सामने आ गया संसद के विशेष सत्र का ऐतिहासिक सरप्राइज, महिला आरक्षण बिल कैबिनेट से पास
Jitendra Shrivastava | Sept 18, 2023, 24:00 IST
सामने आ गया संसद के विशेष सत्र का ऐतिहासिक सरप्राइज, महिला आरक्षण बिल कैबिनेट से पास
संसद के विशेष सत्र के बीच कैबिनेट की अहम बैठक हुई। इसमें महिला आरक्षण बिल को राज्यसभा में मंजूरी मिल गई है। अब यह बिल को लोकसभा में पेश किया जाएगा।
NEW DELHI. संसद के विशेष सत्र के बीच कैबिनेट की अहम बैठक हुई। सूत्रों की मानें तो इस बैठक में महिला आरक्षण बिल को मंजूरी मिल गई है। इस बिल को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे थे, लेकिन तमाम कयासों को दरकिनार करते हुए केंद्रीय कैबिनेट ने आखिरकार इस बिल को मंजूरी दे दी। इस मंजूरी के बाद महिला आरक्षण बिल को लोकसभा में पेश किया जाएगा। केंद्र सरकार के मंत्री प्रहलाद पटेल की ओर से ट्वीट के माध्यम से महिला आरक्षण बिल को पास करने की खबर की पुष्टि की गई। हालांकि, कुछ देर बाद यह ट्वीट डिलीट भी कर दिया गया।
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इस बिल में क्या है?
महिला आरक्षण विधेयक में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी या एक तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रस्ताव है। विधेयक में 33 फीसदी कोटा के भीतर एससी, एसटी और एंग्लो-इंडियन के लिए उप-आरक्षण का भी प्रस्ताव है। विधेयक में प्रस्तावित है कि प्रत्येक आम चुनाव के बाद आरक्षित सीटों को रोटेट किया जाना चाहिए। आरक्षित सीटें राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन द्वारा आवंटित की जा सकती हैं। इस संशोधन अधिनियम के लागू होने के 15 साल बाद महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण समाप्त हो जाएगा।
27 सालों से पेंडिंग है बिल
करीब 27 सालों से लंबित महिला आरक्षण विधेयक अब संसद के पटल पर आएगा। आंकड़ों के मुताबिक, लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 15 फीसदी से कम है, जबकि राज्य विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व 10 फीसदी से भी कम है। इस मुद्दे पर आखिरी बार कदम 2010 में उठाया गया था, जब राज्यसभा ने हंगामे के बीच बिल पास कर दिया था और मार्शलों ने कुछ सांसदों को बाहर कर दिया था, जिन्होंने महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का विरोध किया था। हालांकि, यह विधेयक रद्द हो गया क्योंकि लोकसभा से पारित नहीं हो सका था।
BJP और कांग्रेस दोनों का समर्थन
बीजेपी और कांग्रेस दोनों दलों ने हमेशा इसका समर्थन किया। हालांकि, कुछ अन्य दलों ने महिला कोटा के भीतर ओबीसी आरक्षण की कुछ मांगों को लेकर इसका विरोध किया। अब एक बार फिर कई दलों ने इस विशेष सत्र में महिला आरक्षण विधेयक लाने और पारित करने की जोरदार वकालत की, लेकिन सरकार की ओर से कहा गया है कि उचित समय पर उचित निर्णय लिया जाएगा।
लोकसभा में 14 फीसदी महिला सांसद
वर्तमान स्थिति की बात करें तो लोकसभा में 78 महिला सदस्य चुनी गईं, जो कुल संख्या 543 के 15 प्रतिशत से भी कम हैं। बीते साल दिसंबर में सरकार द्वारा संसद में साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, राज्यसभा में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व करीब 14 प्रतिशत है। इसके अलावा 10 राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10 फीसदी से भी कम है, इनमें आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, ओडिशा, सिक्किम, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा और पुंडुचेरी शामिल हैं।
2008 में आखिरी बार पेश हुआ महिला बिल
