25 दिसंबर 1861: स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षाविद् महामना पं. मदनमोहन मालवीय का जन्म
Vikram Jain | Dec 25, 2024, 02:41 IST
'महामना' पंडित मदनमोहन मालवीय। Photograph: (BHOPAL)
'महामना' के सम्मान से विभूषित पंडित मदनमोहन मालवीय न केवल काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक थे, बल्कि उन्होंने भारतीय समाज को एकजुट करने, भारतीय संस्कृति को पुनः जागृत करने और शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन लाने के लिए जीवनभर संघर्ष किया।
पंडित मदनमोहन मालवीय जी का स्मरण आते ही सबका ध्यान काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर चला जाता है। यह संस्थान केवल एक विश्वविद्यालय भर नहीं अपितु भारत राष्ट्र की संपूर्णता की छविकृति है। यह महामना पंडित मदनमोहन मालवीय की उस स्वप्न का साकार है, जो उन्होंने भारत को एक गौरवमयी राष्ट्र के लिए पीढ़ी निर्माण के लिए देखा था। मालवीय जी बहुआयामी प्रतिभा और व्यक्तित्त्व के धनी थे। इसीलिए उन्हें "महामना" का सम्मान मिला। उनसे पहले और उनके बाद यह सम्मान किसी को नहीं मिला।
पत्रकारिता, वकालत, समाज सुधार, स्वभाषा, स्वसंस्कृति और मां भारती की सेवा में अपना संपूर्ण जीवन अर्पण करने वाले महामानव पंडित मदनलाल मालवीय का जन्म 25 दिसंबर 1861 को प्रयागराज में हुआ। उनके पिता पंडित ब्रजनाथ जी संस्कृत के प्रकांड विद्वान और भगवताचार्य थे। माता मोनादेवी भारतीय परंपराओं और संस्कृति के प्रति समर्पित एक आदर्श गृहिणी थीं। जन्म के समय उनका मदन मोहन रखा गया। वे सात भाई बहनों में पांचवे क्रम पर थे। उनसे से चार बड़े और दो छोटे भाई थे। उनके पूर्वज मालवा प्रांत के मूल निवासी थे, लेकिन सल्तनतकाल की उथल-पुथल के बीच प्रयाग पहुंचे और वहीं बस गए। मालवा मूल का होने के कारण ही "मालवीय" कहलाए और यही उपनाम हो गया।
महामना पंडित मदनमोहन मालवीय के पूर्वजों की पृष्ठभूमि वैदिक और सांस्कृतिक समर्पण की थी। विषमताओं के बीच भी परिवार ने अपने आंतरिक वातावरण में संस्कृत और वैदिक संस्कारों की परंपरा बनाए रखी। बालक मदन मोहन को संस्कृत, संस्कृति और परंपराओं के प्रति समर्पण का यह संकल्प परिवार में मिला। पांच साल की आयु में पंडित हरदेव धर्म ज्ञानोपदेश पाठशाला भेजे गए। संस्कृत सहित प्राइमरी परीक्षा उत्तीर्ण कर आगे शिक्षा के लिए प्रयाग की विद्यावर्धिनी विद्यालय गए। फिर जिला स्कूल। पढ़ाई के साथ सृजनशीलता का स्वभाव बचपन से रहा।
पढ़ाई के साथ पंडित मदनमोहन मालवीय ने "मकरंद" उपनाम से कविताएं लिखना आरंभ की। जो स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं।1879 में उन्होंने म्योर सेंट्रल कॉलेज से प्रथम श्रेणी में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। छात्रवृत्ति स्वीकृति हुई और आगे की शिक्षा के लिए वे कलकत्ता पहुंचे। 1884 में बीए परीक्षा उत्तीर्ण की। वे हर परीक्षा में प्रथम श्रेणी आते और अपने व्यक्तित्व से सदैव लोकप्रिय रहते। उनकी सरल, निश्चल, संकल्पनिष्ट और मौलिक जीवन शैली, द्वेष रहित चिंतन, सदैव सेवा सहायता के लिए तत्पर रहना, नियमित व्यायाम करना, मितभाषी और जो बोलना वह सटीक शब्दों में बोलना। यही उनका सिद्धांत था जिससे उन्होंने अपने सहपाठियों और शिक्षक जनों को भी प्रभावित किया। और उनका यही जीवन सिद्धांत अंतिम सांस तक रहा।
