Transgender Rights Bill 2024: पहचान की एक और लड़ाई…

CHAKRESH | Mar 22, 2026, 13:00 IST
Transgender Rights Bill 2024
नए ट्रांसजेंडर बिल को लेकर समुदाय में भारी गुस्सा है। पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड की शर्त को मानवाधिकारों का उल्लंघन माना जा रहा है। चलिए thesootr Prime में इस अछूत समझे जाने वाले मुद्दे पर नजर डालते हैं…

5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला

  • नया कानून ट्रांसजेंडर पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड की मंजूरी जरूरी करता है।
  • यानी अब जिला मजिस्ट्रेट तय करेंगे कि व्यक्ति की असली पहचान क्या है।
  • समुदाय इसे अपनी निजता और सम्मान पर बड़ा हमला मान रहा है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में अपनी पहचान खुद चुनने का अधिकार दिया था।
  • दिल्ली के जंतर-मंतर पर हजारों लोग इस बदलाव के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं।
  • यह कानूनी बदलाव लाखों लोगों के वजूद पर सवाल खड़ा कर रहा है। आइए जानते हैं कि यह नया बिल जिंदगियों को कैसे बदल देगा।

Thesootr Prime: भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को लेकर 2024 का संशोधन विधेयक अब बड़े विवाद का कारण बन गया है। यह विधेयक ट्रांसजेंडर समुदाय की आत्म-पहचान के अधिकार को समाप्त करने की कोशिश कर रहा है।



उन्हें अपने लिंग की पहचान को साबित करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट और मेडिकल बोर्ड द्वारा सत्यापन करवाने की अनिवार्यता डालने का प्रस्ताव कर रहा है।



इससे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की निजता और सामाजिक सम्मान पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि उनकी पहचान अब केवल जैविक प्रमाणों तक सीमित हो सकती है।



transgender


कबीर की कहानी और असुरक्षा का साया

कबीर की उम्र अभी 34 साल है। वह दिल्ली के प्रेस क्लब में बहुत शांत बैठे हैं। उनके चेहरे पर गहरी चिंता और असुरक्षा के भाव हैं। कबीर एक ट्रांसजेंडर पुरुष हैं और उनका सफर बहुत कठिन रहा है। उन्होंने बचपन से ही समाज की रूढ़ियों का सामना किया है।



वह अब एक शिक्षक बनकर समाज सेवा करना चाहते हैं। कबीर चाहते हैं कि वे बच्चों को जेंडर के प्रति जागरूक करें। उत्तराखंड में शिक्षकों की एक नई चयन सूची जारी हुई है। इस लिस्ट में कबीर का नाम भी शामिल किया गया है।



bill


Transgender Persons Bill 2024

लेकिन "Transgender Persons Bill 2024" ने उनकी खुशियां छीन ली हैं। इस नए बिल के कारण उनकी नौकरी पर संकट आ गया है। कबीर को डर है कि उनका नाम लिस्ट से हटा दिया जाएगा।



प्रशासन उनकी पुरुष पहचान को शायद कानूनी तौर पर स्वीकार न करे। दिल्ली में एक सरकारी इंटरव्यू के दौरान उन्हें अपमान झेलना पड़ा। वहां मौजूद अधिकारियों ने उनके जेंडर पर बहुत भद्दे सवाल पूछे।



कबीर ने उन्हें 2019 के कानून के नियमों के बारे में बताया। उन्होंने अपनी बात को बहुत ही शालीनता से अधिकारियों के सामने रखा, लेकिन वहां मौजूद अधिकारियों का व्यवहार बहुत ही ज्यादा रूखा था।



उस दिन कबीर को अपनी असली पहचान की कीमत समझ में आई। उन्होंने बहुत मेहनत करके अपनी एक अलग जगह बनाई है। अब नया कानून उन्हें फिर से उसी अंधेरे में धकेल सकता है।



कबीर जैसे हजारों लोग आज इसी अनचाहे डर में जी रहे हैं। उनकी पहचान अब उनके अपने हाथों में नहीं रह गई है। सरकार अब यह तय करेगी कि उनकी पहचान क्या होनी चाहिए। यह उनके करियर और निजी आत्मसम्मान के लिए एक बड़ा खतरा है।



