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International Desk. हमारी पृथ्वी पर क्लाइमेट चेंज के नकारात्मक प्रभावों ने खतरे की घंटी बजा दी है। विज्ञानी मानते हैं कि ग्लैशियर्स की पिघलने की रफ्तार यही रही तो वह दिन दूर नहीं जब धरती की अनेक प्रजातियां खत्म होने लग जाएंगी। यहां तक कि 20 से 30 फीसद स्तनधारी जीवों की प्रजातियों पर भी विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। विज्ञानी यह शोध कर रहे हैं कि ऐसे हालातों में कौन सी प्रजातियां जीवित रह पाऐंगी। हेलसिंकी विश्वविद्यालय ने इस पर एक शोध किया है, जो हाल ही में साइंस एडवांसेज जर्नल में छपा भी है।
इस शोध में यह लिखा है कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने से दुनिया में बहुत कुछ बदल जाएगा, एक के बाद एक बहुत सी प्रजातियां खत्म होती जाऐंगी। इसे बैकग्राउंड रेट कहते हैं, जिसमें बिना कोई आपदा आए पशु-पक्षी खत्म होने लगते हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इंसानी गतिविधियों के चलते 100 गुना गति से जीव-जंतुओं का विनाश हो रहा है। इससे जैव विविधता पर भी बुरा असर होगा और कई कई प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी।
स्तनधारी जल्दी खत्म हो जाऐंगे
शोध में दावा किया गया है कि इस दौरान स्तनधारी जीवों की प्रजातियों पर ज्यादा बुरा असर होगा। इंसान भी स्तनधारी प्राणी है, हालांकि उसके विलुप्त होने का खतरा नहीं है, क्योंकि उसके पास पेट भरने के कई तरीके हैं। लेकिन कई जीव जंतु जो हमारे आहार का हिस्सा भी हैं गायब होने लगेंगे, इनमें पक्षी और मछलियां भी शामिल हैं।
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जिनकी प्रसव दर ज्यादा वे ही बचेंगे
दावा किया जा रहा है कि जो जीव जितनी तेजी से ब्रीडिंग कर सकता है, उस प्रजाति के बचने की संभावना उतनी ज्यादा रहेगी। एक्सपर्ट के इस दावे के पीछे की वजह यह है कि नए जन्मे बच्चे वातावरण के बदलाव को ज्यादा तेजी से एडॉप्ट कर सकेंगे और ऐसा पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहेगा। वहीं दावा यह भी किया जा रहा है कि बड़े आकार के जीव-जंतु को खतरा भी ज्यादा है। इस लिहाज से घोड़े से लेकर हाथी, शार्क से लेकर व्हेल मछली पर क्लाइमेट चेंज का खतरा ज्यादा है। यह भी दावा किया जा रहा है कि कई प्रजातियों की शेप-शिफ्टिंग भी हो जाएगी। मसलन यह कहा गया है कि चमगादड़ों और कुछ पक्षियों की पूछ लंबी हो जाएगी। ताकि वे जल्दी ठंडे हो सकें और गर्मी से बचे रहें।
इस जीव पर नहीं पड़ेगा असर
विज्ञानी दावा कर रहे हैं कि टार्डिग्रेड या वॉटर बेयर ऐसी प्रजाति है जो हर हाल में जिंदा रह लेगी। ये वॉटर बेयर ज्वालामुखी के लावे से भी जिंदा बच जाता है और इसे कुचल डालिये या फिर अंतरिक्ष में फेंक दिया जाए तो भी ये जिंदा रहते हैं। बताया गया है कि साल 2007 में विज्ञानियों ने हजारों टार्डिग्रेड्स को सैटेलाइट के जरिए स्पेस में भेज दिया था। फोटॉन एम 3 नाम का ये स्पेसक्राफ्ट जब धरती पर लौटा तो पाया गया कि टार्डिग्रेड्स जिंदा थे। इसके बाद से विज्ञानी इस जीव के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की कोशिश में जुटे हुए हैं।
पानी में मिलने वाले इस छोटे से जीव को माइक्रोस्कोप से ही देखा जा सकता है। साल 1773 में अपने आकार के चलते ही यह लिटिल वॉटर बियर कहलाया था। कुछ सालों में इसे नया नाम टार्डिग्रेड मिल गया।
इन पर रेडिएशन का भी नहीं होता असर
विज्ञानी कहते हैं कि टार्डिग्रेड्स पर रेडिएशन का भी असर नहीं होता। दरअसल इनके शरीर पर पाई जाने वाली शील्ड की बनावट ऐसी है जो उन्हें रेडिएशन के असर से बचाती है। शोधकर्ता कोशिश कर रहे हैं कि इस जीव की शील्ड में मिलने वाले जीन को दूसरे जीवों में भी ट्रांसफर किया जा सके ताकि रेडिएशन का असर कम हो और इससे फायदा लिया जा सके।