2 से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोकना गलत: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पुराने कानून पर दोबारा विचार जरूरी
Amresh Kushwaha | Nov 04, 2026, 20:35 IST
दो से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने दो से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानून पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट का कहना है कि देश में बच्चों के जन्म की दर लगातार घट रही है। ऐसे में दो बच्चों की शर्त वाले पुराने कानूनों पर दोबारा विचार करने की जरूरत है।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि भारत में कुल प्रजनन दर 2003 में तीन थी, जो अब घटकर 1.9 रह गई है। जबकि आबादी को एक स्तर पर बनाए रखने के लिए यह दर 2.1 होनी चाहिए।
कोर्ट ने महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव के मामले की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। उन्हें तीसरा बच्चा होने के कारण चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानून लोगों को राजनीतिक अधिकारों से दूर करते हैं। किसी व्यक्ति के कितने बच्चे हैं, इसका उसकी सार्वजनिक पद संभालने की क्षमता से कोई सीधा संबंध नहीं है।
कोर्ट के मुताबिक, ऐसे नियम लोगों के सामने दो विकल्प रखते हैं। या तो वे अपनी इच्छा से बच्चे पैदा करें या फिर चुनाव लड़ने का अधिकार चुनें। बेंच ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले प्रजनन संबंधी फैसले लेने की आजादी से जुड़ा मुद्दा माना।
कोर्ट ने कहा कि भारत की Fertility Rate यानी प्रजनन दर लगातार कम हो रही है। 2003 में एक महिला के औसतन 3 बच्चे होते थे। अब यह आंकड़ा घटकर 1.9 रह गया है। आबादी को लंबे समय तक स्थिर रखने के लिए 2.1 की प्रजनन दर को जरूरी माना जाता है। इसे Replacement Rate कहते हैं।
इससे कम दर होने पर आने वाली पीढ़ियों की संख्या घट सकती है। इससे भविष्य में बुजुर्गों की आबादी बढ़ने और काम करने वाले लोगों की संख्या कम होने की आशंका है। कोर्ट ने कहा कि इन बदलावों को नजरअंदाज करने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
महाराष्ट्र की काकोड़ा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव के तीन बच्चे हैं। महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत दो से ज्यादा बच्चे होने पर पंचायत चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं है। इसी नियम के आधार पर मंगला भीमराव के खिलाफ शिकायत हुई थी। अतिरिक्त कलेक्टर ने उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया था।
उन्होंने अतिरिक्त आयुक्त के पास अपील की, लेकिन वहां भी राहत नहीं मिली। इसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने 5 अगस्त 2025 को उनकी अयोग्यता बरकरार रखी। मंगला ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने 4 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी।
अब इस मामले में दो बच्चों की शर्त से जुड़े पुराने फैसले की समीक्षा का सवाल बड़ी बेंच के सामने जाएगा।
सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने रखी गई जानकारी के मुताबिक, पांच राज्यों में स्थानीय निकाय चुनावों के लिए दो बच्चों की शर्त लागू है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश वकील रुक्मिणी बोबडे को अदालत की मदद के लिए एमिकस क्यूरी नियुक्त किया गया था। कोर्ट ने उनसे और याचिकाकर्ता के वकील प्रतीक बोरंबडे से उन राज्यों की जानकारी मांगी थी, जहां दो से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने पर रोक है।
अदालत को दी गई सूची के मुताबिक, 7 राज्यों ने दो बच्चों की शर्त खत्म कर दी है। वहीं, 15 राज्यों में ऐसी कोई नीति नहीं है।
साल 2003 में जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने दो बच्चों की शर्त को सही ठहराया था। यह मामला हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 से जुड़ा था। इसके तहत दो से ज्यादा जीवित बच्चे होने पर स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से रोक थी।
मौजूदा बेंच ने 4 अगस्त को इस मामले में फैसला सुरक्षित रखा था। अब 2003 के फैसले पर दोबारा विचार के लिए मामला बड़ी बेंच को भेजा गया है।
विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में प्रति 1,000 लोगों पर जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या लगातार कम हुई है।
स्रोत: दिए गए विश्व बैंक के आंकड़े
इन आंकड़ों के अनुसार, 2013 में हर 1000 लोगों पर करीब 20 बच्चों का जन्म होता था। 2024 में यह संख्या घटकर 16 रह गई।
सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच अब दो बच्चों की शर्त को सही ठहराने वाले 2003 के फैसले पर दोबारा विचार करेगी। इसमें यह देखा जाएगा कि बदलती आबादी और प्रजनन दर को देखते हुए ऐसे कानूनों को जारी रखना कितना उचित है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों में दो बच्चों की शर्त खत्म करने का कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। बड़ी बेंच के निर्णय के बाद इस मामले की कानूनी स्थिति और स्पष्ट होगी।
कोर्ट ने महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव के मामले की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। उन्हें तीसरा बच्चा होने के कारण चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया है।
कोर्ट बोला- बच्चे पैदा करने और चुनाव लड़ने में से एक को चुनना गलत
कोर्ट के मुताबिक, ऐसे नियम लोगों के सामने दो विकल्प रखते हैं। या तो वे अपनी इच्छा से बच्चे पैदा करें या फिर चुनाव लड़ने का अधिकार चुनें। बेंच ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले प्रजनन संबंधी फैसले लेने की आजादी से जुड़ा मुद्दा माना।
देश में लगातार घट रही बच्चों के जन्म की दर
इससे कम दर होने पर आने वाली पीढ़ियों की संख्या घट सकती है। इससे भविष्य में बुजुर्गों की आबादी बढ़ने और काम करने वाले लोगों की संख्या कम होने की आशंका है। कोर्ट ने कहा कि इन बदलावों को नजरअंदाज करने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच का क्या है मामला?
