OTT पर दिखाया जा रहा भारत - क्या यही है असली सच?
The Sootr | Jun 22, 2026, 12:11 IST
लेखक कैलाश चन्द्र
OTT प्लेटफॉर्म मनोरंजन की आड़ में भारतीय सभ्यता, हिंदू समाज और परिवार संस्था को लगातार निशाना बना रहे हैं। यह क्रिएटिव फ्रीडम नहीं, बल्कि सुनियोजित सांस्कृतिक युद्ध है…
मनोरंजन की आड़ में सांस्कृतिक जहर
यह अब केवल वेब-सीरीज, फिल्मों, बोल्ड कंटेंट या नई पीढ़ी की पसंद का मामला नहीं रह गया है। यह एक बड़े सांस्कृतिक, वैचारिक और मनोवैज्ञानिक अभियान का हिस्सा बन चुका है।
इस अभियान में भारत की सभ्यतागत स्मृति, हिंदू समाज की छवि, परिवार संस्था की गरिमा और सामाजिक आत्मविश्वास को सुनियोजित ढंग से चोट पहुंचाई जा रही है।
यह हमला हमेशा प्रत्यक्ष नहीं होता। यह अक्सर कहानी, किरदार, दृश्य, संवाद, व्यंग्य, फ्रेमिंग और चयनित यथार्थ के माध्यम से किया जाता है। परिणाम यह होता है कि दर्शक को लगता है वह केवल मनोरंजन देख रहा है, जबकि वास्तव में उसके मन में भारत के प्रति वितृष्णा, हिंदू प्रतीकों के प्रति उपहास, परिवार के प्रति अविश्वास और नैतिकता के प्रति संशय रोपा जा रहा होता है।
OTT पर भारत की छवि - यथार्थ या नैरेटिव इंजीनियरिंग?
कहा जाता है कि समाज में यही सब है, इसलिए हम वही दिखा रहे हैं। वहीं, प्रश्न यह है - क्या समाज में केवल यही है?
क्या भारत की कथा में त्याग, करुणा, धर्म, निष्ठा, परिवार, श्रद्धा, लोक-संस्कृति, तप, संघर्ष, मातृत्व, शौर्य और सामुदायिक सहकार नहीं है? यदि किसी सभ्यता के हजारों रंगों में से बार-बार केवल उसका सबसे अंधेरा, सबसे कुरूप, सबसे विघटित चेहरा चुनकर दिखाया जाए तो यह यथार्थ का निष्पक्ष चित्रण नहीं, बल्कि नैरेटिव इंजीनियरिंग है।
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भारतीय राज्यों को कैसे दिखाया जाता है?
उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश… इन प्रदेशों को बार-बार ऐसी दृश्य-भाषा में दिखाया जाता है कि वे सभ्यता नहीं, अपराधशाला प्रतीत हों।
और यदि किसी धार्मिक, पारंपरिक या हिंदू-सांस्कृतिक पात्र को कहानी में जगह मिलती भी है, तो वह प्रायः या तो पाखंडी होता है, या अपराधी, या वासनाग्रस्त, या फिर क्रूर सत्ता-लोभी।
क्या यह केवल संयोग है? या भारत की छवि को एक खास वैचारिक सांचे में ढालने की सोची-समझी कोशिश?