कबीर की यह कहानी किसी एक अकेले व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह पूरे ट्रांसजेंडर समुदाय के भविष्य से जुड़ी एक बड़ी लड़ाई है। जब नीतियां बदलती हैं तो इंसानी जिंदगियां सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। कबीर का यह डर आज देश के हर ट्रांसजेंडर व्यक्ति का है।



Home - BehanBox


राहुल का संघर्ष और दफ्तरों के चक्कर

उत्तर प्रदेश के राहुल की कहानी भी बहुत ज्यादा दर्दनाक है। राहुल एक ट्रांस पुरुष हैं और अपनी पहचान के लिए लड़ रहे हैं। तीन साल पहले उन्होंने अपने परिवार को सच बताया था। उनके परिवार ने इस सच को स्वीकार करने से मना कर दिया।



इसके बाद राहुल ने अपना घर छोड़ने का कठिन फैसला लिया। वह अपनी कानूनी पहचान बदलवाना चाहते थे, ताकि नौकरी मिल सके। उन्होंने अपने जिले में ट्रांसजेंडर सर्टिफिकेट के लिए आवेदन किया था। लेकिन वहां के अधिकारियों ने उनका आवेदन सीधे तौर पर ठुकरा दिया।



अधिकारियों ने कहा कि जिले में वह आवेदन करने वाले अकेले हैं। उन्हें बताया गया कि ऐसे आवेदन की प्रक्रिया वहां किसी को पता नहीं। राहुल के दस्तावेजों में नाम और जेंडर को लेकर विसंगतियां बताई गईं। वह पिछले तीन साल से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।



राहुल के पास अब कोई वैध पहचान पत्र भी नहीं बचा है। बिना आईडी कार्ड के उन्हें कहीं भी काम नहीं मिल पा रहा। बैंक में खाता खुलवाना भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। वह अपनी पहचान के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं।



नए बिल के आने से राहुल की उम्मीदें पूरी तरह टूट गई हैं। अब उन्हें मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होना पड़ सकता है। राहुल कहते हैं कि उनकी निजता का अब कोई मोल नहीं है। प्रशासन की संवेदनहीनता ने उनके जीवन को और भी मुश्किल बना दिया है।



transgender


नए बिल में क्या बदला?

दरअसल साल 2019 के कानून में इस समुदाय को एक बड़ी राहत मिली थी। उस कानून में "सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन" यानी स्वयं की पहचान का अधिकार था। कोई भी व्यक्ति अपनी पहचान खुद घोषित करने के लिए स्वतंत्र था। इसके लिए किसी मेडिकल जांच या सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं थी।



व्यक्ति का एक साधारण शपथ पत्र देना ही काफी माना जाता था। इससे ट्रांसजेंडर समुदाय को समाज में बहुत सम्मान महसूस होता था। लेकिन 2024 के नए संशोधन (ट्रांसजेंडर राइट्स बिल 2024) ने इस पूरी व्यवस्था को बदल दिया है। अब एक विशेष मेडिकल बोर्ड का गठन किया जाना अनिवार्य है।



यह बोर्ड व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक जांच करने की शक्ति रखेगा। बोर्ड की रिपोर्ट के बाद मामला जिला मजिस्ट्रेट के पास जाएगा। जिला मजिस्ट्रेट ही अंतिम रूप से सर्टिफिकेट जारी करने का फैसला लेंगे। समुदाय का कहना है कि प्रशासन जेंडर की जटिलता नहीं समझ सकता।



Rise and Fall`s Anaya Bangar accuses a cricketer of sending obscene pictures


यहां पहले और अब के मुख्य बदलावों को ध्यान से देखें:

  • पहले: अपनी पहचान खुद घोषित करने का पूरा अधिकार था।
    अब: मेडिकल बोर्ड और जिला मजिस्ट्रेट की मंजूरी अनिवार्य होगी।
  • पहले: पहचान के लिए सर्जरी का कोई सबूत नहीं चाहिए था।
    अब: मेडिकल हस्तक्षेप या सर्जरी का प्रमाण मांगा जा सकता है।
  • पहले: सर्टिफिकेट पाने की प्रक्रिया बहुत सरल और सम्मानजनक थी।
    अब: इस प्रक्रिया को बहुत जटिल और प्रशासनिक बना दिया गया है।

प्रशासनिक अधिकारियों के पास जेंडर मुद्दों की बहुत ही कम समझ है। वे अक्सर आवेदकों के साथ बहुत ही संवेदनहीन तरीके से पेश आते हैं। इससे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को हर कदम पर अपमान का सामना करना पड़ता है। बिल में जेंडर पहचान को लेकर बहुत ही अस्पष्ट भाषा है।