उन्होंने अतिरिक्त आयुक्त के पास अपील की, लेकिन वहां भी राहत नहीं मिली। इसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने 5 अगस्त 2025 को उनकी अयोग्यता बरकरार रखी। मंगला ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने 4 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी।
अब इस मामले में दो बच्चों की शर्त से जुड़े पुराने फैसले की समीक्षा का सवाल बड़ी बेंच के सामने जाएगा।
किन राज्यों में दो से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने पर रोक है?
- महाराष्ट्र: दो से ज्यादा बच्चे होने पर पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकते। चुने हुए सदस्य की सदस्यता भी जा सकती है।
- गुजरात: 2005 में कानून बदलकर पंचायत, नगरपालिका और नगर निगम चुनावों में दो बच्चों की शर्त लागू की गई।
- ओडिशा: जिला परिषद चुनाव के लिए दो से ज्यादा बच्चे होने पर अयोग्य ठहराने का नियम है।
- गोवा: पंचायत चुनाव लड़ने के लिए दो बच्चों की शर्त लागू है।
- उत्तराखंड: 25 जुलाई 2019 के बाद तीसरा या उससे ज्यादा बच्चा होने पर पंचायत चुनाव लड़ने से रोक का प्रावधान है।
7 राज्यों ने खत्म की दो बच्चों की शर्त
अदालत को दी गई सूची के मुताबिक, 7 राज्यों ने दो बच्चों की शर्त खत्म कर दी है। वहीं, 15 राज्यों में ऐसी कोई नीति नहीं है।
2003 में सुप्रीम कोर्ट ने नियम को सही माना था
मौजूदा बेंच ने 4 अगस्त को इस मामले में फैसला सुरक्षित रखा था। अब 2003 के फैसले पर दोबारा विचार के लिए मामला बड़ी बेंच को भेजा गया है।
भारत में 10 साल में जन्मदर करीब 25% घटी
| साल | प्रति 1,000 आबादी पर जन्म |
|---|---|
| 2013 | 20.1 |
| 2014 | 19.1 |
| 2015 | 18.9 |
| 2016 | 18.8 |
| 2017 | 18.0 |
| 2018 | 17.9 |
| 2019 | 17.4 |
| 2020 | 16.7 |
| 2021 | 16.5 |
| 2022 | 16.3 |
| 2023 | 16.1 |
| 2024 | 16.0 |
इन आंकड़ों के अनुसार, 2013 में हर 1000 लोगों पर करीब 20 बच्चों का जन्म होता था। 2024 में यह संख्या घटकर 16 रह गई।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों में दो बच्चों की शर्त खत्म करने का कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। बड़ी बेंच के निर्णय के बाद इस मामले की कानूनी स्थिति और स्पष्ट होगी।
FAQs
- सुप्रीम कोर्ट ने दो से ज्यादा बच्चों के मामले में क्या कहा है?
सुप्रीम कोर्ट ने दो से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानून पर दोबारा विचार करने की जरूरत बताई है, यह कहते हुए कि यह लोगों को उनके राजनीतिक अधिकारों से दूर करता है। - मंगला भीमराव का केस क्या है और इसकी कानूनी स्थिति क्या है?
मंगला भीमराव, महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच, को तीसरा बच्चा होने के कारण चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उनके मामले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया है। - कौन से राज्यों में दो बच्चों की शर्त लागू है और कब यह समाप्त हुई थी?
पांच राज्यों में दो बच्चों की शर्त लागू है, जिनमें महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा, गोवा और उत्तराखंड शामिल हैं। सात राज्यों ने इस शर्त को खत्म कर दिया है।
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