साल 2008 से पहले इस बिल को 1996, 1998 और 1999 में भी पेश किया गया था। गीता मुखर्जी की अध्यक्षता में एक संयुक्त संसदीय समिति ने 1996 के विधेयक की जांच की थी और 7 सिफारिशें की थीं। इनमें से पांच को 2008 के विधेयक में शामिल किया गया था, जिसमें एंग्लो इंडियंस के लिए 15 साल की आरक्षण अवधि और उप-आरक्षण शामिल था। इस बिल में यह भी शामिल था, अगर किसी राज्य में तीन से कम लोकसभा की सीटें हों, दिल्ली विधानसभा में आरक्षण और कम से एक तिहाई आरक्षण। कमेटी की दो सिफारिशों को 2008 के विधेयक में शामिल नहीं किया गया था। पहला राज्यसभा और विधान परिषदों में सीटें आरक्षित करने के लिए था और दूसरा संविधान द्वारा ओबीसी के लिए आरक्षण का विस्तार करने के बाद ओबीसी महिलाओं के लिए उप-आरक्षण के लिए था। 2008 के विधेयक को कानून और न्याय संबंधी स्थायी समिति को भेजा गया था, लेकिन यह अपनी अंतिम रिपोर्ट में आम सहमति तक पहुंचने में विफल रहा। समिति ने सिफारिश की कि विधेयक को संसद में पारित किया जाए और बिना किसी देरी के कार्रवाई में लाया जाए।
सपा के दो सदस्यों ने किया था विरोध
कमेटी के दो सदस्य, जोकि समाजवादी पार्टी के थे, वीरेंद्र भाटिया और शैलेन्द्र कुमार ने यह कहते हुए असहमति जताई कि वे महिलाओं को आरक्षण प्रदान करने के खिलाफ नहीं थे, लेकिन जिस तरह से इस विधेयक का मसौदा तैयार किया गया था, उससे असहमत थे। उन्होंने सिफारिश की थी कि प्रत्येक राजनीतिक दल को अपने 20 प्रतिशत टिकट महिलाओं को वितरित करने चाहिए, आरक्षण 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। ओबीसी और अल्पसंख्यकों की महिलाओं के लिए एक कोटा होना चाहिए। स्थायी समिति ने प्रतिनिधित्व बढ़ाने के अन्य तरीकों पर भी विचार किया। इस कमेटी को एक सुझाव मिला था कि राजनीतिक दलों के लिए कुछ फीसदी सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित करने के लिए नामांकित किया जाए, लेकिन उसे लगा कि जिन सीटों पर नुकसान की संभावना है, वहां महिलाओं को नामांकित करके पार्टियां खाना-पूर्ति कर सकती हैं।
राज्यसभा और विधान परिषदों में आरक्षण कैसे?
समिति ने निष्कर्ष निकाला कि राज्यसभा और विधान परिषदों में आरक्षण के मुद्दे की गहन जांच की जानी चाहिए क्योंकि ऊपरी सदन संविधान के तहत समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ओबीसी महिलाओं को आरक्षण के मुद्दे पर समिति ने कहा कि "विधेयक के पारित होने के वर्तमान समय में अन्य सभी मुद्दों पर सरकार बिना किसी और देरी के उचित समय पर विचार कर सकती है।" साल 2008 में इस विधेयक का सपा, आरजेडी और जेडीयू ने विरोध किया था। हालांकि, पार्टियों ने सार्वजनिक रूप से इसके लिए अपना समर्थन व्यक्त किया है। इस बिल पर विचार और पारित कराने के लिए सरकार को संसद के प्रत्येक सदन में दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होगी।
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इस बिल में क्या है?
महिला आरक्षण विधेयक में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी या एक तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रस्ताव है। विधेयक में 33 फीसदी कोटा के भीतर एससी, एसटी और एंग्लो-इंडियन के लिए उप-आरक्षण का भी प्रस्ताव है। विधेयक में प्रस्तावित है कि प्रत्येक आम चुनाव के बाद आरक्षित सीटों को रोटेट किया जाना चाहिए। आरक्षित सीटें राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन द्वारा आवंटित की जा सकती हैं। इस संशोधन अधिनियम के लागू होने के 15 साल बाद महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण समाप्त हो जाएगा।
27 सालों से पेंडिंग है बिल
करीब 27 सालों से लंबित महिला आरक्षण विधेयक अब संसद के पटल पर आएगा। आंकड़ों के मुताबिक, लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 15 फीसदी से कम है, जबकि राज्य विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व 10 फीसदी से भी कम है। इस मुद्दे पर आखिरी बार कदम 2010 में उठाया गया था, जब राज्यसभा ने हंगामे के बीच बिल पास कर दिया था और मार्शलों ने कुछ सांसदों को बाहर कर दिया था, जिन्होंने महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का विरोध किया था। हालांकि, यह विधेयक रद्द हो गया क्योंकि लोकसभा से पारित नहीं हो सका था।
BJP और कांग्रेस दोनों का समर्थन