सरकार ने इसे सामाजिक बहिष्कार रोकने का एक जरूरी तरीका बताया है। लेकिन समुदाय का मानना है कि यह उनकी आजादी पर हमला है। जेंडर की पहचान करना प्रशासन के लिए लगभग "असंभव" काम बताया गया है। इसी कारण यह कानूनी बदलाव सड़कों पर बड़े विरोध की वजह है।



Feels great to be India's only transgender person to head a Covid vaccine centre': Dr Aqsa Shaikh |


मेडिकल बोर्ड और निजता का सवाल

डॉ. अक्सा शेख एक बहुत ही अनुभवी चिकित्सा विशेषज्ञ हैं। वह खुद भी ट्रांसजेंडर समुदाय का हिस्सा हैं। वह हमदर्द इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में प्रोफेसर के रूप में पढ़ाती हैं। अक्सा का कहना है कि जेंडर पहचान शरीर में नहीं होती।



असली पहचान तो व्यक्ति के मन और उसके मस्तिष्क में होती है। मेडिकल बोर्ड का गठन इस बहुत ही बुनियादी बात को भूल जाता है। किसी की शारीरिक जांच करना निजता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। नए बिल के तहत अब सर्जरी का सबूत मांगा जा सकता है।



यह एक बहुत ही खतरनाक और बेहद निजी कानूनी मामला है। हर ट्रांसजेंडर व्यक्ति सर्जरी करवाना नहीं चाहता या वह नहीं कर सकता। सर्जरी एक बहुत ही महंगी और जटिल चिकित्सा प्रक्रिया मानी जाती है।



क्या सर्टिफिकेट के लिए शरीर को बदलना अब अनिवार्य शर्त होगी?

डॉक्टर अक्सा इसे मेडिकल एथिक्स के सिद्धांतों के खिलाफ मानती हैं। यह कानून डॉक्टर और मरीज के पवित्र रिश्ते को भी नुकसान पहुंचाएगा।



मेडिकल बोर्ड में आखिर कौन लोग शामिल किए जाएंगे? क्या उन डॉक्टरों को जेंडर की सही और वैज्ञानिक समझ होगी?



अक्सर देखा गया है कि डॉक्टरों को ट्रांसजेंडर मुद्दों की जानकारी नहीं। वे पुराने और गलत ढर्रे पर चलकर शारीरिक जांच करते हैं। इससे व्यक्ति को बहुत गहरी मानसिक और शारीरिक पीड़ा होती है। आत्म-घोषणा के अधिकार को खत्म करना पूरी तरह से गलत कदम है।



यह किसी भी व्यक्ति की अपनी पसंद और गरिमा पर चोट है। निजता का मतलब है अपने शरीर के बारे में खुद फैसला लेना। मेडिकल बोर्ड का दखल इस निजी आजादी को पूरी तरह छीन लेता है। यह समुदाय के लोगों को समाज की मुख्यधारा से काट देगा।



अगर प्रक्रिया इतनी कठिन होगी तो लोग आवेदन करने नहीं आएंगे। इससे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का शोषण समाज में और भी ज्यादा बढ़ जाएगा। सुरक्षा और सम्मान की जगह अब हर तरफ डर ने ली है। डॉक्टर अक्सा जैसे विशेषज्ञ इसे स्वास्थ्य के अधिकार का उल्लंघन मानते हैं।



राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ: ट्रांसजेंडर अधिकारों के लिए एक ऐतिहासिक निर्णय | Nat


