प्राइवेट पार्ट में वाइब्रेटिंग डिवाइस रखा तो भी रेप, HC का फैसला

Jitendra Shrivastava | Aug 01, 2026, 20:25 IST
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नाबालिग के प्राइवेट पार्ट में वाइब्रेटर डिवाइस रखा तो भी रेप
Photograph: (THESOOTR)

KERLA. केरल हाईकोर्ट ने नाबालिग पर वाइब्रेटिंग डिवाइस के इस्तेमाल को रेप माना है। इसके बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का पुराना फैसला फिर चर्चा में आ गया है।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • वाइब्रेटिंग डिवाइस से हमला भी रेप, केरल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला।
  • छत्तीसगढ़ HC की पुरानी टिप्पणी अचानक फिर चर्चा में आई।
  • बिना अंग प्रवेश के भी हो सकता है रेप, जानें कोर्ट की राय।
  • दो हाईकोर्ट, दो फैसले, कानून की एक ही उलझन सामने आई।
  • रेप की कानूनी परिभाषा को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
केरल हाईकोर्ट ने एक नाबालिग के प्राइवेट पार्ट पर वाइब्रेटिंग डिवाइस जबरन रखने को रेप माना है। कोर्ट ने इस कृत्य को POCSO और IPC की धारा 375 के तहत गंभीर अपराध बताया है।

इस फैसले के बाद फरवरी 2026 का छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का एक पुराना फैसला फिर चर्चा में आया। उस मामले में बिना प्रवेश के केवल वीर्य निकलने को कोर्ट ने रेप नहीं माना था। दोनों फैसलों में फर्क घटना के तथ्यों और निजी अंग में प्रवेश की कानूनी परिभाषा पर टिका है।

किसी महिला या बच्ची के साथ जबरदस्ती हो और मामला अदालत तक पहुंचे, तो सवाल सिर्फ अपराध की गंभीरता का नहीं रहता। सवाल यह भी बनता है कि कानून उस कृत्य को किस श्रेणी में रखता है। केरल हाईकोर्ट के हालिया फैसले ने इसी सवाल को फिर सुर्खियों में ला दिया है।

केरल हाईकोर्ट का फैसला

कोर्ट के सामने एक नाबालिग से जुड़ा मामला था। आरोपी ने पीड़िता के प्राइवेट पार्ट पर वाइब्रेटिंग मशीन जैसा डिवाइस जबरन इस्तेमाल किया था। निचली अदालत में इसे सामान्य यौन उत्पीड़न माना गया था।

केरल हाईकोर्ट ने इस नजरिए को गलत बताया। कोर्ट ने कहा कि यह कृत्य सामान्य छेड़छाड़ नहीं है। इसे POCSO कानून के तहत गंभीर यौन अपराध की श्रेणी में रखा गया। साथ ही IPC की धारा 375 के तहत भी इसे रेप माना गया।

कोर्ट का कहना था कि डिवाइस का इस्तेमाल भी शरीर में जबरन प्रवेश जैसा ही असर डालता है। इसलिए सिर्फ इंसानी अंग शामिल न होने से अपराध हल्का नहीं हो जाता। फैसले में साफ संदेश दिया गया कि पीड़िता की गरिमा और शरीर की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा।

छत्तीसगढ़ HC की पुरानी टिप्पणी

इसी फैसले के साथ फरवरी 2026 का एक और मामला याद आया। यह छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में सुना गया था। वहां अदालत के सामने अलग तरह की परिस्थिति थी।

आरोपी ने पीड़िता के निजी अंग में किसी वस्तु या शरीर के अंग से प्रवेश नहीं किया था। घटना में केवल वीर्य निकलने की बात सामने आई थी। कोर्ट ने कहा कि बिना प्रवेश के इसे धारा 375 के तहत पूर्ण रेप नहीं माना जा सकता।

इस आधार पर आरोपी को रेप के बजाय रेप के प्रयास का दोषी ठहराया गया। सजा भी उसी अनुसार कम रखी गई। यह फैसला उस वक्त भी बहस का विषय बना था।

दोनों फैसलों में फर्क

पहली नजर में दोनों फैसले उलझन पैदा करते हैं। एक में डिवाइस के इस्तेमाल को प्रवेश जैसा माना गया। दूसरे में बिना प्रवेश के यौन कृत्य को रेप नहीं माना गया।

असल फर्क घटना के तथ्यों में है। केरल मामले में डिवाइस को शरीर के अंदर या निजी हिस्से पर जबरन इस्तेमाल किया गया। यह कानूनी तौर पर प्रवेश की श्रेणी में आया। छत्तीसगढ़ मामले में ऐसा कोई प्रवेश साबित नहीं हो पाया था।

कानून क्या कहता है

IPC की धारा 375 के तहत रेप की परिभाषा प्रवेश की शर्त पर टिकी है। प्रवेश शरीर के किसी अंग से हो या किसी वस्तु से, दोनों को कानून में शामिल किया गया है। यही वजह है कि केरल हाईकोर्ट डिवाइस के इस्तेमाल को भी प्रवेश मान सकी।

छत्तीसगढ़ मामले में अदालत को प्रवेश का पुख्ता सबूत नहीं मिला था। इसलिए वहां रेप के बजाय रेप के प्रयास की धारा लगी। दोनों फैसले कानून के एक ही प्रावधान की अलग-अलग परिस्थितियों में व्याख्या दिखाते हैं।

आगे क्या मायने रखता है

कानूनी जानकारों का मानना है कि ऐसे मामलों में हर घटना के तथ्य अलग होते हैं। इसलिए अदालतें भी हर केस को उसकी परिस्थिति के हिसाब से देखती हैं। केरल हाईकोर्ट का फैसला आने वाले समय में इसी तरह के मामलों में एक नजीर बन सकता है।

पीड़ितों के अधिकारों से जुड़े मामलों में हर फैसला बारीकी से देखा जाता है। यही वजह है कि केरल और छत्तीसगढ़ के दोनों फैसले एक साथ चर्चा में हैं।

FAQ

  1. केरल हाईकोर्ट ने वाइब्रेटिंग डिवाइस के मामले में क्या फैसला दिया?
    केरल हाईकोर्ट ने नाबालिग के प्राइवेट पार्ट पर वाइब्रेटिंग डिवाइस जबरन इस्तेमाल करने को रेप माना है। कोर्ट ने इसे POCSO और IPC धारा 375 के तहत गंभीर अपराध बताया।
  2. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फरवरी 2026 का फैसला क्या था?
    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा था कि बिना किसी अंग या वस्तु के प्रवेश के केवल वीर्य निकलने को रेप नहीं माना जा सकता। आरोपी को रेप के प्रयास का दोषी ठहराया गया था।
  3. दोनों फैसलों में मुख्य फर्क क्या है?
    दोनों फैसलों में फर्क घटना के तथ्यों और प्रवेश की कानूनी स्थिति पर है। केरल मामले में डिवाइस को प्रवेश माना गया, जबकि छत्तीसगढ़ मामले में प्रवेश साबित नहीं हो पाया था।
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