Prashant Kishor बोले-10 साल से नाकाम Rahul Gandhi को ब्रेक लेना चाहिए

Jitendra Shrivastava | Apr 07, 2024, 20:45 IST
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Rahul Gandhi को ब्रेक लेना चाहिए।

राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कहा कि कांग्रेस नेताओं का एक वर्ग हालांकि, निजी तौर पर यह भी कहता है कि स्थिति वास्तव में विपरीत है और राहुल गांधी वह फैसला नहीं लेते, जो वे चाहते हैं कि राहुल गांधी लें। आइए बताते हैं PK ने और क्या कहा...

NEW DELHI. जाने-माने राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) ने सुझाव दिया है कि यदि कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते हैं तो राहुल गांधी ( Rahul Gandhi ) को ब्रेक लेने पर विचार करना चाहिए। किशोर ने बातचीत में कहा कि गांधी सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए अपनी पार्टी चला रहे हैं और पिछले 10 वर्ष में अपेक्षित परिणाम नहीं देने के बावजूद वह न तो रास्ते से हट रहे हैं और न ही किसी और को आगे आने दे रहे हैं।

पांच साल यह जिम्मेदारी किसी और को सौंप दें


PK ने कहा कि मेरे अनुसार यह भी अलोकतांत्रिक है। उन्होंने विपक्षी पार्टी को फिर से मजबूत करने के लिए एक योजना तैयार की थी लेकिन उनकी रणनीति के क्रियान्वयन पर उनके और कांग्रेस नेतृत्व के बीच मतभेदों के चलते वह अलग हो गए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी के राजनीति से दूर रहने और 1991 में पीवी नरसिंह राव के कार्यभार संभालने को याद करते हुए उन्होंने कहा कि जब आप एक ही काम पिछले 10 वर्ष से कर रहे हैं और सफलता नहीं मिल रही है तो एक ब्रेक लेने में कोई बुराई नहीं है, तो आपको चाहिए कि पांच साल तक यह जिम्मेदारी किसी और को सौंप दें। आपकी मां ने ऐसा किया है। उन्होंने कहा कि दुनियाभर में अच्छे नेताओं की एक प्रमुख विशेषता यह होती है कि वे जानते हैं कि उनमें क्या कमी है और वे सक्रिय रूप से उन कमियों को दूर करने के लिए तत्पर रहते हैं।

राहुल गांधी को लगता है कि वे सब जानते हैं


प्रशांत किशोर ने कहा कि राहुल गांधी को ऐसा लगता है कि वह सब कुछ जानते हैं। यदि ऐसा लगता है कि आपको मदद की आवश्यकता नहीं है तो कोई भी आपकी मदद नहीं कर सकता। उन्हें लगता है कि वह सही हैं और वह मानते हैं कि उन्हें ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जो उनकी सोच को मूर्त रूप दे सके। यह संभव नहीं है। 2019 के चुनाव में पार्टी की हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने संबंधी राहुल गांधी के फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वायनाड निर्वाचन क्षेत्र के सांसद ने तब लिखा था कि वह पीछे हट जाएंगे और किसी और को दायित्व सौंपेंगे, लेकिन वास्तव में उन्होंने जो लिखा था उसके विपरीत काम कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस के कई नेता निजी तौर पर स्वीकार करेंगे कि वे पार्टी में कोई भी निर्णय नहीं ले सकते। यहां तक कि गठबंधन सहयोगियों के साथ एक भी सीट या सीट साझा करने के बारे में भी। वे तब तक कोई फैसला नहीं ले सकते, जब तक उन्हें ‘एक्सवाईजेड' से मंजूरी नहीं मिल जाती। किशोर ने कहा कि कांग्रेस नेताओं का एक वर्ग हालांकि, निजी तौर पर यह भी कहता है कि स्थिति वास्तव में विपरीत है और राहुल गांधी वह फैसला नहीं लेते, जो वे चाहते हैं कि राहुल गांधी लें। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और उसके समर्थक किसी भी व्यक्ति से बड़े हैं और गांधी को इस बात को लेकर अड़े नहीं रहना चाहिए कि बार-बार अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने के बावजूद वही पार्टी के लिए उपयोगी साबित होंगे।