सुप्रीम कोर्ट बनाम नया कानून

  • साल 2014 में देश में एक बहुत ऐतिहासिक फैसला आया था। इसे पूरी दुनिया में "नाल्सा बनाम भारत संघ" मामला कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को "तीसरा जेंडर" का दर्जा दिया। कोर्ट ने कहा कि अपनी पहचान चुनना एक मौलिक अधिकार है।
  • यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सभी को मिलता है। अनुच्छेद 21 हर नागरिक को गरिमा के साथ जीने का हक देता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए बहुत ही स्पष्ट गाइडलाइंस जारी की थीं। कोर्ट ने कहा था कि पहचान के लिए कोई सर्जरी जरूरी नहीं।
  • व्यक्ति जो महसूस करता है, वही उसकी असली कानूनी पहचान है। लेकिन 2024 का नया बिल इन पुरानी गाइडलाइंस के बिल्कुल उलट है। यह देश की न्यायपालिका और विधायिका के बीच टकराव की स्थिति है। कई कानूनी विशेषज्ञ इस नए बिल को पूरी तरह असंवैधानिक मान रहे हैं।
  • हमारा संविधान हर नागरिक को बराबरी का एक जैसा हक देता है। ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग भी इसी लोकतांत्रिक देश के सम्मानित नागरिक हैं। उन्हें अपनी पहचान के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर क्यों काटने पड़ें? सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला उनकी आजादी का एक बड़ा चार्टर था।
  • नया कानून उस आजादी पर एक प्रशासनिक ताला लगा रहा है। यह कानूनी लड़ाई अब फिर से देश की बड़ी अदालतों तक जाएगी। किसी भी कानून का मकसद आम लोगों की सुरक्षा करना होता है। लेकिन यहाँ कानून ही लोगों के मन में डर पैदा कर रहा है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय गरिमा को हमेशा सबसे ऊपर रखा था। नया बिल प्रशासनिक शक्ति और मेडिकल बोर्ड को सबसे ऊपर रखता है। इस बड़े विरोधाभास ने पूरे समुदाय को गहरे संकट में डाला है। न्याय की उम्मीद अब फिर से देश की ऊंची अदालतों पर है।

दुनिया के बदलते नियम और भारत

दुनिया के कई देशों में जेंडर पहचान के नियम बदल रहे हैं। पहले कई देशों में मेडिकल जांच को बहुत जरूरी माना जाता था। लेकिन धीरे-धीरे दुनिया ने "सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन" के अधिकार को अपना लिया है। अमेरिका के कैलिफोर्निया जैसे राज्यों ने बहुत ही उदार नियम बनाए।



वहां व्यक्ति की अपनी घोषणा को ही पहचान का आधार माना गया। ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों में भी पहले यही ट्रेंड देखा गया। हालांकि हाल के वर्षों में वहां भी कुछ राजनीतिक बहसें शुरू हुई हैं। कुछ देशों में नियमों को फिर से कड़ा करने की कोशिश हुई है।



भारत भी पहले आत्म-पहचान के प्रगतिशील रास्ते पर चल रहा था। 2014 के फैसले के बाद भारत की दुनिया भर में प्रशंसा हुई थी। लेकिन 2024 का संशोधन भारत को फिर से पीछे की ओर ले जाएगा। यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों के सिद्धांतों के भी बिल्कुल विपरीत माना जा रहा है।



दुनियाभर के मानवाधिकार संगठन इस बदलाव पर नजर रख रहे हैं। भारत को अपनी छवि एक समावेशी लोकतंत्र के रूप में बनाए रखनी है। लेकिन ऐसे कानून समावेशी समाज की राह में बड़ी बाधा बनते हैं। हमें दुनिया के सफल और मानवीय मॉडलों से कुछ सीखना चाहिए।



संघर्ष की नई और डिजिटल रणनीति

आज का आधुनिक दौर पूरी तरह से डिजिटल संचार का दौर है। ट्रांसजेंडर समुदाय अब बहुत एकजुट होकर अपनी लड़ाई लड़ रहा है। उन्होंने सूचनाएं साझा करने के लिए कई व्हाट्सएप ग्रुप बनाए हैं। इन ग्रुप्स पर बिल से जुड़ी पल-पल की जानकारी दी जाती है।



बिल के कठिन मसौदे का कई स्थानीय भाषाओं में अनुवाद हुआ है। ताकि देश के हर छोटे कोने तक यह जरूरी बात पहुंच सके। दिल्ली के साथ ही कोलकाता और मुंबई में भी बड़ी सभाएं हुईं। चेन्नई और इंदौर जैसे शहरों में भी लोग सड़कों पर उतर रहे हैं।



युवा ट्रांसजेंडर अपनी निजी कहानियां सोशल मीडिया पर साझा कर रहे हैं। वे दुनिया को बता रहे हैं कि कानूनी पहचान क्यों बहुत जरूरी है। यहां सर्वज्ञ की कहानी का जिक्र करना भी बहुत जरूरी है। सर्वज्ञ की उम्र 26 साल है और वह दिल्ली में काम करते हैं।



उनके अपने परिवार में पहचान को लेकर हमेशा बहुत तनाव रहता है। सर्वज्ञ के माता-पिता उनकी इस नई पहचान को स्वीकार नहीं करते। वे अक्सर कहते हैं कि सरकार जो कहेगी वही सच माना जाएगा। अगर कानून ही उन्हें मान्यता नहीं देगा तो परिवार कैसे मानेगा?



