Court Marriage Rules: कैसे होती है कोर्ट मैरिज? जानें आवेदन प्रक्रिया, नियम और कुल फीस
Anjali Dwivedi | Jun 03, 2026, 17:12 IST
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भारत में कोर्ट मैरिज का चलन तेजी से बढ़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट के वकील गौतम सिंह से जानिए कि कोर्ट मैरिज कैसे होती है, इसमें कौन से दस्तावेज लगते हैं, कुल कितना सरकारी खर्च आता है और अलग धर्म में शादी करने के क्या नियम हैं।
समझें क्या है पूरा मामला
- आजकल के युवा पारंपरिक शादियों की जगह कोर्ट मैरिज को ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
- कोर्ट मैरिज किसी धार्मिक स्थल के बजाय सीधे सरकारी अधिकारी के सामने होती है।
- सामान्य विवाह और अंतर्धार्मिक विवाह के लिए रजिस्ट्रेशन के नियम अलग-अलग होते हैं।
- पूरी प्रक्रिया में सरकारी फीस बेहद कम है लेकिन वकील का खर्च अलग होता है।
- शादी का कानूनी रूप से रजिस्ट्रेशन कराना भविष्य की सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है।
इसके साथ ही आपको शादी का सरकारी सर्टिफिकेट भी तुरंत मिल जाता है। लेकिन लोगों के मन में अक्सर यह सवाल रहता है कि इसकी शुरुआत कहां से करें। इसमें कुल कितना पैसा खर्च होता है और कौन से कागज जरूरी होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील गौतम सिंह ने इस बारे में विस्तार से समझाया है। उन्होंने बताया कि कोर्ट मैरिज किसी मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारे में नहीं होती है। यह शादी सीधे सरकारी विवाह अधिकारी यानी मैरिज अफसर के सामने पूरी की जाती है। इसके लिए दूल्हा और दुल्हन को अपने क्षेत्र के मैरिज रजिस्ट्रार के दफ्तर में जाकर आवेदन देना पड़ता है।
क्या है कोर्ट मैरिज करने की पूरी प्रक्रिया?
वकील गौतम सिंह ने एक बहुत ही जरूरी बात की जानकारी दी है। कोर्ट में शादी के सीधे रजिस्ट्रेशन से पहले पारंपरिक विवाह का सबूत देना पड़ता है। इसका मतलब है कि अगर कोई जोड़ा सीधे कोर्ट आता है तो उन्हें पहले मंदिर या मस्जिद में शादी करनी होगी। उन्हें उस पारंपरिक विवाह का प्रामाणिक दस्तावेज कोर्ट के सामने पेश करना पड़ता है।
मंदिर या निकाह के समय रखें इन बातों का ध्यान
अगर मंदिर से कोई छपा हुआ प्रमाण पत्र नहीं मिलता है तो घबराएं नहीं। वहां के पुजारी के हस्ताक्षर और हाथ से लिखा हुआ पर्चा भी मान्य होता है। इसके साथ ही शादी की तस्वीरें और वीडियो संभालकर रखने चाहिए। विवाह के समय वहां ऐसे गवाह होने चाहिए जो पूरी तरह बालिग हों और मानसिक रूप से स्वस्थ हों।
मुस्लिम जोड़ों के लिए मैरिज रजिस्ट्रेशन के नियम
अब बात करते हैं कि इस पूरी कानूनी प्रक्रिया में कुल कितना खर्च आता है। वकील गौतम सिंह के मुताबिक कोर्ट मैरिज की सरकारी फीस बहुत ही कम होती है। भारत के अलग-अलग राज्यों में यह फीस मात्र 100 रुपए से लेकर 500 रुपए के बीच होती है। इसलिए सरकारी तौर पर यह प्रक्रिया जेब पर भारी नहीं पड़ती है।
कोर्ट मैरिज में कुल कितना पैसा खर्च होता है?
अगर आप किसी वकील की सहायता लेते हैं तो कुल खर्च दो हजार से 10 हजार रुपए तक जा सकता है। बिना वकील के खुद प्रयास करने पर यह खर्च काफी कम हो जाता है।
मैरिज ऑफिस में आवेदन फॉर्म जमा करने की फीस 100 से 150 रुपए होती है। इसके बाद सर्टिफिकेट जारी करने की फीस 100 से 300 रुपए तक ली जाती है। नाम, उम्र और पता प्रमाणित करने के लिए लगने वाले स्टांप पेपर और नोटरी का खर्च 300 से 1500 रुपए तक आता है। इस काम के लिए पहचान पत्र और दो गवाह जरूरी होते हैं।
अलग धर्म में शादी करने के लिए क्या है कानून?
इसके तहत कोई भी जोड़ा बिना अपना धर्म बदले कानूनी तौर पर शादी कर सकता है। यह पूरी तरह से एक धर्मनिरपेक्ष और सुरक्षित कानूनी प्रक्रिया है।
इस कानून के तहत आवेदन करने के लिए एक विशेष शर्त पूरी करनी होती है। दूल्हा या दुल्हन में से किसी एक को उस जिले में कम से कम 30 दिन से रहना जरूरी है।
इसके बाद ही वे मैरिज अफसर के पास जाकर शादी की लिखित सूचना दे सकते हैं। इस सूचना को मैरिज दफ्तर के नोटिस बोर्ड पर लगाया जाता है।
आवेदन करने के बाद 30 दिन का इंतजार
अगर 30 दिनों के भीतर कोई वैध आपत्ति नहीं आती है तो शादी की आगे की राह साफ हो जाती है। इसके बाद कपल को तीन गवाहों के साथ कोर्ट जाना होता है।
तय तारीख पर दोनों पक्ष और तीनों गवाह मैरिज अफसर के सामने दस्तखत करते हैं। इसके बाद मैरिज अफसर उन्हें सरकारी सर्टिफिकेट दे देते हैं। court marriage सिर्फ एक औपचारिकता नहीं है बल्कि यह दोनों को कानूनी सुरक्षा देती है। किसी भी तरह के पारिवारिक या सामाजिक विवाद से बचने के लिए शादी का रजिस्ट्रेशन कराना बहुत जरूरी है।
FAQ
- कोर्ट मैरिज करने के लिए न्यूनतम सरकारी फीस कितनी होती है?
अलग-अलग राज्यों में कोर्ट मैरिज की आधिकारिक सरकारी फीस मात्र 100 रुपए से 500 रुपए के बीच होती है। हालांकि, नोटरी, एफिडेविट और वकील की फीस जोड़ने पर कुल खर्च दो हजार से 10 हजार रुपए तक हो सकता है। - क्या स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करने के लिए धर्म बदलना जरूरी है?
नहीं, स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के तहत अलग-अलग धर्म या जाति के लोग बिना अपना धर्म बदले कानूनी रूप से शादी कर सकते हैं। यह पूरी तरह से एक धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया है जिसमें किसी धार्मिक रस्म की जरूरत नहीं होती। - कोर्ट मैरिज के आवेदन के बाद 30 दिनों का समय क्यों दिया जाता है?
स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत आवेदन के बाद नोटिस को बोर्ड पर लगाया जाता है। यह 30 दिन का समय इसलिए दिया जाता है ताकि यदि किसी को इस शादी से कोई कानूनी आपत्ति हो, तो वह अपनी बात दर्ज करा सके।
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