डीयू में छात्रों की प्रदर्शन एडवाइजरी पर भिड़े शिक्षक, शशि थरूर ने जताई आपत्ति
Manya Jain | Jul 25, 2026, 18:57 IST
du jnu advisory protest controversy
गैस कंपनियों ने बिना घरेलू कनेक्शन के 10 किलो सिलेंडर देने वाली फ्री ट्रेड एलपीजी सुविधा शुरू की है। इंदौर में यह लागू हो चुकी है, भोपाल में 15 अगस्त से मिलेगी। आधार कार्ड से खरीद और 3 घंटे में डिलीवरी होगी।
दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद की बैठक में छात्रों के प्रदर्शन को लेकर जारी एडवाइजरी का मुद्दा उठा। शिक्षकों ने इस एडवाइजरी को अनुचित बताते हुए इसे हटाने की मांग की। DU ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि एडवाइजरी में कोई बदलाव नहीं होगा। JNU ने भी इसी तरह की एडवाइजरी जारी की है। इस मामले पर राहुल गांधी और शशि थरूर ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है।
दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद की बैठक में जीरो आवर के दौरान यह मुद्दा उठा। कई प्रोफेसरों ने छात्रों के प्रदर्शन को लेकर जारी एडवाइजरी पर सवाल खड़े किए। शिक्षकों का कहना था कि यूनिवर्सिटी का यह कदम जरूरत से ज्यादा सख्त है। उन्होंने मांग की कि इसे तुरंत सोशल मीडिया से हटाया जाए।
शिक्षकों के मुताबिक एडवाइजरी में यह मान लिया गया है कि छात्र आसानी से बहकाए जा सकते हैं। उनका कहना था कि छात्रों की दुनिया सिर्फ क्लासरूम तक सीमित नहीं की जा सकती। कुछ शिक्षकों ने यह भी कहा कि यूनिवर्सिटी को प्रदर्शनों को निहित स्वार्थों का नतीजा बताकर किसी एक पक्ष की तरफ नहीं झुकना चाहिए।
शिक्षकों का मानना था कि इस तरह की एडवाइजरी से यूनिवर्सिटी की छवि को नुकसान पहुंचता है। हालांकि यूनिवर्सिटी प्रशासन अपने रुख पर कायम रहा। यूनिवर्सिटी का कहना था कि छात्रों को गुमराह किया जा रहा है, इसलिए यह कदम जरूरी था।
राजधानी दिल्ली में NEET पेपर लीक मामले को लेकर विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। इसी बीच दिल्ली विश्वविद्यालय ने छात्रों और शिक्षकों के लिए एक एडवाइजरी जारी की थी। इसमें जंतर-मंतर पर होने वाले धरना-प्रदर्शनों से दूर रहने की अपील की गई। यूनिवर्सिटी ने कहा कि ऐसे आयोजनों में शामिल होने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
डीयू ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत जंतर-मंतर पर होने वाली सभाएं सख्ती से नियंत्रित हैं, इसलिए इनमें भाग लेने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। यूनिवर्सिटी ने यह भी कहा कि ऐसी गतिविधियां छात्रों की सुरक्षा के साथ-साथ उनके शैक्षणिक रिकॉर्ड और भविष्य के करियर पर भी असर डाल सकती हैं। साथ ही छात्रों को सोशल मीडिया पर फैल रही भ्रामक और फर्जी खबरों से सतर्क रहने की सलाह भी दी गई।
इस आंदोलन में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI – Students Federation of India), आल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA – All India Students Association), आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF – All India Students Federation) और विभिन्न कॉलेजों के स्वतंत्र छात्र समूह सक्रिय बताए जा रहे हैं।
दिल्ली विश्वविद्यालय के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने भी अपने छात्रों और शिक्षकों के लिए एडवाइजरी जारी की। JNU ने कहा कि सभी सदस्य जिम्मेदारी से काम लें और अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा को प्राथमिकता दें। यूनिवर्सिटी ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए जंतर मंतर की सभाओं से दूर रहने का अनुरोध किया।
JNU ने छात्रों से सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी से व्यवहार करने और शैक्षणिक जिम्मेदारी बनाए रखने को भी कहा।
लोकसभा में राहुल गांधी ने इस एडवाइजरी की कड़ी आलोचना की। कांग्रेस नेता ने यूनिवर्सिटी पर आरोप लगाया कि वह छात्रों को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों के इस्तेमाल के लिए धमका रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि समय आने पर यूनिवर्सिटी को इसका जवाब देना होगा।
