हर तीसरा GenZ कर्ज में, 22 साल की उम्र में शुरू हो रहा लोन
एक क्लिक में आ गया पैसा और फिर…
स्नेहा इंदौर में एक IT कंपनी में जूनियर एनालिस्ट है। सैलरी 32 हजार रुपए महीना। दो साल पहले उसने अपना पहला क्रेडिट कार्ड लिया, सिर्फ ऑनलाइन शॉपिंग के लिए। फिर एक फिनटेक ऐप से 15 हजार रुपए का पर्सनल लोन लिया, दोस्तों के साथ गोवा ट्रिप के लिए।
आज उसके पास दो क्रेडिट कार्ड हैं और एक चालू पर्सनल लोन। हर महीने EMI और मिनिमम ड्यू मिलाकर करीब 9 हजार रुपए कटते हैं। यानी सैलरी का करीब 28% हिस्सा।
सोचिए एक बार। इतनी छोटी उम्र में इतना बड़ा हिस्सा सिर्फ कर्ज चुकाने में जा रहा है।
स्नेहा कहती है, लोन लेते वक्त ऐप पर एक क्लिक में पैसा आ गया, किसी ने समझाया नहीं कि EMI मिलाकर बोझ कितना बढ़ जाएगा। उसकी कहानी उस बड़े ट्रेंड से मेल खाती है जिसमें 35 साल से कम उम्र के कर्जदार देश की क्रेडिट एक्टिव आबादी का 39% बन चुके हैं।
मंगेतर पर इंप्रेशन जमाने कर्ज लिया, अब छह महीने से चुका रहा
अर्जुन जयपुर में एक स्टार्टअप में सेल्स की नौकरी करता है। पिछले साल उसने और उसकी मंगेतर ने मिलकर एक कॉन्सर्ट के लिए दिल्ली की यात्रा की। टिकट, होटल और खाना, सब क्रेडिट कार्ड पर।
बिल आया तो रकम अनुमान से करीब दोगुनी निकली। अर्जुन ने पूरा एकसाथ चुकाने के बजाय मिनिमम ड्यू भरना शुरू किया। और यही वो मोड़ था, जहां से ब्याज हर महीने बढ़ने लगा।
अब आते हैं असली सवाल पर। छह महीने बाद भी वो बिल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अर्जुन कहता है कि उसे कभी नहीं लगा कि एक ट्रिप की वजह से इतने लंबे समय तक ब्याज चुकाना पड़ेगा। उसकी स्थिति ठीक वैसी ही है जैसी RBI की रिपोर्ट में अनसिक्योर्ड लोन के बढ़ते NPA के पीछे झलकती है।
सोचिए एक बार। हर दूसरा रुपया, जो एक भारतीय परिवार कर्ज के तौर पर लेता है, अब घर बनाने में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के खर्च, कार्ड बिल या छोटी-मोटी शौक पूरी करने में जा रहा है। बड़ी चिंता ये है कि Buy Now- Pay later का सबसे बड़ा शिकार और कोई नहीं GenZ है।
यह आपसे क्यों जुड़ा है?
अगर आपके घर में कोई 20 से 30 साल का मेंबर है जो क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल करता है, तो यह खबर सीधे उसी से जुड़ी है। बात सिर्फ पैसे खर्च करने की नहीं है। बात ये है कि आगे चलकर उसकी लोन लेने की ताकत, उसका सिबिल स्कोर और उसकी बचत करने की आदत कैसी बनेगी। और अगर यह चलन ऐसे ही बढ़ता रहा तो बैंकिंग सिस्टम पर भी इसका असर पड़ सकता है।
पहले क्या था
दस साल पहले तक भारत में कर्ज लेना ज्यादातर मध्यम या बड़ी उम्र के लोगों का काम माना जाता था। घर या गाड़ी के लिए लोन, वो भी बैंक जाकर… ढेर सारे कागज। 2017 में देश की कर्ज योग्य आबादी में से सिर्फ 11% लोग ही क्रेडिट एक्टिव थे, यानी उनका कोई लोन चल रहा था या क्रेडिट कार्ड बिल आ रहा था।
फिर UPI आया, डिजिटल लेंडिंग ऐप्स आए और बैंक खाता खोलने से लेकर लोन मिलने तक का पूरा रास्ता मोबाइल फोन में सिमट गया। यहीं से मामला पलटता है। कर्ज लेना अब मुश्किल काम नहीं रहा, बल्कि एक क्लिक की दूरी पर आ गया।
क्या हुआ और क्यों
अब देश की 89 करोड़ कर्ज योग्य आबादी में से करीब 28% लोग क्रेडिट एक्टिव हैं। यानी करीब 25 करोड़ लोगों का कोई न कोई लोन इस समय चल रहा है या उन पर EMI बकाया है। यह आंकड़ा एक दशक पहले 11% ही था। इसका बड़ा हिस्सा युवाओं का है। 35 साल से कम उम्र के उपभोक्ता मार्च 2026 में देश की क्रेडिट एक्टिव आबादी का 39% थे जो 2017 में 33% था।
