बार-बार के चुनाव पर लगेगा ब्रेक, देश में वन नेशन, वन इलेक्शन का रास्ता साफ!

Amresh Kushwaha | Jul 11, 2026, 11:26 IST
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वन नेशन, वन इलेक्शन
वन नेशन, वन इलेक्शन

संसद की संयुक्त समिति के मुताबिक एक देश, एक चुनाव व्यवस्था 2029 के आम चुनावों से लागू हो सकती है। समिति अध्यक्ष पी.पी. चौधरी के अनुसार 99% संगठनों ने इसका समर्थन किया है।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • संसद की संयुक्त समिति एक देश-एक चुनाव व्यवस्था पर काम कर रही है।
  • यह व्यवस्था 2029 के आम चुनावों से लागू हो सकती है।
  • समिति अध्यक्ष पी.पी. चौधरी के मुताबिक 99% संगठनों ने इसका समर्थन किया है।
  • बार-बार चुनाव कराने से देश को हर साल 7 लाख करोड़ रुपए का नुकसान होता है।
  • सरकार बीच में गिरने पर सिर्फ बचे कार्यकाल के लिए चुनाव कराए जाएंगे।
देश में एक देश, एक चुनाव की व्यवस्था को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। संसद की संयुक्त समिति इस पर लगातार काम कर रही है। समिति के मुताबिक यह व्यवस्था 2029 के आम चुनावों से लागू हो सकती है। समिति अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने इस पर बड़ा दावा किया है। उनके अनुसार अब तक हुई चर्चा में शामिल 99% संगठनों ने इसका समर्थन किया है।

समिति ने क्या कहा

समिति अध्यक्ष पी.पी. चौधरी के मुताबिक यह प्रस्ताव देश के लिए बड़ा सुधार साबित हो सकता है। उन्होंने बताया कि अब तक जितने भी नागरिक समाज और संगठनों से बात हुई है, उनमें से 99% ने इसका समर्थन किया है। समिति ने कई राज्यों की सरकारों से भी सलाह ली है। इसमें गोवा के मुख्यमंत्री और वहां के कैबिनेट मंत्री भी शामिल रहे। समिति का मकसद देशभर में चुनाव कराने का एक साझा तंत्र तैयार करना है।

कितना आर्थिक नुकसान होता है

समिति ने इस प्रस्ताव के पीछे बड़ी आर्थिक वजह भी बताई है। देश में अलग-अलग समय पर चुनाव होने से हर बार भारी खर्च होता है। समिति के मुताबिक इससे देश को करीब सात लाख करोड़ रुपए का नुकसान होता है। यदि सभी चुनाव एक साथ कराए जाएं, तो यह भारी खर्च बचाया जा सकता है। समिति का मानना है कि यह राशि देश के विकास कामों में लगाई जा सकती है।

पर्यटन और व्यापार पर असर

बार-बार चुनाव होने का असर सिर्फ सरकारी खजाने तक सीमित नहीं है। आज सभी राज्यों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। जब किसी एक राज्य में चुनाव होते हैं, तो वहां आचार संहिता लागू हो जाती है। इसका असर सिर्फ उसी राज्य तक नहीं रहता। पड़ोसी राज्यों के व्यापार और पर्यटन पर भी इसका बुरा असर पड़ता है। इस वजह से पूरे देश की आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं।

शिक्षा पर भी पड़ती है मार

चुनाव का असर स्कूली शिक्षा पर भी सीधा पड़ता है। बार-बार चुनाव होने पर सरकारी शिक्षकों की ड्यूटी चुनाव कार्यों में लगानी पड़ती है। इससे स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई का काम प्रभावित होता है। सबसे ज्यादा नुकसान सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब बच्चों को उठाना पड़ता है। समिति का कहना है कि एक साथ चुनाव कराने से यह समस्या भी काफी हद तक कम हो जाएगी।

एक देश एक चुनाव का मतलब

अब सवाल उठता है कि आखिर इस व्यवस्था का मतलब क्या है। इसका सीधा मतलब है कि लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव अलग-अलग समय पर कराने की बजाय एक साथ कराए जाएंगे। इससे देश में बार-बार चुनावी माहौल बनने की स्थिति खत्म हो जाएगी। सरकार और प्रशासन का ज्यादा समय चुनाव प्रक्रिया की बजाय विकास कामों में लग सकेगा।

राज्यों के कार्यकाल का क्या होगा

इस प्रस्ताव को लेकर राज्यों के कार्यकाल को लेकर भी सवाल उठते हैं। जिन राज्यों का कार्यकाल 2029 के बाद तक चलेगा, उनके लिए संविधान संशोधन का सहारा लिया जाएगा। संशोधन के जरिए उन राज्यों के कार्यकाल को तय समय से पहले ही समाप्त किया जाएगा। इसके बाद उन्हें 2029 के चुनावी चक्र के साथ जोड़ दिया जाएगा। वहीं जिन राज्यों का कार्यकाल 2029 से पहले ही खत्म हो रहा है, वहां कुछ समय के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। एक अन्य विकल्प के तहत वहां सिर्फ 2029 तक के लिए चुनाव कराया जा सकता है।

कानूनी चुनौतियां क्या हैं?

इस पूरी योजना को लागू करने में कई कानूनी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। इसके लिए संविधान के कई अनुच्छेदों में संशोधन करना जरूरी होगा। इनमें अनुच्छेद 83, 172 और 356 जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल हैं। किसी भी संविधान संशोधन के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है। इसके साथ ही आधे राज्यों की सहमति भी लेनी होगी। यही वजह है कि इस प्रस्ताव को कानूनी तौर पर लागू करना आसान काम नहीं माना जा रहा।

सरकार गिरने पर क्या नियम होगा

एक अहम सवाल यह भी है कि अगर बीच में ही किसी राज्य की सरकार गिर जाए तो क्या होगा। इसके लिए समिति ने एक नया प्रस्ताव तैयार किया है। इस प्रस्ताव के तहत मध्यावधि चुनाव पूरे 5 साल के लिए नहीं कराए जाएंगे। इसके बजाय सिर्फ बचे हुए कार्यकाल के लिए ही चुनाव कराया जाएगा। इससे अगला चुनावी चक्र प्रभावित नहीं होगा और पूरी व्यवस्था तय समय पर बनी रहेगी। समिति का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था से पूरे सिस्टम में स्थिरता बनी रहेगी।

समिति अभी भी विभिन्न राज्यों और नागरिक संगठनों से लगातार बातचीत कर रही है। आने वाले समय में और भी सुझाव लिए जाएंगे। इसके बाद ही इस प्रस्ताव को अंतिम रूप देकर संसद में पेश किया जाएगा। सरकार का मानना है कि अगर यह व्यवस्था लागू होती है, तो इससे देश के संसाधनों की बड़ी बचत होगी। साथ ही प्रशासनिक कामकाज में भी तेजी आएगी।

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