तारीख पर तारीख का खेल खत्म: SC ने हाई कोर्ट्स के लिए फिर तय की 3 महीने की सख्त डेडलाइन
Neel Tiwari | May 29, 2026, 16:34 IST
Supreme court statement on 3 months judgement
हाईकोर्ट को अब फैसला सुरक्षित रखने के 3 महीने के भीतर जजमेंट देना होगा। बेल पर फैसला उसी दिन या अगले दिन देना अनिवार्य है। देरी होने पर केस दूसरी बेंच में ट्रांसफर हो सकेगा।
समझें क्या है पूरा मामला...
- हाईकोर्ट् को किसी भी मामले में सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखने के बाद अधिकतम 3 महीने के भीतर जजमेंट देना होगा।
- बेल एप्लीकेशन पर उसी दिन फैसला सुनाना और अपलोड करना होगा। सुरक्षित होने पर अगले दिन हर हाल में आदेश देना अनिवार्य है।
- जज 3+1 महीने तक फैसला नहीं देते, तो याचिकाकर्ता मुख्य न्यायाधीश से केस को दूसरी बेंच में ट्रांसफर करने की मांग कर सकता है।
- यदि कोर्ट केवल मुख्य आदेश सुनाता है, तो पूरे तर्कों के साथ विस्तृत फैसला 15 दिनों के भीतर वेबसाइट पर डालना होगा।
- बेल या सजा निलंबन का आदेश तुरंत जेल प्रशासन को भेजा जाएगा, ताकि आरोपी उसी दिन या अगले दिन रिहा हो सके।
साथ ही, जमानत (Bail) याचिकाओं पर उसी दिन आदेश जारी करने का आदेश दिया है, ताकि नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित न हो। सुप्रीम कोर्ट इसके पहले भी इस तरह का निर्देश दे चुका है । अब लेकिन इस निर्देश से यह उम्मीद जाग गई है कि ओबीसी आरक्षण मामले का फैसला जल्द सामने आ सकता है।
फैसला सुरक्षित रखने के 'ज्यूडिशियल मर्ज' पर SC का प्रहार
मध्य प्रदेश में भी ओबीसी आरक्षण का मामला हर्ड एंड रिजर्व है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने देश की सभी हाई कोर्ट्स के लिए बाध्यकारी दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि फैसलों में देरी से वादियों को भारी नुकसान होता है और यह न्याय की मूल भावना के खिलाफ है। अदालत ने इसे न्यायपालिका की एक ऐसी बीमारी माना है जिसे जड़ से खत्म करना बेहद जरूरी है।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जमानत के नियमों में बदलाव
जजों की जवाबदेही तय: 3 महीने में फैसला
यदि किसी बेंच ने फैसला सुरक्षित रखा है, तो उसे 3 महीने में देना होगा। अगर 3 महीने में फैसला नहीं आता, तो रजिस्ट्रार जनरल इसे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के सामने रखेंगे। इसके बाद चीफ जस्टिस संबंधित बेंच को दो हफ्ते के भीतर फैसला सुनाने का नोटिस देंगे।
जनता को मिला पावर: सुस्त बेंच से वापस खिंच सकेगा केस
तो याचिकाकर्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास आवेदन दे सकता है।
इस आवेदन से वह गुहार लगा सकता है कि मामला सुस्त बेंच से वापस लेकर किसी दूसरी बेंच को सौंप दिया जाए।
ताकि मामले पर नए सिरे से तुरंत सुनवाई हो सके।
आधा-अधूरा फैसला सुनाने की आदत पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ओपन कोर्ट में सुनाए गए फैसले को 24 घंटे के भीतर वेबसाइट पर डालना होगा। अगर केवल मुख्य हिस्सा सुनाया गया है, तो पूरे तर्कों के साथ विस्तृत फैसला (JUDGEMENT) 7 दिनों के भीतर अपलोड होना चाहिए। किसी भी विपरीत परिस्थिति में अधिकतम 15 दिनों में यह अनिवार्य है। इससे पीड़ित पक्ष समय पर कानूनी कदम उठा सकेगा।
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