बीजेपी और कांग्रेस दोनों दलों ने हमेशा इसका समर्थन किया। हालांकि, कुछ अन्य दलों ने महिला कोटा के भीतर ओबीसी आरक्षण की कुछ मांगों को लेकर इसका विरोध किया। अब एक बार फिर कई दलों ने इस विशेष सत्र में महिला आरक्षण विधेयक लाने और पारित करने की जोरदार वकालत की, लेकिन सरकार की ओर से कहा गया है कि उचित समय पर उचित निर्णय लिया जाएगा।
लोकसभा में 14 फीसदी महिला सांसद
वर्तमान स्थिति की बात करें तो लोकसभा में 78 महिला सदस्य चुनी गईं, जो कुल संख्या 543 के 15 प्रतिशत से भी कम हैं। बीते साल दिसंबर में सरकार द्वारा संसद में साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, राज्यसभा में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व करीब 14 प्रतिशत है। इसके अलावा 10 राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10 फीसदी से भी कम है, इनमें आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, ओडिशा, सिक्किम, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा और पुंडुचेरी शामिल हैं।
2008 में आखिरी बार पेश हुआ महिला बिल
साल 2008 से पहले इस बिल को 1996, 1998 और 1999 में भी पेश किया गया था। गीता मुखर्जी की अध्यक्षता में एक संयुक्त संसदीय समिति ने 1996 के विधेयक की जांच की थी और 7 सिफारिशें की थीं। इनमें से पांच को 2008 के विधेयक में शामिल किया गया था, जिसमें एंग्लो इंडियंस के लिए 15 साल की आरक्षण अवधि और उप-आरक्षण शामिल था। इस बिल में यह भी शामिल था, अगर किसी राज्य में तीन से कम लोकसभा की सीटें हों, दिल्ली विधानसभा में आरक्षण और कम से एक तिहाई आरक्षण। कमेटी की दो सिफारिशों को 2008 के विधेयक में शामिल नहीं किया गया था। पहला राज्यसभा और विधान परिषदों में सीटें आरक्षित करने के लिए था और दूसरा संविधान द्वारा ओबीसी के लिए आरक्षण का विस्तार करने के बाद ओबीसी महिलाओं के लिए उप-आरक्षण के लिए था। 2008 के विधेयक को कानून और न्याय संबंधी स्थायी समिति को भेजा गया था, लेकिन यह अपनी अंतिम रिपोर्ट में आम सहमति तक पहुंचने में विफल रहा। समिति ने सिफारिश की कि विधेयक को संसद में पारित किया जाए और बिना किसी देरी के कार्रवाई में लाया जाए।
सपा के दो सदस्यों ने किया था विरोध
कमेटी के दो सदस्य, जोकि समाजवादी पार्टी के थे, वीरेंद्र भाटिया और शैलेन्द्र कुमार ने यह कहते हुए असहमति जताई कि वे महिलाओं को आरक्षण प्रदान करने के खिलाफ नहीं थे, लेकिन जिस तरह से इस विधेयक का मसौदा तैयार किया गया था, उससे असहमत थे। उन्होंने सिफारिश की थी कि प्रत्येक राजनीतिक दल को अपने 20 प्रतिशत टिकट महिलाओं को वितरित करने चाहिए, आरक्षण 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। ओबीसी और अल्पसंख्यकों की महिलाओं के लिए एक कोटा होना चाहिए। स्थायी समिति ने प्रतिनिधित्व बढ़ाने के अन्य तरीकों पर भी विचार किया। इस कमेटी को एक सुझाव मिला था कि राजनीतिक दलों के लिए कुछ फीसदी सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित करने के लिए नामांकित किया जाए, लेकिन उसे लगा कि जिन सीटों पर नुकसान की संभावना है, वहां महिलाओं को नामांकित करके पार्टियां खाना-पूर्ति कर सकती हैं।
राज्यसभा और विधान परिषदों में आरक्षण कैसे?
समिति ने निष्कर्ष निकाला कि राज्यसभा और विधान परिषदों में आरक्षण के मुद्दे की गहन जांच की जानी चाहिए क्योंकि ऊपरी सदन संविधान के तहत समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ओबीसी महिलाओं को आरक्षण के मुद्दे पर समिति ने कहा कि "विधेयक के पारित होने के वर्तमान समय में अन्य सभी मुद्दों पर सरकार बिना किसी और देरी के उचित समय पर विचार कर सकती है।" साल 2008 में इस विधेयक का सपा, आरजेडी और जेडीयू ने विरोध किया था। हालांकि, पार्टियों ने सार्वजनिक रूप से इसके लिए अपना समर्थन व्यक्त किया है। इस बिल पर विचार और पारित कराने के लिए सरकार को संसद के प्रत्येक सदन में दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होगी।
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