प्लास्टिक नोट बनाम कागजी नोट, भारत के लिए क्या है बेहतर विकल्प?
Pawan Modiya | Jul 22, 2026, 19:46 IST
प्लास्टिक नोट
RBI ने प्लास्टिक नोटों की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। पॉलिमर नोट ज्यादा टिकाऊ और सुरक्षित माने जाते हैं। ऐसे समय में यह पहल हो रही है, जब UPI तेजी से बढ़ रहा है। सवाल है कि क्या भारत के लिए प्लास्टिक नोट आर्थिक रूप से सही विकल्प साबित होंगे।
भारत दुनिया की पांच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, लेकिन अब तक यहां प्लास्टिक (पॉलिमर) के नोट शुरू नहीं हुए हैं। दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया करीब 30 साल पहले ही पूरी तरह प्लास्टिक नोटों पर आ चुका है और दुनिया के लगभग 60 देश किसी न किसी रूप में इनका इस्तेमाल कर रहे हैं।
हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नोट छापने वाली इकाई ने पॉलिमर सब्सट्रेट (जिस पर प्लास्टिक नोट छपते हैं) की आपूर्ति के लिए वैश्विक कंपनियों से रुचि पत्र मांगे हैं। 2009 में पहली बार प्लास्टिक नोटों का प्रस्ताव आने के बाद यह इस दिशा में सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है।
प्लास्टिक नोट सामान्य कागजी नोटों की तुलना में 2.5 से 4 गुना ज्यादा चलते हैं। ये जल्दी फटते या गंदे नहीं होते और इनमें नकली नोट रोकने के लिए बेहतर सुरक्षा फीचर लगाए जा सकते हैं।
हालांकि इन्हें बनाने के लिए विशेष प्रकार का पॉलीप्रोपाइलीन प्लास्टिक चाहिए, जो पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस से तैयार होता है। इसलिए इसकी लागत और पर्यावरण पर असर को लेकर सवाल उठते हैं।
प्लास्टिक नोट छापने की शुरुआती लागत कागजी नोटों से 30% से 60% तक ज्यादा हो सकती है। कुछ देशों में कम मूल्य वाले नोटों की छपाई लागत उनके मूल्य के 20-24% तक पहुंच गई थी।
समर्थकों का कहना है कि नोट लंबे समय तक चलते हैं, इसलिए बार-बार नए नोट छापने की जरूरत नहीं पड़ेगी और लंबे समय में खर्च कम हो सकता है। खासकर ₹10 और ₹20 जैसे नोट सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं और सबसे जल्दी खराब भी होते हैं।
प्लास्टिक नोटों का शुरुआती कार्बन फुटप्रिंट ज्यादा होता है और इनके निपटान के लिए विशेष रीसाइक्लिंग व्यवस्था चाहिए।
हालांकि RBI के लिए किए गए एक पुराने अध्ययन में पाया गया था कि क्योंकि ये नोट ज्यादा समय तक चलते हैं, इसलिए कुल मिलाकर कम नोट छापने और कम परिवहन की जरूरत पड़ती है। इससे लंबे समय में इनका कुल कार्बन फुटप्रिंट कागजी नोटों से कम हो सकता है।
RBI ऐसे समय प्लास्टिक नोटों पर फिर विचार कर रहा है जब भारत में डिजिटल भुगतान तेजी से बढ़ रहा है।
प्लास्टिक नोट पॉलीप्रोपाइलीन से बनते हैं, जिसकी कीमत कच्चे तेल पर निर्भर करती है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो प्लास्टिक नोट बनाना भी महंगा हो सकता है।
भारत अपनी जरूरत का करीब 20% पॉलीप्रोपाइलीन आयात करता है। हालांकि रिलायंस इंडस्ट्रीज और इंडियन ऑयल जैसी कंपनियां 2030 तक इसका घरेलू उत्पादन बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं।
![प्लास्टिक नोट]()
RBI के अनुसार 2023-24 में नोट छापने पर लगभग ₹5,101 करोड़ खर्च हुए। 2024-25 में यह खर्च बढ़कर ₹16,373 करोड़ पहुंच गया। 2025-26 में यह करीब ₹4,875 करोड़ रहा।
इसके अलावा हर साल करीब ₹5,000 करोड़ नोटों के भंडारण और रखरखाव पर खर्च होते हैं। RBI अपनी 'क्लीन नोट पॉलिसी' के तहत हर साल 20 से 24 अरब पुराने और गंदे नोट नष्ट करता है, जिनमें ज्यादातर छोटे मूल्य के नोट होते हैं।
अगर पॉलीमर प्लास्टिक नोट लागू होते हैं तो केवल नोट छापना ही नहीं, बल्कि एटीएम, नोट गिनने वाली मशीनें, वेंडिंग मशीनें और बैंकिंग उपकरण भी नए नोटों के हिसाब से अपडेट करने होंगे। इसका अतिरिक्त खर्च बैंकों, कैश मैनेजमेंट कंपनियों और कारोबारियों को उठाना पड़ सकता है।
भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण ने अब घरेलू और विदेशी कंपनियों से 18 अगस्त तक पॉलिमर सब्सट्रेट की आपूर्ति के लिए बोलियां मांगी हैं। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा भी साफ कर चुके हैं कि प्लास्टिक नोटों पर फिर से गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
भारत में डिजिटल भुगतान तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन नकदी की जरूरत अभी खत्म नहीं हुई है। ऐसे में सवाल सिर्फ कागज और प्लास्टिक में से किसी एक को चुनने का नहीं है, बल्कि ऐसी नकदी व्यवस्था बनाने का है जो सुरक्षित हो, लंबे समय तक चले और कम खर्चीली भी साबित हो।
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हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नोट छापने वाली इकाई ने पॉलिमर सब्सट्रेट (जिस पर प्लास्टिक नोट छपते हैं) की आपूर्ति के लिए वैश्विक कंपनियों से रुचि पत्र मांगे हैं। 2009 में पहली बार प्लास्टिक नोटों का प्रस्ताव आने के बाद यह इस दिशा में सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है।
प्लास्टिक नोट ही क्यों?
हालांकि इन्हें बनाने के लिए विशेष प्रकार का पॉलीप्रोपाइलीन प्लास्टिक चाहिए, जो पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस से तैयार होता है। इसलिए इसकी लागत और पर्यावरण पर असर को लेकर सवाल उठते हैं।
लागत सबसे बड़ी चुनौती
समर्थकों का कहना है कि नोट लंबे समय तक चलते हैं, इसलिए बार-बार नए नोट छापने की जरूरत नहीं पड़ेगी और लंबे समय में खर्च कम हो सकता है। खासकर ₹10 और ₹20 जैसे नोट सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं और सबसे जल्दी खराब भी होते हैं।
पर्यावरण पर क्या असर?
हालांकि RBI के लिए किए गए एक पुराने अध्ययन में पाया गया था कि क्योंकि ये नोट ज्यादा समय तक चलते हैं, इसलिए कुल मिलाकर कम नोट छापने और कम परिवहन की जरूरत पड़ती है। इससे लंबे समय में इनका कुल कार्बन फुटप्रिंट कागजी नोटों से कम हो सकता है।
फिर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
- UPI से हर साल 24,000 करोड़ से ज्यादा लेनदेन हो रहे हैं।
- खुदरा डिजिटल भुगतान का लगभग 85% हिस्सा UPI से होता है।
- इसके बावजूद देश में नकदी का चलन भी लगातार बढ़ रहा है। 2025-26 तक प्रचलन में मुद्रा का मूल्य 41 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है।
तेल की कीमत भी चिंता
भारत अपनी जरूरत का करीब 20% पॉलीप्रोपाइलीन आयात करता है। हालांकि रिलायंस इंडस्ट्रीज और इंडियन ऑयल जैसी कंपनियां 2030 तक इसका घरेलू उत्पादन बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं।
प्लास्टिक नोट
कागजी नोट छापने में कितना खर्च?
इसके अलावा हर साल करीब ₹5,000 करोड़ नोटों के भंडारण और रखरखाव पर खर्च होते हैं। RBI अपनी 'क्लीन नोट पॉलिसी' के तहत हर साल 20 से 24 अरब पुराने और गंदे नोट नष्ट करता है, जिनमें ज्यादातर छोटे मूल्य के नोट होते हैं।
सिर्फ नोट बदलना ही काफी नहीं
पहले भी हो चुकी है कोशिश
- 2009 में RBI ने पहली बार प्लास्टिक ₹10 नोटों का प्रस्ताव रखा था।
- 2012 में कोच्चि, मैसूरु, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला में पायलट प्रोजेक्ट की घोषणा हुई।
- तकनीकी समस्याओं के कारण योजना आगे नहीं बढ़ सकी।
- 2016 की नोटबंदी और नई नोट श्रृंखला छापने की वजह से यह योजना ठंडे बस्ते में चली गई।
अब आगे क्या?
भारत में डिजिटल भुगतान तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन नकदी की जरूरत अभी खत्म नहीं हुई है। ऐसे में सवाल सिर्फ कागज और प्लास्टिक में से किसी एक को चुनने का नहीं है, बल्कि ऐसी नकदी व्यवस्था बनाने का है जो सुरक्षित हो, लंबे समय तक चले और कम खर्चीली भी साबित हो।
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