पहाड़ों को डिस्पोजेबल मानना बंद करे देश, माउंटेन प्रोटेक्शन एक्ट का ब्लूप्रिंट होगा तैयार
Jinesh Jain | May 21, 2026, 19:40 IST
Photograph: (the sootr)
देश में पर्वत संरक्षण-सुरक्षा कानून को लेकर झारखंड के जमशेदपुर में 22 मई से दो दिन का सम्मेलन शुरू हो रहा है। इस सम्मेलन में पर्वतों से जुड़े सवालों पर चर्चा करके पर्वत संरक्षण प्रारूप को अंतिम रूप दिया जाएगा।
क्या देश को जीवन देने वाले पर्वतों को विकास की वेदी पर कानूनी रूप से नष्ट होने योग्य माना जा सकता है? इसी मूलभूत संवैधानिक प्रश्न के साथ 22 मई से झारखंड़ के जमशेदपुर में माउंटेन प्रोटेक्शन एक्ट पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आगाज हो रहा है।
जागरूक नागरिकों और विशेषज्ञों के सहयोग से तैयार भारतीय पर्वत निरंतरता एवं सुरक्षा अधिनियम, 2026 के प्रारूप के जरिए नीति-निर्माताओं के सामने यह बात मजबूती से रखी जा रही है कि जब पहाड़ टूटते हैं तो देश की अर्थव्यवस्था और सभ्यतागत सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाती है।
मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित राजस्थान के पर्यावरणविद् राजेंद्र सिंह ने जयपुर में बताया कि इस सम्मेलन में देश के जाने-माने पर्यावरणविदों, कानूनी विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं और जागरूक नागरिकों की भागीदारी रहेगी। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य पर्वतों से जुड़े गंभीर संकटों पर चर्चा करना और पर्वत संरक्षण प्रारूप को अंतिम रूप देना है।
इस सम्मेलन में देश के सामने एक ड्राफ्ट पेश किया जा रहा है, जिसका नाम भारतीय पर्वत निरंतरता एवं सुरक्षा अधिनियम, 2026 है। नागरिकों और विशेषज्ञों के सहयोग से तैयार इस जन-प्रारूप का मूल दर्शन यह है कि पर्वत केवल मिट्टी और पत्थरों की भूवैज्ञानिक संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि वे भारत की पहली राष्ट्रीय आधारभूत संरचना (National Infrastructure) हैं।
सम्मेलन के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकारों से यह मौलिक संवैधानिक प्रश्न पूछा जा रहा है कि क्या जीवन देने वाली पर्वत प्रणालियों को कानूनी रूप से नष्ट होने योग्य माना जा सकता है?
राजेंद्र सिंह के अनुसार वर्तमान में भारत के पास जंगलों, वन्यजीवों, नदियों, खनन, भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय स्वीकृतियों को नियंत्रित करने के लिए दर्जनों कानून मौजूद हैं। लेकिन आज तक देश के विधायी इतिहास में यह बुनियादी प्रश्न नहीं उठाया गया कि जो पर्वत भारत को पानी, सुरक्षा और मौसम चक्र प्रदान करते हैं, उन्हें विकास की वेदी पर नष्ट होने योग्य (Disposable) क्यों मान लिया गया है?
प्रस्तावित भारतीय पर्वत निरंतरता एवं सुरक्षा अधिनियम 2026 के ड्राफ्ट के माध्यम से देश में एक नए विमर्श की नींव रखी जा रही है। इसका उद्देश्य पर्वतों को ऐसा कड़ा संवैधानिक संरक्षण प्रदान करना है, जिससे देश की जल-निरंतरता, पारिस्थितिक स्थिरता, आपदा-प्रतिरोधक क्षमता और दीर्घकालिक सभ्यतागत सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
पर्यावरणविद् राजेंद्र सिंह का कहना है कि सम्मेलन के ड्राफ्ट पेपर में इस बात को प्रमुखता से उठाया जाएगा कि दशकों से भारत में पर्वतीय क्षेत्रों का शासन अत्यंत खंडित, परियोजना-केन्द्रित और प्रतिक्रियात्मक (Reactive) रहा है।
वर्तमान व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी यह है कि शासन तब जागता है जब विनाश हो चुका होता है-बाढ़ आने के बाद राहत बांटी जाती है, पहाड़ धंसने के बाद रास्ते बंद होते हैं और जल संकट गहराने पर कमेटियां बनाई जाती हैं।
इस पारंपरिक ढर्रे को बदलने के लिए प्रस्तावित कानून एक क्रांतिकारी संवैधानिक सिद्धांत पर आधारित है: अपरिवर्तनीय क्षति संभव होने से पहले ही संरक्षण लागू होना चाहिए। यह ड्राफ्ट नुकसान होने के बाद के प्रशासनिक सुधारों के बजाय नुकसान को रोकने की पूर्व-संवैधानिक गारंटी देता है।
