शिवाजी महाराज से तिलक तक, घरों से निकलकर चौराहों तक कैसे पहुंचा गणेशोत्सव

Kaushiki | Sept 03, 2026, 15:50 IST
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History of Ganesh Chaturthi
History of Ganesh Chaturthi

14 सितंबर से गणेश चतुर्थी का पावन पर्व शुरू हो रहा है। यह त्योहार मराठा साम्राज्य और पेशवा काल से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक का साक्षी रहा है। लोकमान्य तिलक ने इसे राष्ट्रीय चेतना जगाने और लोगों को जोड़ने का माध्यम बनाया था।

History of Ganesh Chaturthi: भारत देश त्योहारों का देश है। यहां हर पर्व के पीछे आस्था के साथ एक गहरा इतिहास भी छिपा होता है। इस साल 14 सितंबर से गणेश चतुर्थी का पर्व पूरे देश में शुरू हो रहा है। देश के कोने-कोने में भगवान गणेश की सुंदर प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी।

हर तरफ गणपति बाप्पा मोरया के जयकारे गूंजेंगे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह उत्सव हमेशा से ऐसा नहीं था? एक समय था जब यह पूजा केवल घरों की चारदीवारी तक सीमित थी।

ये त्योहार केवल धार्मिक आस्था का जरिया नहीं है। ये भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक बहुत बड़ा हथियार भी रहा है। पेशवा काल के वैभव से लेकर अंग्रेजों के खिलाफ लोकमान्य तिलक की क्रांति तक इस पर्व का सफर अद्भुत रहा है।

इतिहास के पन्नों में गणेश उत्सव का यह बदलाव बहुत ही प्रेरणादायक है। आइए इस खास पर्व के ऐतिहासिक सच और इसके गौरवशाली सफर को जानें।

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छत्रपति शिवाजी महाराज के समय से शुरुआत

गणेशोत्सव का इतिहास बहुत ही पुराना और गौरवशाली माना जाता है। इतिहासकारों के मुताबिक, इसकी शुरुआत छत्रपति शिवाजी महाराज के समय हुई थी।

शिवजी की माता जीजाबाई की भगवान गणेश में बहुत गहरी आस्था थी। उन्होंने पुणे में कसबा गणपति मंदिर की स्थापना भी करवाई थी। शिवजी ने लोगों में संस्कृति और एकता की भावना जगाने के लिए इसे बढ़ावा दिया। उस दौर में गणेश पूजा से मराठा साम्राज्य के लोगों में नई ऊर्जा आती थी।

Ganesh Chaturthi
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पेशवा काल में मिला राजकीय संरक्षण

18वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य में पेशवाओं का शासन आया। पेशवा शासक भगवान गणेश के बहुत बड़े भक्त माने जाते थे। उन्होंने गणेश चतुर्थी को एक विशाल राजकीय उत्सव का रूप दे दिया।

पुणे का शशनिवार वाड़ा महल इस उत्सव का मुख्य केंद्र हुआ करता था। इस दौरान महल में कई दिनों तक भव्य दरबार और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। पेशवा काल में गणेश पूजा पूरे समाज को एक साथ जोड़ने का काम करती थी।

अंग्रेजों का शासन और गणेशोत्सव की मंदी

साल 1818 में मराठा साम्राज्य का पतन हो गया। इसके बाद भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन पूरी तरह स्थापित हुआ। अंग्रेजों के शासन में राजकीय संरक्षण मिलना पूरी तरह बंद हो गया।

अंग्रेज सरकार भारतीयों के एक जगह इकट्ठा होने पर रोक लगाती थी। इसके कारण गणेश उत्सव का सार्वजनिक स्वरूप काफी हद तक खत्म हो गया। यह पूजा एक बार फिर लोगों के व्यक्तिगत घरों तक ही सीमित होकर रह गई।

Lokmanya Tilak : लोकमान्य तिलक ने गणेशोत्सव को बनाया आजादी का हथियार -  Ganeshotsav Lokmanya Bal Gangadhar Tilak Swaraj | Webdunia Hindi
Lokmanya Tilak : लोकमान्य तिलक ने गणेशोत्सव को बनाया आजादी का हथियार - Ganeshotsav Lokmanya Bal Gangadhar Tilak Swaraj | Webdunia Hindi


लोकमान्य तिलक का क्रांतिकारी कदम

साल 1893 में भारत के इतिहास में एक बहुत बड़ा बदलाव आया। स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने स्थिति को गहराई से समझा। अंग्रेज सरकार ने राजनीतिक बैठकों और सभाओं पर कड़ा प्रतिबंध लगा रखा था।