कांग्रेस के कामकाज में संरचनात्‍मक खामियां: प्रशांत किशोर


प्रशांत किशोर ने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष के इस दावे पर सवाल उठाया कि उनकी पार्टी को चुनाव में असफलताओं का सामना इसलिए करना पड़ रहा है क्योंकि निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका और मीडिया जैसी संस्थाओं को सरकार अपने प्रभाव में ले रही है। उन्होंने कहा कि यह आंशिक रूप से सच हो सकता है लेकिन पूरा सच नहीं है। प्रशांत ने कहा कि 2014 के चुनाव में कांग्रेस की सीटों की संख्या 206 से घटकर 44 हो गई थी और उस वक्त वह सत्ता में थी और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का विभिन्न संस्थानों पर बहुत कम प्रभाव था। किशोर ने इस बात पर जोर दिया कि मुख्य विपक्षी दल के कामकाज में ‘संरचनात्मक' खामियां है और उसे अपनी सफलता के लिए इन खामियों को दूर करना जरूरी है। पार्टी के पतन की कगार पर होने संबंधी दावों के बारे में पूछे जाने पर किशोर ने ऐसे दावों का खंडन करते हुए कहा कि ऐसा कहने वाले लोग देश की राजनीति को नहीं समझते हैं और इस तरह के दावों में दम नहीं है।

कांग्रेस के वजूद को कभी खत्‍म नहीं कर सकते


किशोर ने कहा कि कांग्रेस को केवल एक पार्टी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। देश में इसके वजूद को कभी खत्म नहीं किया जा सकता। यह संभव नहीं है। कांग्रेस ने अपने इतिहास में कई बार खुद को उभारा है। उन्होंने कहा कि आखिरी बार ऐसा तब हुआ था जब सोनिया गांधी ने दायित्व संभाला था और इसके बाद 2004 के चुनावों में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की थी। यह पूछे जाने पर कि पार्टी द्वारा अपनी पुनरुद्धार योजना में उन्हें शामिल करने के बाद क्या गलत हुआ, उन्होंने कहा कि कांग्रेस उनकी योजनाओं को लागू करने के लिए एक अधिकार प्राप्त कार्य समूह चाहती थी, जो उसकी संवैधानिक संस्था नहीं है और वह इस प्रस्ताव से सहमत नहीं थे।
किशोर ने आम आदमी पार्टी द्वारा कांग्रेस की जगह लेने और उसके दिल्ली मॉडल को अन्य राज्यों में दोहराने की संभावना से इनकार किया। प्रशांत किशोर ने कहा कि ऐसी कोई संभावना नहीं है। इसकी जो कमजोरी मुझे दिखती है वह यह है कि इसकी कोई वैचारिक या संस्थागत जड़ें नहीं हैं।

प्रशांत किशोर बोले- 'उपनाम' का पहले फायदा था अब बोझ है


कांग्रेस और कई क्षेत्रीय दलों के खिलाफ बीजेपी के ‘परिवारवाद' के आरोप के बारे में एक सवाल के जवाब में उन्होंने स्वीकार किया कि यह मुद्दा लोगों के बीच बना हुआ है। उन्होंने कहा कि किसी के उपनाम के कारण नेता बनना आजादी के बाद के युग में एक फायदा हो सकता था, लेकिन अब यह एक बोझ है। उन्होंने पूछा, ‘चाहे वह राहुल गांधी हों, अखिलेश यादव हों या तेजस्वी यादव हों। हो सकता है कि उनकी संबंधित पार्टियों ने उन्हें अपना नेता स्वीकार कर लिया हो, लेकिन लोगों ने नहीं। क्या अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी को जीत दिलाने में सक्षम हैं? हालांकि, उन्होंने कहा कि बीजेपी को इस मुद्दे से नहीं जूझना पड़ा क्योंकि उसने हाल ही में सत्ता हासिल की है और उसके नेताओं के परिवार के सदस्यों को पद देने का दबाव अब आएगा। किशोर ने 2014 से बीजेपी, कांग्रेस और विभिन्न विचारधारा वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों सहित कई प्रमुख दलों के लिए काम किया है, लेकिन एक नई राजनीति की शुरुआत करने के घोषित लक्ष्य के साथ अक्टूबर 2022 से उन्होंने अपने गृह राज्य बिहार में अपनी जन सुराज यात्रा पर ध्यान केंद्रित किया है।

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