राजेंद्र सिंह ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि पूरा देश इस समय पारिस्थितिक आपदाओं की प्रत्यक्ष चेतावनी देख रहा है।
हिमालयी क्षेत्रों में हाल के वर्षों में आई अचानक बाढ़, जोशीमठ जैसी जगहों पर पहाड़ों का धंसना, कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक सूखते प्राकृतिक झरने, ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, अनियंत्रित और बेमौसम वर्षा और लगातार हो रहे भूस्खलन अब प्राकृतिक हादसे नहीं हैं। ये इस बात के स्पष्ट संरचनात्मक संकेत हैं कि हमारे पहाड़ों की सहने की क्षमता समाप्त हो रही है।
मौजूदा नियामक प्रणालियां केवल औपचारिकताओं और फाइलों तक सीमित हैं। विनाश के बाद पुनर्निर्माण और विस्थापन के बाद मुआवजे की नीति ने देश के पर्यावरण को गंभीर संकट में डाल दिया है। यही कारण है कि अब पूर्व-संवैधानिक संरक्षण की मांग की जा रही है, ताकि अनियंत्रित कानूनी या व्यावसायिक गतिविधियां ऐसी अपूरणीय क्षति न कर सकें जिसे बाद में संभालना प्रशासनिक तंत्र के बस से बाहर हो जाए।
उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यह ड्राफ्ट किसी भी तरह से विकास विरोधी नहीं है। पहाड़ों में रहने वाले स्थानीय समुदायों को भी रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं, सड़कें, पर्यटन, संचार और सीमा सुरक्षा के लिए बुनियादी ढांचे की समान आवश्यकता है।
हमारा उद्देश्य सड़कों, अस्पतालों, कृषि या बिजली परियोजनाओं को रोकना नहीं है, बल्कि यह तय करना है कि विकास और संरक्षण के बीच एक संवैधानिक संतुलन हो। मूल प्रश्न यह नहीं है कि विकास बनाम संरक्षण में से किसे चुना जाए।
मूल प्रश्न यह है कि क्या उन गतिविधियों को केवल कुछ प्रशासनिक अधिकारियों के विवेक पर छोड़ा जा सकता है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए अपूरणीय संवैधानिक क्षति का कारण बन सकती हैं।
ड्राफ्ट में बताया जाएगा कि कोई भी सरकारी संस्था, स्थानीय निकाय या प्रशासनिक प्राधिकरण तब तक किसी पर्वतीय तंत्र को प्रभावित करने वाली किसी परियोजना को मंजूरी नहीं दे सकेगा, जब तक संवैधानिक स्तर पर उसकी सुरक्षा की जांच न हो जाए।
अक्सर देखा जाता है कि बड़ी तबाही अचानक नहीं आती, बल्कि छोटे-छोटे प्रशासनिक निर्णयों, पर्यावरण नियमों में ढील और व्यक्तिगत अनुमतियों के कारण पहाड़ धीरे-धीरे खोखले होते जाते हैं। यह कानून इस तरह की प्रशासनिक मनमानी पर रोक लगाता है। कानून के तहत “कानूनी जोखिम” को नए सिरे से परिभाषित किया गया है-यानी कोई भी ऐसी प्रशासनिक या नियामक स्थिति, जिससे किसी संरक्षित पर्वतीय तंत्र को थोड़ा भी नुकसान पहुँचने की संभावना हो, उसे अवैध माना जाएगा।
राजेंद्र सिंह का कहना है कि जमशेदपुर में शुरू हो रहा यह दो दिवसीय सम्मेलन आने वाले दिनों में देश की पर्यावरण नीति और विधायी ढांचे के लिए एक नया मील का पत्थर साबित हो सकता है।
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जागरूक नागरिकों और विशेषज्ञों के सहयोग से तैयार भारतीय पर्वत निरंतरता एवं सुरक्षा अधिनियम, 2026 के प्रारूप के जरिए नीति-निर्माताओं के सामने यह बात मजबूती से रखी जा रही है कि जब पहाड़ टूटते हैं तो देश की अर्थव्यवस्था और सभ्यतागत सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाती है।
सम्मेलन में पेश होगा ड्राफ्ट
इस सम्मेलन में देश के सामने एक ड्राफ्ट पेश किया जा रहा है, जिसका नाम भारतीय पर्वत निरंतरता एवं सुरक्षा अधिनियम, 2026 है। नागरिकों और विशेषज्ञों के सहयोग से तैयार इस जन-प्रारूप का मूल दर्शन यह है कि पर्वत केवल मिट्टी और पत्थरों की भूवैज्ञानिक संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि वे भारत की पहली राष्ट्रीय आधारभूत संरचना (National Infrastructure) हैं।
सम्मेलन के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकारों से यह मौलिक संवैधानिक प्रश्न पूछा जा रहा है कि क्या जीवन देने वाली पर्वत प्रणालियों को कानूनी रूप से नष्ट होने योग्य माना जा सकता है?
