17 जून का इतिहास: अंग्रेजों से लड़ते हुए जब वीरगति को प्राप्त हुईं रानी लक्ष्मीबाई
भारतीय इतिहास में सन 1857 का साल एक बहुत बड़ा मोड़ माना जाता है। इस दौरान देश में अंग्रेजों के क्रूर शासन के खिलाफ पहली बड़ी क्रांति हुई थी। इस महान स्वतंत्रता संग्राम में कई वीरों ने देश के लिए अपनी जान दी।
इन सभी महान योद्धाओं में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम सबसे ऊपर आता है। उन्होंने महिलाओं की एक मजबूत सेना बनाकर अंग्रेजी हुकूमत की जड़ों को हिला दिया था। उनका साहस देखकर अंग्रेज अफसर भी हैरान रह गए थे।
झांसी को अंग्रेजों से बचाने के लिए रानी ने अपनी आखिरी सांस तक संघर्ष किया। उनका नारा मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर हो गया। आइए जानते हैं उनके इस ऐतिहासिक बलिदान की पूरी कहानी।
कौन थीं रानी लक्ष्मीबाई
रानी लक्ष्मीबाई (झांसी की रानी) भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम (1857) की सबसे महान और वीर योद्धाओं में से एक थीं। उनका जन्म काशी (वाराणसी) में हुआ था और उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका (मनु) था।
झांसी के राजा गंगाधर राव से विवाह के बाद वे वहां की रानी बनीं। जब अंग्रेजों ने अपनी हड़प नीति (Doctrine of Lapse) के तहत झांसी की रियासत को हथियाने की कोशिश की, तो रानी लक्ष्मीबाई ने उनके सामने झुकने से साफ मना कर दिया।
उन्होंने मर्दाने कपड़े पहनकर, पीठ पर अपने दत्तक पुत्र को बांधकर अंग्रेजों के खिलाफ ऐतिहासिक युद्ध लड़ा। साल 1858 में ग्वालियर के मैदान में बहादुरी से लड़ते हुए वे देश के लिए वीरगति को प्राप्त हुईं।
जब रानी लक्ष्मीबाई ने संभाली झांसी की कमान
रानी लक्ष्मीबाई का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था और उनका नाम मणिकर्णिका था। बचपन से ही उन्हें घुड़सवारी और तलवारबाजी का बहुत शौक था। उनका विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव के साथ हुआ था।
शादी के बाद उन्हें लक्ष्मीबाई नाम मिला और वे झांसी की रानी बनीं। राजा के निधन के बाद अंग्रेजों ने झांसी को अपने कब्जे में लेना चाहा। अंग्रेजों की इस हड़प नीति का रानी ने पूरी ताकत से विरोध किया।
उन्होंने हार मानने की जगह अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का रास्ता चुना। रानी ने बहुत ही कम समय में अपनी एक कुशल सेना तैयार कर ली। इस सेना में महिलाओं को भी युद्ध की ट्रेनिंग दी गई थी।
झांसी से ग्वालियर तक रानी का ऐतिहासिक संघर्ष
जब अंग्रेजों ने झांसी के किले को चारों तरफ से घेर लिया तो रानी पीछे नहीं हटीं। वे अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर बांधकर किले से बाहर निकल गईं। वहां से वे कालपी पहुंचीं और फिर ग्वालियर का रुख किया।
ग्वालियर का किला उस समय सामरिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता था। रानी लक्ष्मीबाई ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर ग्वालियर के किले पर अपना नियंत्रण कर लिया। इस बात से अंग्रेज सरकार पूरी तरह बौखला गई थी।
अंग्रेज जनरल ह्यूरोज ने एक बहुत बड़ी सेना लेकर ग्वालियर पर हमला कर दिया। 17 और 18 जून 1858 को ग्वालियर के पास दोनों सेनाओं में भयंकर युद्ध हुआ। रानी खुद अपनी तलवार लेकर मैदान में उतर गईं।
अंग्रेजों से लड़ते हुए जब वीरगति को प्राप्त हुईं रानी
ग्वालियर के युद्ध के मैदान में रानी लक्ष्मीबाई ने अदम्य साहस का परिचय दिया। उन्होंने मर्दाने कपड़े पहनकर अंग्रेज सैनिकों के छक्के छुड़ा दिए थे। उनकी तलवार के सामने कोई भी अंग्रेज सैनिक टिक नहीं पा रहा था।
लड़ते-लड़ते रानी का घोड़ा अचानक एक सोनरेखा नाम के नाले के पास रुक गया। नया घोड़ा होने के कारण वह उस नाले को पार नहीं कर पा रहा था। इसी बीच अंग्रेज घुड़सवारों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया।
पीछे से एक अंग्रेज सैनिक ने रानी के सिर पर तलवार से हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी रानी ने उस सैनिक को मार गिराया। इसके बाद अत्यधिक खून बहने के कारण वे धरती पर गिर गईं।
रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम संस्कार
घायल अवस्था में वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के सैनिक उन्हें पास के एक संत की कुटिया में ले गए। रानी नहीं चाहती थीं कि उनका पवित्र शरीर अंग्रेजों के हाथ लगे। इसलिए उन्होंने अपने सैनिकों से तुरंत अंतिम संस्कार करने को कहा।
कुटिया (रानी लक्ष्मीबाई समाधि) के भीतर ही उनका अंतिम संस्कार किया गया और वे हमेशा के लिए अमर हो गईं। उनके इस सर्वोच्च बलिदान ने पूरे देश में देशभक्ति की एक नई लहर पैदा कर दी। अंग्रेज जनरल ह्यूरोज ने भी उनकी बहादुरी की तारीफ की थी।
ह्यूरोज ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि विद्रोहियों में रानी सबसे खतरनाक योद्धा थीं। रानी लक्ष्मीबाई की यह कहानी आज भी हर स्कूल और घर में बड़े गर्व से सुनाई जाती है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि मातृभूमि (jhansi ki rani)का सम्मान सबसे बढ़कर है।
17 जून की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएं
आज का इतिहास मेंहर दिन का अपना एक अलग महत्व होता है। 17 जून का दिन भी इतिहास (आज की यादगार घटनाएं) में कई महत्वपूर्ण घटनाओं के लिए दर्ज है। इस दिन दुनिया में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने इतिहास की दिशा बदल दी।
आइए जानते हैं 17 जून (आज की तारीख का इतिहास) को भारत और विश्व में घटी कुछ प्रमुख घटनाओं के बारे में, जो आपके सामान्य ज्ञान को बढ़ा सकती हैं-
विश्व और भारत इतिहास की प्रमुख घटनाएं...