जो वृक्ष जितना विशाल और छायादार होता है उसका निर्माण उसके सशक्त बीज और जड़ों के आरंभिक विकास पर निर्भर करता है। मदनमोहन जी की शिक्षा उनके शिशुकाल के संस्कारों से ही आरंभ हो गई थी। संस्कृत का आरंभिक ज्ञान, सबेरे जल्दी उठकर सूर्योदय तक नियमित व्यायाम, पूजन पाठ, समय पर भोजन आदि का अभ्यास बचपन से कराया गया था। उनकी यह दिनचर्या प्रयाग के मेयो स्कूल से लेकर कलकत्ता विश्वविद्यालय तक नियमित रही। कोई कल्पना कर सकता है उस सात वर्षीय बालक के आत्मविश्वास की जो माघ मेले में मूढ़े पर खड़ा होकर संस्कृत में प्रवचन करता हो। मदन मोहन जी को यह विलक्षण प्रतिभा अपने परिवार के संस्कारों से मिली थी। उनकी गणना सर्वश्रेष्ठ हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी के व्याख्यान वाचस्पतियों में होने लगी थी। उनके व्याख्यानों में संस्कृति और धर्मोपदेश, परतन्त्र भारत एवं परतंत्रता की का वर्णन भी होता था।
पंडित मदनमोहन मालवीय के प्रवचन आध्यात्मिक स्वरूप के होते थे इसलिए प्रारंभ में सरकारी तंत्र का ध्यान उनकी ओर न गया। इसका लाभ उठाकर उन्होंने देश भर की यात्रा की और सभा सम्मेलनों में व्याख्यान दिए। समय के साथ उनके व्याख्यान में आध्यात्मिक पक्ष कमजोर हुआ और सामाजिक एवं राष्ट्रीय स्वाभिमान का स्वरूप उभरने लगा। इसी दिशा में रौलट एक्ट के विरोध में उनका साढ़े चार घंटे का व्याख्यान देश भर में प्रसिद्ध हुआ और सभी प्रसिद्ध व्यक्तियों का ध्यान उनकी ओर गया।
पंडित मदनमोहन मालवीय जी युवा अवस्था से ही स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गए थे। उनकी गणना कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में होती थी। उन्होंने विधिवत सदस्यता कांग्रेस के द्वितीय कलकत्ता अधिवेशन में ली। कांग्रेस के 1892 के प्रयागराज अधिवेशन में भारतीयों नागरिक अधिकार और सम्मान वृद्धि का प्रस्ताव रखने वाले पंडित मदन मोहन मालवीय ही थे। स्वतंत्रता संग्राम की दिशा में कांग्रेस को गति देने में इसी प्रस्ताव की भूमिका थी। कांग्रेस अधिवेशनों में वंदेमातरम गीत गायन आरंभ कराने वालों में भी अग्रणी मालवीय जी ही थे।
1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान 4 फरवरी 1922 को चौरीचौरा कांड हो गया। इससे क्षुब्ध होकर गांधीजी ने सत्याग्रह समाप्त करने की घोषणा कर दी। इससे कांग्रेस भारी मतभेद हुए और असंतोष भी फैला तब कांग्रेस में एकता के लिये सभी पक्षों में समन्वय बनाने और आंदोलन का वातावरण बनाए रखने के लिए मालवीय जी ने पेशावर से डिब्रूगढ़ तक पदयात्रा की थी। तब उनकी आयु 61 वर्ष हो चुकी थी। लेकिन उन्होंने बढ़ती आयु की परवाह न की। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलम में गिरफ्तार कर लिए गए। रिहाई के बाद दिल्ली आए और उसी साल फिर बंदी बनाकर नैनी जेल भेज दिए गए। इन विषमताओं में भी उनकी साधना और जीवनचर्या में परिवर्तन न आया।