यहां एक आसान उदाहरण से समझिए। मान लीजिए आपके पड़ोस में सौ लोग हैं जिनके पास लोन लेने की योग्यता है। दस साल पहले इनमें से सिर्फ ग्यारह लोगों पर कोई कर्ज चलता था। आज अट्ठाईस लोगों पर चलता है। और इन अट्ठाईस में से बड़ा हिस्सा तीस साल से कम उम्र के लोगों यानी GenZ का है। यही वो बदलाव है जिस पर RBI की नजर टिकी है।
सबसे ज्यादा 50 हजार तक के लोन
रिपोर्ट बताती हैं कि छोटे लोन का बाजार खासतौर पर फिनटेक कंपनियों के हाथ में जा रहा है। 50 हजार रुपए से कम के पर्सनल लोन सेगमेंट में फिनटेक कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी 56.8% तक पहुंच गई है, जबकि इनका कर्ज वितरण 41.6% की रफ्तार से बढ़ा है। यह पूरे सेगमेंट की औसत ग्रोथ से कहीं ज्यादा तेज है। इनमें से करीब आधे लोन 35 साल से कम उम्र के कर्जदारों को दिए गए हैं।
क्या सुरक्षित भी है क्विक लोन
लेकिन सवाल यह है, इतनी आसानी से मिलने वाला यह पैसा कितना सुरक्षित है? RBI की जून 2026 की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट में साफ लिखा है कि सिक्योर्ड रिटेल लोन में ग्रॉस NPA मार्च 2026 के अंत में 0.7% था, जबकि अनसिक्योर्ड रिटेल लोन में यह 1.7% पर था। यानी बिना गारंटी वाला कर्ज ढाई गुना ज्यादा जोखिम भरा साबित हो रहा है। खुद RBI ने कहा है कि निचली रेटिंग वाले कर्जदारों पर कड़ी निगरानी जरूरी है। क्योंकि पश्चिम एशिया के तनाव जैसे कारणों से अगर आर्थिक हालात कमजोर पड़े तो कर्जदारों की नकदी पर असर पड़ सकता है।
Buy Now- Pay Later: म्यूजिक कॉन्सर्ट पर हुए खर्च किए 2,000 करोड़
कॉन्सर्ट, ट्रैवल और लाइफस्टाइल खर्च अब कर्ज की एक नई वजह बनकर उभरे हैं। बैंक ऑफ बड़ौदा के अर्थशास्त्रियों के अनुमान के मुताबिक, पिछले दो साल में सिर्फ म्यूजिक कॉन्सर्ट पर हुए खर्च ने 1,600 से 2,000 करोड़ रुपए तक का बाजार बना दिया है। जिसमें बड़ा हिस्सा जेन जी उपभोक्ताओं का है।
एयरबीएनबी के जनवरी 2026 के सर्वे में सामने आया कि 62% युवा इस साल किसी कॉन्सर्ट या फेस्टिवल के लिए यात्रा की योजना बना रहे थे। 76% ने माना कि वे पहली बार किसी शहर में सिर्फ किसी इवेंट के लिए गए। इनका औसत खर्च करीब 51 हजार रुपए प्रति ट्रिप रहा।
दस में से छह युवा यात्री अपनी महीने की कमाई का 21 से 40% हिस्सा सिर्फ म्यूजिक-लेड ट्रैवल और अनुभवों पर खर्च करने को तैयार थे। दस में से एक तो आधी कमाई तक झोंकने को तैयार था।
कौन-कौन involved है
इस पूरी तस्वीर में चार पक्ष हैं। पहला, RBI और वित्त मंत्रालय, जो कर्ज की बनावट पर नजर रखते हैं और जरूरत पड़ने पर नियम कड़े करते हैं। दूसरा, बैंक और NBFC, जो बड़े टिकट के सुरक्षित लोन देते हैं। तीसरा, फिनटेक कंपनियां, जो छोटे और तेज अनसिक्योर्ड लोन बांटकर तेजी से बाजार पकड़ रही हैं। चौथा, खुद जेन जी और युवा उपभोक्ता, जिनकी जरूरतें अब घर या गाड़ी नहीं बल्कि अनुभव और लाइफस्टाइल बन चुकी हैं।
दोनों sides की बात
एक तरफ इसे भारत की वित्तीय समावेशन (financial inclusion) की कामयाबी की तरह देखा जा सकता है। ज्यादा लोगों तक औपचारिक कर्ज पहुंचना, कम उम्र में क्रेडिट हिस्ट्री बनना और डिजिटल लेंडिंग का फैलना, ये सब आर्थिक विकास से जुड़े अच्छे संकेत माने जाते हैं।
एक क्रेडिट ब्यूरो के अधिकारी के मुताबिक, असली सवाल यह नहीं कि कर्ज बढ़ रहा है, बल्कि यह कि क्या यह जरूरत आधारित है और कर्जदार की चुकाने की क्षमता कितनी परखी जा रही है।