क्या पर्वत नष्ट होने योग्य हैं?
प्रस्तावित भारतीय पर्वत निरंतरता एवं सुरक्षा अधिनियम 2026 के ड्राफ्ट के माध्यम से देश में एक नए विमर्श की नींव रखी जा रही है। इसका उद्देश्य पर्वतों को ऐसा कड़ा संवैधानिक संरक्षण प्रदान करना है, जिससे देश की जल-निरंतरता, पारिस्थितिक स्थिरता, आपदा-प्रतिरोधक क्षमता और दीर्घकालिक सभ्यतागत सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
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वर्तमान नीतियों की विफलता और 'अपरिवर्तनीय क्षति' का सिद्धांत
वर्तमान व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी यह है कि शासन तब जागता है जब विनाश हो चुका होता है-बाढ़ आने के बाद राहत बांटी जाती है, पहाड़ धंसने के बाद रास्ते बंद होते हैं और जल संकट गहराने पर कमेटियां बनाई जाती हैं।
इस पारंपरिक ढर्रे को बदलने के लिए प्रस्तावित कानून एक क्रांतिकारी संवैधानिक सिद्धांत पर आधारित है: अपरिवर्तनीय क्षति संभव होने से पहले ही संरक्षण लागू होना चाहिए। यह ड्राफ्ट नुकसान होने के बाद के प्रशासनिक सुधारों के बजाय नुकसान को रोकने की पूर्व-संवैधानिक गारंटी देता है।
आपदा के मुहाने पर भारत: अब और ढिलाई नहीं
हिमालयी क्षेत्रों में हाल के वर्षों में आई अचानक बाढ़, जोशीमठ जैसी जगहों पर पहाड़ों का धंसना, कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक सूखते प्राकृतिक झरने, ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, अनियंत्रित और बेमौसम वर्षा और लगातार हो रहे भूस्खलन अब प्राकृतिक हादसे नहीं हैं। ये इस बात के स्पष्ट संरचनात्मक संकेत हैं कि हमारे पहाड़ों की सहने की क्षमता समाप्त हो रही है।
मौजूदा नियामक प्रणालियां केवल औपचारिकताओं और फाइलों तक सीमित हैं। विनाश के बाद पुनर्निर्माण और विस्थापन के बाद मुआवजे की नीति ने देश के पर्यावरण को गंभीर संकट में डाल दिया है। यही कारण है कि अब पूर्व-संवैधानिक संरक्षण की मांग की जा रही है, ताकि अनियंत्रित कानूनी या व्यावसायिक गतिविधियां ऐसी अपूरणीय क्षति न कर सकें जिसे बाद में संभालना प्रशासनिक तंत्र के बस से बाहर हो जाए।
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विकास विरोधी नहीं, बल्कि संवैधानिक सीमा में विकास
हमारा उद्देश्य सड़कों, अस्पतालों, कृषि या बिजली परियोजनाओं को रोकना नहीं है, बल्कि यह तय करना है कि विकास और संरक्षण के बीच एक संवैधानिक संतुलन हो। मूल प्रश्न यह नहीं है कि विकास बनाम संरक्षण में से किसे चुना जाए।
मूल प्रश्न यह है कि क्या उन गतिविधियों को केवल कुछ प्रशासनिक अधिकारियों के विवेक पर छोड़ा जा सकता है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए अपूरणीय संवैधानिक क्षति का कारण बन सकती हैं।
कानूनी जोखिम की नई परिभाषा
अक्सर देखा जाता है कि बड़ी तबाही अचानक नहीं आती, बल्कि छोटे-छोटे प्रशासनिक निर्णयों, पर्यावरण नियमों में ढील और व्यक्तिगत अनुमतियों के कारण पहाड़ धीरे-धीरे खोखले होते जाते हैं। यह कानून इस तरह की प्रशासनिक मनमानी पर रोक लगाता है। कानून के तहत “कानूनी जोखिम” को नए सिरे से परिभाषित किया गया है-यानी कोई भी ऐसी प्रशासनिक या नियामक स्थिति, जिससे किसी संरक्षित पर्वतीय तंत्र को थोड़ा भी नुकसान पहुँचने की संभावना हो, उसे अवैध माना जाएगा।
राजेंद्र सिंह का कहना है कि जमशेदपुर में शुरू हो रहा यह दो दिवसीय सम्मेलन आने वाले दिनों में देश की पर्यावरण नीति और विधायी ढांचे के लिए एक नया मील का पत्थर साबित हो सकता है।
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