लेकिन धार्मिक आयोजनों पर रोक लगाना अंग्रेजों के लिए आसान नहीं था। तिलक जी ने गणेश उत्सव को स्वतंत्रता संग्राम का माध्यम बनाने का सोचा। उन्होंने इसे घर से निकालकर सार्वजनिक चौराहों और पंडालों तक पहुंचा दिया।

सार्वजनिक गणेशोत्सव का उद्देश्य

तिलक जी का मकसद केवल धार्मिक पूजा-पाठ तक सीमित बिल्कुल नहीं था। वे छुआछूत और जात-पात के भेदभाव को पूरी तरह खत्म करना चाहते थे। वे समाज के हर वर्ग के लोगों को एक जगह इकट्ठा करना चाहते थे।

गणेश पंडालों में देशभक्ति के भाषण और नाटक आयोजित किए जाने लगे। लोग पूजा के बहाने मिलते थे और आजादी की रणनीति पर चर्चा करते थे। इस तरह गणेशोत्सव आजादी का एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मंच बन गया।

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पुणे से पूरे देश में फैली ये अनोखी लहर

पुणे के भाऊ रंगारी और तिलक जी ने पहला सार्वजनिक पंडाल स्थापित किया। धीरे-धीरे यह परंपरा पूरे महाराष्ट्र और फिर पूरे देश में फैल गई।

केसरी अखबार के जरिए तिलक जी ने इस विचार को जन-जन तक पहुंचाया। अंग्रेज अफसर भी इस चतुर रणनीति को समझ नहीं पाए और लाचार रहे। इस उत्सव ने देशवासियों के अंदर राष्ट्रीयता की नई लहर पैदा कर दी।

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आजादी के बाद का गणेशोत्सव

15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, लेकिन गणेशोत्सव की परंपरा थमी नहीं, बल्कि और भी ज्यादा समृद्ध हो गई। आजादी से पहले बाल गंगाधर तिलक द्वारा शुरू किया गया यह सार्वजनिक उत्सव सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ एकजुटता का जरिया था।

हालांकि, आजादी मिलने के बाद इस पर्व ने अपना स्वरूप बदला और यह देश की सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक पहचान का एक मजबूत स्तंभ बन गया।

आजादी के शुरुआती दशकों में गणेशोत्सव मुख्य रूप से महाराष्ट्र और पुणे-मुंबई तक ही बड़ा त्योहार माना जाता था। लेकिन धीरे-धीरे उत्तर भारत, दक्षिण भारत और गुजरात समेत पूरे देश में इसकी भव्यता फैलने लगी।

आज मुंबई का ऐतिहासिक लालबागचा राजा और पुणे के प्रसिद्ध गणपति पंडाल सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। विदेशों में बसे भारतीय भी अब लंदन, न्यूयॉर्क और दुबई जैसे शहरों में बड़े पैमाने पर गणपति बप्पा का स्वागत करते हैं।

गणेश चतुर्थी विशेष:पुणे के शनिवारवाड़ा में गणपति उत्सव और सामाजिक एकता की  शुरुआत - Ganesh Chaturthi 2021 Know History Importance And Significance Of  This Sacred Festival - Amar Ujala ...
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आधुनिक दौर का इको-फ्रेंडली गणेशोत्सव

आज के मॉडर्न एरा में गणेशोत्सव भक्ति के साथ-साथ पर्यावरण और तकनीक का एक सुंदर संगम बन चुका है। पर्यावरण की रक्षा के लिए अब प्लास्टर ऑफ पेरिस की जगह मिट्टी और गोबर से बनी इको-फ्रेंडली मूर्तियों का चलन तेजी से बढ़ा है। पंडालों में 3D मैपिंग, लेजर शो, ऑनलाइन दर्शन और डिजिटल डोनेशन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है।

आज गणेशोत्सव के जरिए रक्तदान शिविर, शिक्षा प्रोत्साहन, महिला सशक्तिकरण और प्लास्टिक मुक्त भारत जैसे बड़े सामाजिक अभियानों को बढ़ावा दिया जाता है। यह पर्व आज भी देश के हर वर्ग, धर्म और समुदाय के लोगों को एक साथ लाकर एकता, भाईचारे और सांस्कृतिक गौरव का संदेश देता है। देश में गणेश चतुर्थी की धूम रहती है।

डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।

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