विचार मंथन: लोगों के साथ चलेंगे, कलेक्टर साहब?
लेखक- दुव्वुरी सुब्बाराव
(लेखक भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर हैं)
विचार मंथन द सूत्र:आईएएस (IAS - Indian Administrative Service) करियर की शुरुआत में एक गांव के दौरे पर मैं कुछ आदिवासी किसानों के साथ नीम के पेड़ के नीचे बैठा था। गांव का मुखिया बता रहा था कि सिंचाई टैंक में महीनों पहले स्वीकृत मरम्मत अभी तक क्यों नहीं हुई। मेरे दफ्तर की फाइल में यह काम "क्रियान्वयन में" दर्ज था।
जब मैंने यह बात कही तो ग्रामीण हंस पड़े। ठेकेदार बस एक बार आया था, माप लिया और गायब हो गया। वह सिंचाई टैंक सिर्फ सरकारी कागजों में था। यही मेरा पहला सबक था कि कागज पर प्रशासन और जमीनी हकीकत में कितना फर्क होता है।
पर्वतीपुरम की पहली पोस्टिंग
उत्तरी तटीय आंध्र में पर्वतीपुरम के सब-कलेक्टर के रूप में मेरी पहली पोस्टिंग 1970 के दशक के मध्य में हुई थी। यह एक विशाल उपखंड था जिसमें हजार से ज्यादा गांव, आदिवासी इलाके, पहाड़ और मैदान थे। मैं उत्साह से भरा था, पर अनुभव कम था। सीखने का एकमात्र रास्ता था गांव-गांव घूमना। जहां जीप जाए वहां जीप से, जहां न जाए वहां पैदल।
एक दिन कई आदिवासी बस्तियों में पैदल चलते-चलते थक कर इंस्पेक्शन बंगले पर लौटा। बाद में एक वरिष्ठ अधिकारी ने पूछा कि क्या मैंने कभी किसी आदिवासी गांव में रात बिताई है। मुझे शर्मिंदगी के साथ मानना पड़ा कि मैंने बंगले की सुविधा चुन ली थी। वे निराश हुए। उनकी बात सीधी थी कि जब तक आप लोगों की जिंदगी खुद नहीं जीते, आपकी समझ सतही ही रहेगी।
फाइल और असलियत का फर्क
फील्डवर्क ने यह भी सिखाया कि किसी समस्या को खुद देखना और फाइल में पढ़ना, दोनों बिल्कुल अलग अनुभव हैं। एक बार दिन के अंत में घबराए हुए ग्रामीण दौड़े आए। उन्होंने बताया कि एक बाघ उनके गांव के आसपास तबाही मचा रहा है। वह मवेशियों को उठा चुका था और एक मासूम बच्चे को भी।
मैंने उन्हें आश्वासन दिया, पर भीतर से सोच रहा था कि एक नौसिखिया सब- कलेक्टर आखिर बाघ के मामले में क्या करे? करीब पांच दशक बाद मैं एक निजी दौरे पर पर्वतीपुरम लौटा। यह देखने गया था कि वहां क्या बदला। दौरे के अंत में मैं भावना से मिला, एक युवा आईएएस अधिकारी जो उस वक्त सब-कलेक्टर थीं। छियालीस साल बाद मेरी उत्तराधिकारी। बातों-बातों में मैंने पूछा कि वे मुख्यालय से बाहर कितनी बार जाती हैं।
उनका जवाब सीधा था। "सर, मैं ज्यादा जाना चाहती हूं, पर हमेशा कहीं न कहीं बुलावा रहता है। फिर, आज का प्रशासन आपके जमाने से बहुत अलग है। स्टाफ जो वीडियो भेजता है, उससे मुझे पता चल जाता है। किसी भी स्थिति को रियल टाइम में देख सकती हूं और सभी से एक साथ कॉन्फ्रेंस कर सकती हूं। गांव-गांव जाने से यह ज्यादा असरदार है।"
उनकी बात में दम था। टेक्नोलॉजी ने शासन की तस्वीर बदल दी है। आज एक जिला अधिकारी स्मार्टफोन से पूरे जिले पर नजर रख सकता है, जो 1970 के दशक में सोचा भी नहीं जा सकता था।
लेकिन टेक्नोलॉजी विकल्प नहीं है
फिर भी, टेक्नोलॉजी जिए हुए अनुभव की जगह नहीं ले सकती। अपनी आंखों से किसी हालात को देखना एक अलग समझ देता है, एक संवेदनशीलता देता है जो कोई वीडियो क्लिप नहीं दे सकती। जब आप किसी गांव के घर में बैठते हैं, टूटी नहर के किनारे चलते हैं या बिना बताए किसी स्कूल में पहुंच जाते हैं, तो आप वह देखते हैं जो रिपोर्टें कभी नहीं बता सकतीं।
आरबीआई (RBI - Reserve Bank of India), जहां मैंने गवर्नर के रूप में काम किया, वहां बेहद काबिल पेशेवर थे। लेकिन उनका फील्ड एक्सपोजर बहुत कम था। इसे दूर करने के लिए हमने देशभर के गांवों में आउटरीच विजिट शुरू की। कॉन्फ्रेंस रूम में बनी नीतियों को एकदम इंसानी चेहरा मिला। ग्रामीण कर्जदारों, बैंकिंग कॉरेस्पॉन्डेंट और सूक्ष्म उद्यमियों से बातचीत में नीतिगत इरादे और जमीनी हकीकत के बीच की खाई सामने आई, जो किसी और तरीके से कभी पता नहीं चलती।
आईएएस की असली ताकत
आईएएस की बुनियादी सोच यह है कि नीति-निर्माण के शीर्ष पर अनुभव की व्यापकता संकीर्ण विशेषज्ञता से ज्यादा जरूरी है। नीति बनाने वाले को विशेषज्ञों की सलाह समझनी होती है और उसे भारत की असली तस्वीर से जोड़ना होता है।
मान लीजिए रोजगार गारंटी योजना यानी मनरेगा (MGNREGA - Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act) के प्रशासन को सुधारना हो। ग्रामीण विकास के किसी प्रोफेसर ने इस विषय पर दर्जनों शोधपत्र लिखे होंगे।
लेकिन एक आईएएस अधिकारी जिसने गांवों में बरसों बिताए हों, देखा हो कि जॉब कार्ड कैसे बनते हैं, मस्टर रोल कैसे भरे जाते हैं और मजदूरों को भुगतान कैसे पहुंचता है, वह बेहतर समझेगा कि क्या बदलना है।
फील्ड का यह अनुभव ही आईएएस की असली पूंजी है। यही इस सेवा को तकनीकी विशेषज्ञों और दूसरी सिविल सेवाओं से अलग और वरिष्ठ नीतिगत भूमिकाओं में बेहतर बनाता है। अगर आईएएस अधिकारी दफ्तरों, बैठकों और डैशबोर्ड में सिमट जाएं, तो वे वही योग्यता खो देंगे जो उन्हें 'प्रीमियर' सेवा बनाती है।
दरअसल विकास योजनाएं सचिवालयों में बनती हैं और बजट में स्वीकृत होती हैं, लेकिन उनकी सफलता या असफलता का फैसला जमीन पर होता है।
जो कलेक्टर दफ्तर में बैठता है, वह एक कुशल प्रशासन चला सकता है। जो कलेक्टर खेतों में चलता है, लोगों से बात करता है और समस्याएं खुद देखता है, वह एक सार्थक प्रशासन चलाएगा।
साभार: टाइम्स ऑफ इंडिया
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