कानूनी मान्यता न होने से घरों में आपसी झगड़े बहुत बढ़ जाते हैं। सर्वज्ञ जैसे कई युवा घर और बाहर दोनों जगह लड़ रहे हैं। उनके लिए यह नया बिल सिर्फ कागज का एक टुकड़ा नहीं है। यह उनके पूरे अस्तित्व की लड़ाई का एक बहुत नया अध्याय है।



समुदाय के लोग अब हर शहर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं। वे देश के अलग-अलग राजनीतिक दलों से समर्थन मांग रहे हैं। यह संघर्ष अब बड़े शहरों से निकलकर छोटे गांवों तक जाएगा। समानता का यह रास्ता बहुत लंबा और कठिन दिखाई देता है।



लेकिन ट्रांसजेंडर समुदाय (ट्रांसजेंडर को आरक्षण)अब हार मानने को बिल्कुल तैयार नहीं है। वे अपनी पहचान और हक के लिए आखिरी सांस तक लड़ेंगे। उनकी एकजुटता ही इस लड़ाई की सबसे बड़ी और असली ताकत है। समाज को भी अब उनकी भावनाओं को समझना और स्वीकार करना होगा। Transgender Women reservation for transgender



लेख के स्रोत



  • द हिंदू (The Hindu) - रिपोर्टर: अभिनय लक्ष्मण और आशना बुतानी।
  • ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट बिल 2024 ड्राफ्ट।
  • नाल्सा (NALSA) बनाम भारत संघ, सुप्रीम कोर्ट ऐतिहासिक निर्णय (2014)।

FAQ

  1. ट्रांसजेंडर बिल 2024 में सबसे बड़ा और मुख्य बदलाव क्या है?
    सबसे बड़ा बदलाव जेंडर पहचान की प्रक्रिया में किया गया है। 2019 के कानून में कोई भी व्यक्ति अपनी पहचान खुद घोषित कर सकता था। अब नए 2024 के बिल में एक विशेष मेडिकल बोर्ड की जांच अनिवार्य होगी। इसके बाद ही जिला मजिस्ट्रेट (DM) तय करेंगे कि सर्टिफिकेट मिलेगा या नहीं।
  2. ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए नाल्सा (NALSA) फैसला क्यों ऐतिहासिक है?
    सुप्रीम कोर्ट का नाल्सा फैसला साल 2014 में सुनाया गया था। इसने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी पहचान खुद चुनने का मौलिक अधिकार दिया। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा का अधिकार माना। इस फैसले ने साफ किया था कि पहचान के लिए सर्जरी जरूरी नहीं।
  3. भारत में ट्रांसजेंडर सर्टिफिकेट के सरकारी आंकड़े क्या बताते हैं?
    2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 4.8 लाख से अधिक ट्रांसजेंडर हैं। हालांकि सरकारी पोर्टल पर अब तक केवल 35,000 आवेदन ही पहुंचे हैं। इनमें से लगभग 30,000 लोगों को ही अब तक सर्टिफिकेट मिल पाए हैं। करीब 5,000 आवेदन विभिन्न तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से खारिज हुए हैं।

ये खबरें भी पढ़िए...



Thesootr prime: गिग इकोनॉमी- OTP Please, नए जमाने के मजदूरों की कहानी



Thesootr Prime: बस्तर में खत्म हुई हिडमा की दहशत; दशकों की पीछा कहानी और आख़िरी मुकाबला



Thesootr Prime : केरल में खत्म हुई चरम गरीबी, जानिए EPEP प्रोग्राम से कैसे मिली ये सफलता



Thesootr Prime: सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा- मानहानि कानून के मामले अब गैर-आपराधिक बनें



Tags:
  • सोशल मीडिया
  • reservation for transgender
  • ट्रांसजेंडर को आरक्षण
  • Transgender Women
  • Transgender
  • ट्रांसजेंडर
  • मेडिकल बोर्ड
  • Thesootr Prime
  • NALSA
  • ट्रांसजेंडर राइट्स बिल 2024