AAP में टूट का सिलसिला: पार्टी संस्थापकों से लेकर मंत्रियों तक के बिखराव की पूरी कहानी
Jitendra Shrivastava | Apr 25, 2026, 17:46 IST
Photograph: (THESOOTR)
NEW DELHI. आम आदमी पार्टी (AAP) से 2012–2026 के बीच कई बड़े नेता पार्टी छोड़ गए। पढ़िए... योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और कुमार विश्वास सहित सभी के अलग होने की पूरी कहानी...
News In Short
- योगेंद्र यादव को 2015 में PAC से हटाया गया।
- शाजिया इल्मी ने मई 2014 में इस्तीफा दिया।
- कपिल मिश्रा को पार्टी ने औपचारिक रूप से निकाला।
- कुमार विश्वास ने कभी इस्तीफा नहीं दिया, पर दूर रहे।
- अल्का लांबा 2019 में कांग्रेस में शामिल हुईं।
News In Detail
AAP नेताओं का पार्टी छोड़ना: 2012–2026 की पूरी कहानी...
संस्थापकों का मोहभंग: योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण
योगेंद्र यादव देश के जाने-माने राजनीतिशास्त्री और चुनाव-विश्लेषक थे। उनका जमीनी राजनीति पर गहरा अध्ययन था। प्रशांत भूषण वरिष्ठ वकील थे जिन्होंने कई बड़े भ्रष्टाचार मामलों में लड़ाई लड़ी। दोनों ने आरंभ से ही पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र (Internal Democracy) की वकालत की।
2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में AAP को ऐतिहासिक जीत मिली। 70 में से 67 सीटें जीतकर पार्टी ने दिल्ली की सत्ता पाई। लेकिन सत्ता के साथ आंतरिक विवाद भी बढ़ते गए। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने निर्णय-केंद्रीकरण (Centralization of Power) पर खुलकर आपत्ति जताई। उन्होंने नीतिगत पारदर्शिता की कमी को लेकर भी सवाल उठाए।
मार्च 2015 में दोनों को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से हटा दिया गया। साथ ही राजनीतिक मामलों की समिति (PAC) से भी बाहर किया गया। अप्रैल 2015 में दोनों को "अनुशासनहीनता" के आरोप में पार्टी से निकाल दिया गया। यह AAP के इतिहास में पहला बड़ा विभाजन था। दोनों ने जाते-जाते कहा कि पार्टी अपने स्वराज (Swaraj) के मूल आदर्शों से भटक गई है।
आनंद कुमार और शाजिया इल्मी का सिद्धांतों से टकराव
शाजिया इल्मी (Shazia Ilmi) AAP की शुरुआती राष्ट्रीय प्रवक्ता के रूप में बेहद लोकप्रिय थीं। उनकी वाकपटुता और मीडिया उपस्थिति पार्टी की पहचान बन गई थी। मई 2014 में उन्होंने पार्टी से इस्तीफा देकर सबको चौंका दिया। उनका कहना था कि AAP अपने मूल आदर्शों से दूर हो गई। भीतर गुटबाज़ी और ऊपर से थोपे गए फैसलों से वे बेहद नाराज़ थीं।
शाजिया इल्मी के जाने के बाद उनके कई सहयोगी भी पार्टी छोड़ गए। इससे AAP की "सिद्धांत-आधारित नई राजनीति" (Principled Politics) की छवि को गहरा धक्का लगा। पार्टी के शुभचिंतकों ने सोचा था कि AAP पुरानी राजनीति से अलग होगी। लेकिन एक-एक कर सिद्धांतवादी नेताओं का जाना यह सवाल उठाने लगा।
आशुतोष, आशीष खेतान और कपिल मिश्रा का अलगाव
आशीष खेतान (Ashish Khetan) एक उभरते कानून-विशेषज्ञ नेता के रूप में AAP में आए थे। उन्होंने 2018 में ई-मेल के ज़रिए इस्तीफा भेजा। उन्होंने "निजी कारणों" का हवाला दिया लेकिन रिपोर्टों में कहा गया कि लोकसभा चुनाव का टिकट न मिलना उनकी नाराज़गी की बड़ी वजह थी। नीतिगत सहमति की कमी ने भी उन्हें निराश किया।
कपिल मिश्रा (Kapil Mishra) AAP के शुरुआती दौर के सबसे आक्रामक और ऊर्जावान नेताओं में गिने जाते थे। वे दिल्ली सरकार में मंत्री भी रहे। लेकिन उन्होंने नेतृत्व पर कई गंभीर आरोप लगाए। आरोपों की जांच के बाद AAP ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। उनका निष्कासन पार्टी के इतिहास में एक विवादास्पद अध्याय बन गया।
कुमार विश्वास और अल्का लांबा: दो कहानियां
2018 से 2022 के बीच कुमार विश्वास पार्टी से धीरे-धीरे दूर होते गए। उन्होंने राज्यसभा और अन्य उम्मीदवारियों में पारदर्शिता की कमी पर सवाल उठाए। उनका आरोप था कि फैसले व्यक्तिगत पसंद से होते हैं न कि योग्यता से। हालाँकि उन्होंने औपचारिक इस्तीफा कभी नहीं दिया। लेकिन उनकी रैलियाँ और जन-अभियान बंद हो जाना ही सब कुछ कह देता था।
अलका लांबा (Alka Lamba) दिल्ली की विधायक रहीं और पार्टी की महिला चेहरे के रूप में पहचानी जाती थीं। उन्होंने आंतरिक असहमति के बाद AAP से नाता तोड़ा। 2019 में वे कांग्रेस में शामिल हो गईं। उनका कहना था कि AAP में महिला नेत्रियों को उचित सम्मान और भूमिका नहीं मिलती। उनके जाने से पार्टी के भीतर महिला नेतृत्व (Women Leadership) की बहस फिर से उठी।
राघव चड्ढा का AAP से इस्तीफा