- 1994: उत्तरी कोरिया अपने देश में अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को बने रहने देने पर सहमत हुआ।
- 1999: जेकब जुमा दक्षिण अफ्रीका के उपराष्ट्रपति बने और कारगिल युद्ध के दौरान ISI ने 'कारगिल जेहाद फंड' बनाया।
- 2001: नेपाल शाही परिवार हत्याकांड में डॉक्टरों ने खुलासा किया कि प्रिंस दीपेंद्र के खून में शराब का अंश नहीं था।
- 2002: पाकिस्तान के कराची में सुरक्षा समीक्षा के बाद अमेरिकी वाणिज्य दूतावास को दोबारा खोला गया।
- 2003: फ्रांस की पुलिस ने देश में सक्रिय 165 ईरानी आतंकवादियों को गिरफ्तार किया।
- 2004: मंगल ग्रह पर पृथ्वी की चट्टानों जैसे पत्थर मिले और बगदाद में सेना भर्ती केंद्र पर हुए ब्लास्ट में 42 लोग मारे गए।
- 2008: भारत में बने हल्के लड़ाकू विमान 'तेजस' का बेंगलुरु में सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया।
- 2008: रूस ने साल 2012 तक अपने सभी विनाशकारी रासायनिक हथियारों को नष्ट करने का कदम बढ़ाया।
- 2008: कनाडा सरकार ने 'तमिल वर्ल्ड मूवमेंट' (TWM) संगठन को आधिकारिक तौर पर आतंकवादी सूची में डाला।
- 2012: भारतीय बैडमिंटन स्टार साइना नेहवाल ने तीसरी बार इंडोनेशिया ओपन का खिताब अपने नाम किया।
- 1973: भारत के सबसे सफल और महान टेनिस खिलाड़ियों में से एक लिएंडर पेस का जन्म हुआ।
- 1981: बॉलीवुड की मशहूर और लोकप्रिय अभिनेत्री अमृता राव का जन्म हुआ।
- 1970: हिंदी सिनेमा के जाने-माने फिल्म निर्देशक और बेहतरीन अभिनेता निशिकांत कामत का जन्म हुआ।
- 1945: भारत के भूतपूर्व लोकसभा महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पी. डी. टी. आचार्य का जन्म हुआ।
- 1942: उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ राजनीतिज्ञ भगत सिंह कोश्यारी का जन्म हुआ।
- 1903: असम के प्रसिद्ध साहित्यकार, स्वतंत्रता सेनानी और फिल्म निर्माता ज्योति प्रसाद अग्रवाल का जन्म हुआ।
- 1887: देश के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश नाथ काटजू का जन्म हुआ।
- 2015: भारत के भूतपूर्व और 28वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) मदन मोहन पुंछी का निधन हुआ।
- 1928: ओड़िशा के प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, कवि और सामाजिक कार्यकर्ता गोपबंधु दास का निधन हुआ।
- 1895: भारत के प्रसिद्ध सामाजिक सुधारक और महान कार्यकर्ता गोपाल गणेश आगरकर का निधन हुआ।
- 1862: भारत के पहले वाइसराय और कुशल ब्रिटिश राजनीतिज्ञ लॉर्ड कैनिंग का निधन हुआ।
- 1858: 1857 की क्रांति की महान वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई (Rani Laxmibai Samadhi) ग्वालियर के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुईं।
- 1674: छत्रपति शिवाजी महाराज की माता और शाहजी भोंसले की पत्नी राजमाता जीजाबाई का निधन हुआ।
- 1631: मुगल बादशाह शाहजहाँ की बेगम मुमताज़ महल (आसफ़ ख़ाँ की पुत्री) का बुरहानपुर में निधन हुआ।
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