्शाया है। लोकायुक्त कार्रवाई में खरे के पास नौकरी से मिलने वाले वेतन 90 लाख के मुकाबले 150 गुना अघोषित चल-अचल संपत्ति मिली थी।
होटल कारोबार में लगाई अवैध कमाई
लोकायुक्त पुलिस की कार्रवाई में आबकारी आरक्षक रामचंद्र जायसवाल की संपत्ति को खुलासा हुआ था। जिसके बाद जायसवाल पर भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत केस भी दर्ज किया गया था। इस केस में कोर्ट रामचंद्र जायसवाल की दो करोड़ से ज्यादा संपत्ति जब्त करने के आदेश दे चुका है। रामचंद्र आबकारी में मामूली आरक्षक था, इसके बावजूद उसने बेहिसाब कमाई कर अपनी पत्नी और पुत्र- पुत्रियों के नाम से इंदौर में कई मकान और जमीनें खरीदी थीं।
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