कांग्रेस नेता शशि थरूर ने भी इस एडवाइजरी पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि इमरजेंसी से पहले जेपी आंदोलन के दौरान भी दिल्ली यूनिवर्सिटी ने छात्रों को प्रदर्शन में शामिल होने से नहीं रोका था। थरूर के मुताबिक उस समय सेंट स्टीफंस कॉलेज की उनकी यूनियन कैबिनेट के कुछ सदस्य, जिनमें स्वर्गीय चंदन मित्रा भी शामिल थे, खुलेआम प्रदर्शन में हिस्सा लेते थे।
थरूर ने कहा कि अगर किसी प्रमुख सरकारी यूनिवर्सिटी को छात्रों और शिक्षकों को गंभीर नतीजों की धमकी देने की इजाजत मिलती है, तो इसका असर लोकतांत्रिक बातचीत और अभिव्यक्ति की आजादी पर पड़ता है। उनका कहना था कि ज्यादातर DU छात्र इतने साधन-संपन्न नहीं होते कि वे ऐसी चेतावनी को नजरअंदाज कर सकें, क्योंकि उन्हें अपने भविष्य पर असर पड़ने का डर रहता है। थरूर के मुताबिक यूनिवर्सिटी का मकसद आलोचनात्मक सोच सिखाना होता है, न कि उसे दबाना।
यह पूरा मामला फिलहाल चर्चा में बना हुआ है। एक तरफ यूनिवर्सिटी प्रशासन छात्रों की सुरक्षा का हवाला दे रहा है, तो दूसरी तरफ शिक्षक और विपक्षी नेता इसे अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़कर देख रहे हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद और तूल पकड़ सकता है।
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दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद की बैठक में जीरो आवर के दौरान यह मुद्दा उठा। कई प्रोफेसरों ने छात्रों के प्रदर्शन को लेकर जारी एडवाइजरी पर सवाल खड़े किए। शिक्षकों का कहना था कि यूनिवर्सिटी का यह कदम जरूरत से ज्यादा सख्त है। उन्होंने मांग की कि इसे तुरंत सोशल मीडिया से हटाया जाए।
शिक्षकों ने जताई नाराजगी
शिक्षकों का मानना था कि इस तरह की एडवाइजरी से यूनिवर्सिटी की छवि को नुकसान पहुंचता है। हालांकि यूनिवर्सिटी प्रशासन अपने रुख पर कायम रहा। यूनिवर्सिटी का कहना था कि छात्रों को गुमराह किया जा रहा है, इसलिए यह कदम जरूरी था।
क्या कहती है DU की एडवाइजरी
डीयू ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत जंतर-मंतर पर होने वाली सभाएं सख्ती से नियंत्रित हैं, इसलिए इनमें भाग लेने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। यूनिवर्सिटी ने यह भी कहा कि ऐसी गतिविधियां छात्रों की सुरक्षा के साथ-साथ उनके शैक्षणिक रिकॉर्ड और भविष्य के करियर पर भी असर डाल सकती हैं। साथ ही छात्रों को सोशल मीडिया पर फैल रही भ्रामक और फर्जी खबरों से सतर्क रहने की सलाह भी दी गई।
इस आंदोलन में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI – Students Federation of India), आल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA – All India Students Association), आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF – All India Students Federation) और विभिन्न कॉलेजों के स्वतंत्र छात्र समूह सक्रिय बताए जा रहे हैं।
JNU ने भी जारी की एडवाइजरी
JNU ने छात्रों से सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी से व्यवहार करने और शैक्षणिक जिम्मेदारी बनाए रखने को भी कहा।
राहुल गांधी और शशि थरूर की प्रतिक्रिया
कांग्रेस नेता शशि थरूर ने भी इस एडवाइजरी पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि इमरजेंसी से पहले जेपी आंदोलन के दौरान भी दिल्ली यूनिवर्सिटी ने छात्रों को प्रदर्शन में शामिल होने से नहीं रोका था। थरूर के मुताबिक उस समय सेंट स्टीफंस कॉलेज की उनकी यूनियन कैबिनेट के कुछ सदस्य, जिनमें स्वर्गीय चंदन मित्रा भी शामिल थे, खुलेआम प्रदर्शन में हिस्सा लेते थे।
थरूर ने कहा कि अगर किसी प्रमुख सरकारी यूनिवर्सिटी को छात्रों और शिक्षकों को गंभीर नतीजों की धमकी देने की इजाजत मिलती है, तो इसका असर लोकतांत्रिक बातचीत और अभिव्यक्ति की आजादी पर पड़ता है। उनका कहना था कि ज्यादातर DU छात्र इतने साधन-संपन्न नहीं होते कि वे ऐसी चेतावनी को नजरअंदाज कर सकें, क्योंकि उन्हें अपने भविष्य पर असर पड़ने का डर रहता है। थरूर के मुताबिक यूनिवर्सिटी का मकसद आलोचनात्मक सोच सिखाना होता है, न कि उसे दबाना।
यह पूरा मामला फिलहाल चर्चा में बना हुआ है। एक तरफ यूनिवर्सिटी प्रशासन छात्रों की सुरक्षा का हवाला दे रहा है, तो दूसरी तरफ शिक्षक और विपक्षी नेता इसे अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़कर देख रहे हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद और तूल पकड़ सकता है।
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