दूसरी तरफ, कुछ अर्थशास्त्री इसे हल्के में लेने से बचने की सलाह देते हैं। एक अर्थशास्त्री, जो नाम उजागर नहीं करना चाहते, कहते हैं कि उपभोग के लिए बढ़ता कर्ज नीति-निर्माताओं की चर्चाओं में बार-बार आता रहा है, खासकर 2022 और 2023 के दौरान इसने ज्यादा चिंता खड़ी की थी। फिलहाल रकम छोटी होने की वजह से इसे बहुत गंभीर नहीं माना जा रहा, लेकिन बढ़ती संख्या पर नजर बनी हुई है।
MP का कनेक्शन
मध्य प्रदेश की तस्वीर भी इसी ट्रेंड से जुड़ी दिखती है। TransUnion CIBIL के आंकड़ों के मुताबिक देश की क्रेडिट एक्टिव आबादी में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 2017 के 4% से बढ़कर मार्च 2026 में 6% हो गई है।
यानी छोटे शहरों और कस्बों से भी अब लोग औपचारिक कर्ज व्यवस्था में तेजी से जुड़ रहे हैं, वही रफ्तार जो देशभर में जेन जी और युवा कर्जदारों में दिख रही है।
TransUnion CIBIL के MD और CEO भावेश जैन के मुताबिक, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार वे तीन राज्य रहे जहां क्रेडिट ग्रोथ सबसे तेज रही।
आगे क्या होगा
फिलहाल RBI इसे संकट नहीं मान रहा, लेकिन निगरानी बढ़ा रहा है। अगर आने वाले महीनों में नौकरियों की रफ्तार धीमी पड़ी या ब्याज दरें बढ़ीं, तो कम उम्र के कर्जदारों पर दबाव तेजी से दिख सकता है। लंबे समय में सवाल यह भी है कि क्या फिनटेक कंपनियों पर अंडरराइटिंग के नियम और सख्त होंगे, और क्या युवा उपभोक्ता कमाई के मुकाबले बचत की आदत वापस अपनाएंगे।
एक बात जो आप नहीं जानते थे
पीढ़ियों के हिसाब से देखें तो कर्ज में उतरने की उम्र लगातार घट रही है। पैसाबाजार के विश्लेषण के मुताबिक, 1960 और 70 के दशक में जन्मे लोग आमतौर पर अपने 30 पार करने के बाद, यानी 38-40 की उम्र में, पहला लोन लेते थे, वो भी घर या गाड़ी जैसे सुरक्षित लोन। 1990 के दशक में जन्मी पीढ़ी यह सफर अपने मध्य-20 में शुरू करने लगी। और 2000 के बाद जन्मे लोगों के लिए यह उम्र अब घटकर करीब 22 साल रह गई है।
और यही वो moment है जहां पूरी तस्वीर बदल जाती है।
अब आप क्या करें: अपने घर के 20-30 साल के सदस्यों से कार्ड और लोन की कुल EMI देखें, न कि सिर्फ मासिक किस्त।
क्यों अभी: छोटे-छोटे अनसिक्योर्ड लोन मिलकर बड़ा बोझ बना सकते हैं, और इनका असर सिबिल स्कोर पर सीधा पड़ता है।
आगे देखें: RBI की अगली फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट, जो आम तौर पर दिसंबर में आती है।
यह खबर क्यों जरूरी है?
यह मामला सिर्फ व्यक्तिगत खर्च की आदत का नहीं, वित्तीय स्थिरता का भी है। भारतीय संविधान आर्थिक न्याय और नागरिकों के कल्याण की बात करता है, और अनियंत्रित कर्ज इस लक्ष्य के उलट जा सकता है। डिजिटल कर्ज तक आसान पहुंच एक तरफ वित्तीय समावेशन बढ़ाती है, दूसरी तरफ बिना पर्याप्त जागरूकता के यह युवाओं को कर्ज-जाल में भी धकेल सकती है। RBI जैसी नियामक संस्था की चेतावनी को गंभीरता से लेना सामाजिक और आर्थिक दोनों नैतिकता का तकाजा है।
FAQ
- जेन जी में अनसिक्योर्ड लोन इतनी तेजी से क्यों बढ़ रहा है?
डिजिटल लेंडिंग ऐप्स से लोन लेना अब बेहद आसान हो गया है। कॉन्सर्ट, ट्रैवल और लाइफस्टाइल खर्च के लिए युवा बचत की जगह कर्ज को प्राथमिकता दे रहे हैं। - क्या RBI ने इसे खतरा बताया है?
RBI ने इसे तुरंत का जोखिम नहीं बल्कि करीबी निगरानी की जरूरत वाला मामला बताया है, खासकर निचली रेटिंग वाले कर्जदारों के लिए। - क्या मध्य प्रदेश में भी यह ट्रेंड दिख रहा है?
हां, देश की क्रेडिट एक्टिव आबादी में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 2017 से 2026 के बीच 4% से बढ़कर 6% हो गई है।
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