हिंदू समाज: स्थायी खलनायक का निर्माण
सभ्यतागत आलोचना नहीं - आत्मद्वेष
जाति का प्रश्न हो, पितृसत्ता का, सामंती हिंसा का, धार्मिक पाखंड का, नैतिक विघटन का… खलनायक का चेहरा बहुत बार वही बनता है जो पारंपरिक, धार्मिक, ग्रामीण, पारिवारिक या हिंदू-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आता है।
इससे भी अधिक खतरनाक यह है कि कहानी का नैतिक निष्कर्ष धीरे-धीरे दर्शक के भीतर यह बैठाता है कि भारतीय परंपरा स्वयं समस्या है।
धर्म, परिवार, विवाह, जातीय-सामाजिक संरचना, गुरु-शिष्य परंपरा, पुरुषत्व, मातृत्व, सामाजिक बंधन… सब कुछ संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया जाता है।
समाज की बुराई दिखाना और सभ्यता पर अभियोग - फर्क समझना जरूरी
पर यदि हर कथा का निष्कर्ष यह हो कि भारतीय सभ्यता का मूल ही दमनकारी, हिंसक और पाखंडी है तो यह सामाजिक आलोचना नहीं, सभ्यतागत अभियोग है।
एक स्वस्थ समाज आत्मालोचना करता है। वहीं, आत्मालोचना और आत्मद्वेष में फर्क होता है। आज OTT का एक बड़ा हिस्सा इसी आत्मद्वेष को आधुनिकता, प्रगतिशीलता और यथार्थवाद के पैकेज में बेच रहा है।
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सीधा हमला नहीं - चयनित अंधकार की रणनीति
रणनीति कैसे बदली?
अब सीधा अपमान कम, सांस्कृतिक विघटन अधिक दिखने लगा।
धर्म को सीधे गाली देने की बजाय -
- परिवार को विषैला दिखाओ
- विवाह को जेल दिखाओ
- पुरुषत्व को हिंसक दिखाओ
- स्त्री-स्वतंत्रता को केवल यौन अराजकता से जोड़ो
- गांव-कस्बे को पिछड़ेपन और अपराध से भर दो
सभ्यताओं की पराजय कैसे होती है?
यदि नई पीढ़ी यह मानने लगे कि उसकी संस्कृति केवल पाखंड है, उसका धर्म केवल सत्ता का उपकरण है, उसका परिवार केवल दमन का तंत्र है, और उसका इतिहास केवल शर्म की कहानी है - तो समझिए आधी लड़ाई बिना युद्ध के जीत ली गई।
OTT इसी मनोवैज्ञानिक युद्ध का हथियार बन चुका है।
दर्शक अब क्या पूछ रहे हैं?
- कौन अपराधी चुना गया?
- कौन धार्मिक है?
- किसे मानवीय गहराई दी गई और किसे व्यंग्यचित्र (Caricature) बना दिया गया?
समाज पर प्रभाव: अपराध का ग्लैमर, परिवार का अवमूल्यन
मनोरंजन उद्योग समाज की कल्पना को गढ़ता है। वह तय करता है कि क्या कूल है, क्या रूढ़िवादी (Retrograde) है, क्या सामान्य (Normal) है, क्या प्रतिगामी (Regressive) है?
जब अपराधी पात्रों को स्टाइल, स्मार्टनेस और विद्रोह का प्रतीक बनाया जाता है - अपराध की दृश्य-संवेदना बदलती है।
जब विवाह और परिवार को बार-बार धोखे, दमघोंटू नियंत्रण और यौन पाखंड की प्रयोगशाला की तरह दिखाया जाता है - परिवार संस्था की सामाजिक प्रतिष्ठा कमजोर होती है।
जब गाली, व्यभिचार, नशा और हिंसा को रियल जीवन की भाषा बताकर लगातार सामान्य किया जाता है - नई पीढ़ी के भीतर नैतिक प्रतिरोध की क्षमता कम होती है।
क्रिएटिव Freedom का कवच और जवाबदेही का अभाव
प्रश्न उठाइए, तो उत्तर मिलेगा - आप कला को सेंसर करना चाहते हैं। पर यह एक बौद्धिक छल है।
किसी भी स्वतंत्र समाज में स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही भी जुड़ी होती है। यदि डिजिटल प्लेटफॉर्म करोड़ों दर्शकों तक सामग्री पहुंचा रहे हैं, यदि वे सामाजिक संवेदनाओं, बच्चों की मानसिकता, धार्मिक प्रतीकों और राष्ट्रीय छवि पर असर डाल रहे हैं - तो वे किसी नैतिक या सांस्कृतिक उत्तरदायित्व से मुक्त कैसे हो सकते हैं?
