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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार, 08 फरवरी को पद छड़ने को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि यदि संघ चाहे तो वे कभी भी अपने पद से हटने के लिए तैयार हैं।
उन्होंने कहा कि मैंने 75 साल पूरे कर लिए हैं। मैंने आरएसएस को इस बारे में बता भी दिया था। लेकिन संगठन ने मुझसे काम जारी रखने को कहा है। जब भी संघ उन्हें कहेगा, वे तुरंत पद छोड़ देंगे लेकिन काम से रिटायरमेंट कभी नहीं होगी।
उन्होंने आगे कहा कि हमें समस्याओं पर ध्यान देने के बजाय समाधान ढूंढने पर ध्यान देना चाहिए। जब तक सच्चाई सामने नहीं आती, तब तक भ्रम बना रहता है।
यह बातें उन्होंने मुंबई में आरएसएस की शताब्दी वर्षगांठ के मौके पर एक इंटरएक्टिव सत्र के दौरान कहीं। इस कार्यक्रम में ऐक्टर सलमान खान समेत बॉलीवुड की कई बड़ी हस्तियां भी मौजूद थीं।
मुंबई में RSS के 100 साल पूरे होने के विशेष कार्यक्रम के दौरान RSS प्रमुख मोहन भागवत ने अपनी सक्रियता पर बड़ी बात कही। उन्होंने साझा किया कि 75 वर्ष की आयु पूरी होने पर वे जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते थे, लेकिन संगठन के आग्रह पर उन्होंने काम जारी रखने का निर्णय लिया।#RSS… pic.twitter.com/ZFbRCzN8Og
— TheSootr (@TheSootr) February 8, 2026
बता दें कि इस मौके पर भागवत ने संगठन की फंडिंग, जाति व्यवस्था, भाषा विवाद, घर वापसी और अवैध प्रवासियों जैसे मुद्दों पर खुलकर बात की है। उन्होंने कहा कि संघ स्वयंसेवकों के सहयोग से चलता है और सभी जातियों के लिए काम करता है।
आरएसएस प्रमुख के लिए क्या चाहिए...
समारोह में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने साफ किया कि जो भी काम करने वाला होगा, वही संघ प्रमुख बनेगा, चाहे वो किसी भी जाति का क्यों न हो।
भागवत ने आगे कहा जो भी बनेगा, वह हिन्दू ही होगा।
उन्होंने कहा कि संघ का प्रमुख न तो ब्राह्मण होता है, न क्षत्रिय और न ही वैश्य। संघ में किसी का मान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके काम से होता है। जो उपलब्ध है और सबसे योग्य है, उसे ही जिम्मेदारी दी जाती है।
भविष्य में एससी (SC) या एसटी (ST) वर्ग का व्यक्ति भी सरसंघचालक बन सकता है। जो काम करेगा, वही आगे बढ़ेगा।
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4 किस्म के हिंदू होते हैं
भागवत ने कहा कि हिंदू पहचान को लेकर चार तरह के लोग होते हैं।
पहले समूह में वे लोग हैं जो गर्व से अपनी हिंदू पहचान को खुलकर बताते हैं। जैसे, "गर्व से कहो हम हिंदू हैं।"
दूसरे समूह में वे लोग आते हैं जो हिंदू होने को मानते हैं, लेकिन इसे कोई खास बात नहीं समझते। वे कहते हैं, "गर्व की क्या बात है?"
तीसरे समूह में वे लोग हैं जो अपनी हिंदू पहचान के बारे में सिर्फ निजी तौर पर ही बात करना पसंद करते हैं। जैसे, "धीरे बोलो, हम हिंदू हैं।"
चौथे समूह में वे लोग शामिल हैं जो अपनी हिंदू पहचान भूल चुके हैं, या फिर उन्हें भुला दिया गया है।
आरएसएस प्रमुख के स्पीच की बड़ी बातें...
संघ देश में चल रहे अच्छे प्रयासों को मजबूत करने पर ध्यान देता है। संघ कोई मिलिट्री फोर्स नहीं है। रूट मार्च और लाठी अभ्यास के बावजूद इसे सैन्य संगठन नहीं मानना चाहिए।
हिंदुत्व अपनाने से किसी को कुछ भी छोड़ने की जरूरत नहीं। पूजा-पद्धति, भाषा या रहन-सहन में कोई बदलाव नहीं होगा। हिंदुत्व का मतलब है, सबकी सुरक्षा और एक साथ रहने का भरोसा।
लोगों की आस्था, खाने-पीने की आदतें, और भाषा अलग हो सकती हैं, लेकिन हम सब एक ही समाज और देश का हिस्सा हैं। यही सोच हिंदुत्व है। इसे भारतीयता भी कह सकते हैं। इसलिए हिंदू-मुस्लिम एकता कहावत सही नहीं है।
1925 में RSS बनने से पहले, अंग्रेजों ने कांग्रेस को अपनी सुरक्षा के लिए बनाया था। बाद में भारतीयों ने कांग्रेस को स्वतंत्रता संग्राम का मजबूत हथियार बना लिया।
देश में स्वदेशी उत्पादन को मजबूत करना जरूरी है, लेकिन दुनिया से जुड़ाव भी अहम है। यह जुड़ाव टैक्स या टैरिफ लगा कर नहीं होना चाहिए।
परिवारों में बातचीत जरूरी है ताकि नई पीढ़ी ड्रग्स और सुसाइड से बचे। नागरिकों को यह सोचना चाहिए कि वे देश की सेवा में कितना समय दे सकते हैं। हमें एक-दूसरे का साथ देना होगा और शांति से साथ रहना होगा।
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