उन्होंने साफ कहा, "मैं आम आदमी पार्टी से दूर जा रहा हूं और जनता की ओर बढ़ रहा हूं।" चड्ढा ने यह भी बताया कि जिस पार्टी को उन्होंने अपनी जवानी के 15 साल दिए, वह अब देश के हित में नहीं बल्कि निजी फायदे के लिए काम कर रही है।उनका कहना था, "पिछले कुछ सालों से मुझे महसूस हो रहा था कि मैं गलत पार्टी में सही आदमी हूं।" इसी सोच के साथ उन्होंने फैसला लिया कि वे संविधान के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए खुद को बीजेपी (भारतीय जनता पार्टी) में मिला लेंगे।
राघव चड्ढा के साथ इन 7 सांसदों ने छोड़ी AAP
अशोक कुमार मित्तल लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के चांसलर हैं। उन्हें मार्च 2022 में AAP ने राज्यसभा भेजा था। शिक्षा के क्षेत्र में उनकी खास पहचान है। हाल ही में पार्टी ने उन्हें राज्यसभा में डिप्टी लीडर बनाया था, लेकिन अब वे भी बीजेपी के रास्ते पर हैं।
डॉ. संदीप पाठक अप्रैल 2022 से पंजाब से राज्यसभा सांसद हैं। वह IIT (Indian Institute of Technology) दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर रहे हैं और उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से पीएचडी की है। पंजाब में AAP की जीत में उनका बड़ा योगदान माना जाता है। हालांकि दिल्ली चुनाव में हार के बाद केजरीवाल ने उन्हें किनारे कर दिया था।
पूर्व भारतीय क्रिकेटर हरभजन सिंह ने मार्च 2022 में AAP के साथ राजनीति में कदम रखा था। उन्होंने 18 जुलाई 2022 को राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ ली। उनका कार्यकाल 2028 तक है। अब वे भी इस बड़े बदलाव का हिस्सा बन गए हैं।
बलबीर सिंह सीचेवाल को पंजाब में "इको बाबा" के नाम से जाना जाता है। उन्होंने नदियों में बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए लंबे समय तक अभियान चलाया है। जालंधर के किसान परिवार में जन्मे सीचेवाल को 2017 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। 2022 में AAP ने उन्हें राज्यसभा भेजा था।
विक्रमजीत सिंह साहनी भी समाजसेवा और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हैं। उन्हें मॉरीशस के राष्ट्रपति द्वारा अंतरराष्ट्रीय शांति पुरस्कार मिल चुका है। उन्होंने विश्व पंजाबी संसदीय मंच की स्थापना भी की है।
संदीप पाठक को क्यों किया गया था साइडलाइन?
उन्हें छत्तीसगढ़ का प्रभारी बनाया गया था। वहीं मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन को पंजाब, आतिशी को गोवा तथा गोपाल राय और दुर्गेश पाठक को गुजरात की जिम्मेदारी दी गई थी। पाठक के लिए यह हाशिए पर जाना साफ तौर पर नाराजगी की वजह बना।
2022–2026: नए संकट, नई चुनौतियां
2023–2024 में अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी ने पार्टी को नई चुनौती दी। इससे पार्टी के भीतर एकजुटता दिखी, लेकिन असंतोष पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। 2026 तक AAP एक ऐसी पार्टी बन चुकी थी जो जीतती भी है और टूटती भी है। बाहर जाने वाले हर नेता ने "सिद्धांत की बात" की। लेकिन यह भी सच है कि AAP का मूल वोट-बेस अब भी मज़बूत है।
AAP से अलग होने के मुख्य कारण
दूसरा कारण टिकट वितरण (Ticket Distribution) में पारदर्शिता की कमी है जिससे कई वफादार नेताओं को निराशा हुई। तीसरा कारण आंतरिक लोकतंत्र (Internal Democracy) का कमज़ोर होना रहा जिसे पार्टी ने अपने घोषणापत्र में प्रमुखता दी थी।
चौथा कारण यह है कि अनुभवी और स्वतंत्र सोच वाले नेताओं के लिए पार्टी में जगह सिकुड़ती गई। पांचवां और शायद सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है "स्वराज बनाम सत्ता" (Swaraj vs Power) का द्वंद्व। जब एक पार्टी सत्ता में आती है तो उसके मूल आदर्शों और व्यावहारिक राजनीति के बीच टकराव होता है। AAP में यही टकराव बार-बार और बड़े पैमाने पर हुआ।
संकट के बावजूद राजनीतिक अस्तित्व का सफर
पंजाब में 2022 में सत्ता पाई और राष्ट्रीय राजनीति में एक विकल्प के रूप में उभरी। हालांकि, 2025 के दिल्ली चुनाव में AAP को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। यह हार पार्टी के लिए आत्ममंथन का अवसर बनी।
AAP से निकले नेताओं ने अलग-अलग रास्ते चुने। कुछ ने नई पार्टियाँ बनाईं, कुछ कांग्रेस या BJP में गए, कुछ अकादमिक या सामाजिक कार्यों में लौट गए।
सब नेताओं की कहानी यह बताती है कि राजनीतिक आदर्शवाद और संगठनात्मक वास्तविकता के बीच का फासला बहुत बड़ा होता है। AAP की यह यात्रा भारतीय राजनीति के लिए एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन बन गई है।
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