असहयोग आंदोलन में खिलाफत आंदोलन सम्मिलित करने और स्वतंत्रता आंदोलन में मुस्लिम समाज को सहभागी बनाने के लिए मुस्लिम समाज को विशेषाधिकार देने के पक्षधर मालवीय जी नहीं थे। किन्तु वे स्वयं भी कांग्रेस में रहे और अन्य लोगों में भी समन्वय बनकार कांग्रेस से जोड़े रखा। उनका मानना था कि समानांतर संगठन स्वराज्य के आंदोलन को कमजोर करेंगे। इसलिए सबको एकजुट होकर और एक ही बैनर पर स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना।
आंदोलन के दौरान जब कांग्रेस में नरम दल और गरम दल दो अंतर्धाराएँ बनीं तब इनके बीच समन्वयक की भूमिका में मालवीय जी ही रहे। एनी बेसेंट ने उनके बारे में कहा था- "मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि विभिन्न मतों के बीच, केवल मालवीयजी भारतीय एकता की मूर्ति बने खड़े हुए हैं।" मालवीय जी का उद्देश्य श्रेय नहीं स्वत्व और स्वराज्य था। उनका पूरा जीवन इसी लक्ष्य के लिये समर्पित रहे। वे दो बार कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने।
महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी का जीवन राष्ट्र, संस्कृति और धर्म के लिए समर्पित रहा। वे कहते थे "यदि प्राण भले चले जाए पर धर्म न जाये"। महामना के चिंतन में धारणीय कर्तव्य का पालन था। स्वाधीनता संघर्ष में उन्हें यह आभास हो गया था कि स्वतंत्रता को दीर्घ जीवी बनाने के लिये समाज में स्वत्व, सांस्कृतिक और स्वाभिमान जागरण आवश्यक है। उन्होंने अपने समकालीन विद्वतजनों से संपर्क किया। जिनमें पंडित मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपत राय, महात्मा गांधी, तिलक जी, डॉक्टर हेडगेवार, सावरकर जी, आदि सभी से चर्चा की और अपना मार्ग निश्चित किया। उन्होंने सभी दिशाओं में कार्य आरंभ किया।
भारतीय वाड्मय के अनुसंधान के लिए ब्राह्मण संगठन की स्थापना की और आने वाली पीढ़ी को शिक्षित, सुसंस्कृत करने के लिए बनारस में हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की। भारत राष्ट्र के प्रति सांस्कृतिक स्वत्व के बोध के लिए "सत्यमेव जयते" को घोष वाक्य बनाने का सुझाव पंडित मदनमोहन मालवीय जी ने ही दिया था।
पंडित मदनमोहन मालवीय जी का पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान अत्यधिक महत्वपूर्ण था। पंडित मदनमोहन मालवीय जी ने 1887 से हिंदी अंग्रेजी समाचार पत्र "हिन्दुस्तान" का संपादन किया। इसके साथ पंडित अयोध्यानाथ के "इण्डियन ओपीनियन" के संपादन में सहयोगी रहे। 1907 में "साप्ताहिक अभ्युदय" निकाला। 1909 में समाचार पत्र दैनिक 'लीडर' का प्रकाशन आरंभ किया। 1924 में दिल्ली आकर "हिन्दुस्तान टाइम्स" को सुव्यवस्थित किया और लाहौर से "विश्वबंधु" का प्रकाशन आरंभ किया। यह समाचार पत्र पूरी तरह सनातन सिद्धांत के लिए समर्पित था।
स्वभाषा उत्थान के लिए मालवीय जी ने 1910 में हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना की और अपने पहले अध्यक्षीय उद्बोधन में हिंदी भाषा की शुद्धता पर जोर दिया और कहा कि "हिंदी के स्वरूप में फारसी अरबी के बड़े-बड़े शब्दों से लादना जैसे बुरा है, वैसे ही अकारण संस्कृत शब्दों से गूंथना भी अच्छा नहीं है" उन्होंने भाषा की शुद्धता के साथ सरलता पर भी जोर दिया था। यह भी समझाया था कि "हिंदी राष्ट्रीयता का प्रतीक है" उन्होंने यह भविष्यवाणी भी की थी कि "एक दिन ऐसा भी आएगा जब हिन्दी का सर्वत्र प्रचार होगा।