क्या चाहिए: सेंसरशिप नहीं, जवाबदेही
आज जरूरत है -
- स्पष्ट आयु-श्रेणीकरण
- प्रभावी शिकायत-निवारण तंत्र
- धार्मिक/सांस्कृतिक प्रतीकों पर उत्तरदायित्व
- और सबसे बढ़कर - वैचारिक एकरूपता की समीक्षा
प्रतिरोध का रास्ता: केवल रोष नहीं, सांस्कृतिक प्रत्याक्रमण
यदि एक पक्ष लगातार कथा-निर्माण कर रहा है और दूसरा केवल क्रोध व्यक्त कर रहा है - तो अंततः पराजय उसी की होगी जो कहानी नहीं बना रहा।
इसलिए उत्तर तीन स्तरों पर होना चाहिए -
- पहला: भारतीय सभ्यता, परिवार, लोक-संस्कृति, आस्था, नारी-शक्ति, सामाजिक जटिलता और ऐतिहासिक गहराई पर आधारित उच्च-गुणवत्ता का वैकल्पिक कंटेंट तैयार किया जाए - जो न प्रचार हो, न उपदेश, बल्कि कलात्मक, प्रभावी और आधुनिक भाषा में हो।
- दूसरा: समाज में मीडिया-साक्षरता बढ़ाई जाए, ताकि लोग कहानी और नैरेटिव में फर्क समझें; फ्रेमिंग, लोप (Omission), प्रतीकवाद (Symbolism) और वैचारिक कोडिंग (Ideological Coding) पहचान सकें।
- तीसरा: OTT प्लेटफॉर्मों से नैतिक और सांस्कृतिक जवाबदेही मांगी जाए - केवल यह नहीं कि वे क्या दिखाते हैं, बल्कि यह भी कि वे भारत को लगातार किस नजर से दिखाते हैं।
अंतिम प्रश्न: क्या भारत अपनी कथा खो देगा?
क्या हिंदू समाज को स्थायी अपराधी, परिवार को स्थायी जेल, धर्म को स्थायी पाखंड और परंपरा को स्थायी दमन साबित कर देना ही आधुनिक मनोरंजन का नया नियम है?
यदि ऐसा है, तो यह केवल सिनेमा का प्रश्न नहीं - सभ्यतागत अस्तित्व का प्रश्न है।
किसी राष्ट्र की हार तब नहीं होती जब उसके बारे में झूठी कहानी बनाई जाती है। उसकी हार तब होती है जब वह उस कहानी का प्रतिवाद करना छोड़ देता है, अपनी स्मृति पर शर्म करने लगता है, और अपनी नई पीढ़ी को अपने ही विरुद्ध प्रशिक्षित होने देता है।
OTT के इस युग में भारत के सामने यही चुनौती खड़ी है। यदि हमने इसे केवल वेब सीरीज का विवाद समझकर टाल दिया, तो आने वाले वर्षों में हमारी सांस्कृतिक पराजय बहुत गहरी हो सकती है।
इसलिए समय की मांग स्पष्ट है - सजग दर्शक, उत्तरदायी नीति, वैकल्पिक सृजन और सांस्कृतिक आत्मविश्वास।
मनोरंजन की दुनिया में जो युद्ध चल रहा है, वह स्क्रीन पर दिखने वाले दृश्यों से कहीं बड़ा है। वह भारत की आत्मा, स्मृति और सामाजिक मनोभूमि पर लड़ा जा रहा है। और इस युद्ध में तटस्थ रहने का अर्थ है - धीरे-धीरे हार मान लेना।
नोट: इस लेख में प्रस्तुत विचार लेखक कैलाश चन्द्र के व्यक्तिगत हैं। thesootr का उनसे सहमत होना जरूरी नहीं
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