उन्होंने अनेक सनातन संगठनों को सहयोग देकर उनके माध्यम से सामाजिक जागरण और समाज समरसता का अभियान चलाया। कलकत्ता, काशी, प्रयाग और नासिक में सेवा वर्गो विशेषकर वाल्मीकि और चर्मशिल्प समाज को धर्मोपदेश और मंत्रदीक्षा दी। उनके इन कार्यों की नेहरूजी और गांधीजी सहित सभी मनीषियों ने प्रशंसा की थी।
मालवीय जी ने प्रयाग में भारती भवन पुस्तकालय, मैकडोनेल यूनिवर्सिटी हिन्दू छात्रालय और मिण्टो पार्क की स्थापना की। हरिद्वार में ऋषिकुल, गौरक्षा, आयुर्वेद सम्मेलन तथा सेवा समिति, स्काउट गाइड तथा सेवा क्षेत्र की अनेक संस्थाओं की स्थापना की। इसके साथ ही इस दिशा में काम कर रहीं अन्य संस्थाओं को भी प्रोत्साहित किया। उनके द्वारा संस्थापित काशी हिंदू विश्वविद्यालय उनके दूरदर्शी चिंतन, भविष्य के भारत की संकल्पना तथा आध्यात्मिक शक्ति का प्रतिबिंब है। इस विश्वविद्यालय का ध्येय सनातन समाज के स्वत्व और स्वाभिमान के अनुरूप भविष्य की पीढ़ी का निर्माण करना है। इसके पाठ्यक्रम में भारत की प्राचीन सभ्यता, महत्ता, संस्कृत और सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक विज्ञान की शिक्षा को जोड़ा गया है। उसके विशाल परिसर के मध्य विशाल विश्वनाथ मंदिर में भारतीय संस्कृति स्थापत्य कला की सजीव स्मृति है। वे ऐसे महापुरुष थे कर्म ही जिनका जीवन था। वे विभिन्न संस्थाओं के जनक ही नहीं सफल संचालक और व्यवस्थापक भी थे । सदैव मृदु भाषा का प्रयोग करना उनकी विशेषता था।
राष्ट्र, संस्कृत, संस्कृति और सनातन समाज की सतत सेवा में समर्पित महामना ने 12 नवंबर 1946 को अपनी देह त्यागी। जीवन की अंतिम सांस तक मालवीयजी अपने सत्याचरण, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, देशभक्ति तथा आत्मत्याग के मार्ग पर चले। वे इन विषयों पर केवल उपदेश ही नहीं दिया करते थे अपितु यही उनका आचरण और व्यवहार था। उनके संसार छोड़ने के लगभग अट्ठावन वर्ष बाद 24 दिसंबर 2014 को भारत सरकार ने उन्हें भारत रत्न से अलंकृत किया।
पंडित मदनमोहन मालवीय का जीवन दर्शन
संस्कृत और संस्कृति के प्रति समर्पण की परंपरा
'मकरंद' के रूप में साहित्यिक यात्रा की शुरुआत
बालवय से व्यक्तित्व का निर्माण
देश भर में प्रसिद्ध हुआ साढ़े चार घंटे का व्याख्यान
स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी योद्धा
कांग्रेस की दिशा और असहयोग आंदोलन में भूमिका
मुस्लिम समाज की भूमिका पर दृष्टिकोण
दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष और स्वतंत्रता संग्राम में नेतृत्व
स्वत्व और स्वाभिमान जागरण के लिए जीवन का समर्पण
बनारस में हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना
पंडित मदनमोहन मालवीय का पत्रकारिता सफर
हिंदी की शुद्धता और सरलता पर बल
वाल्मीकि और चर्मशिल्प समाज के लिए धर्मोपदेश
संस्कृत, संस्कृति और सनातन समाज के उत्थान में योगदान
12 नवंबर 1946 को हुआ था निधन
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