तमिलनाडु चुनाव में ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं, कांग्रेस, AIADMK, DMK यहां तक कि BJP ने भी किया किनारा
CHAKRESH | Apr 06, 2026, 16:00 IST
Photograph: (THESOOTR)
TAMIL NADU. तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में 35 साल बाद पहली बार AIADMK ने कोई ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं उतारा। BJP, DMK और कांग्रेस ने भी किसी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया। जबकि TVK ने 2 और NTK ने 6 ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं।
तमिलनाडु चुनाव:दक्षिण भारत की राजनीति में ब्राह्मण विरोधी द्रविड़वाद की लंबी परंपरा रही है। इस बार तामिलनाडु के चारों प्रमुख दलों ने एक साथ ब्राह्मणों को दरकिनार कर दिया है।
यह पहली बार हो रहा है जब AIADMK, DMK और कांग्रेस जैसे बड़े दलों ने ब्राह्मण उम्मीदवारों को चुनावी मैदान से बाहर कर दिया है। इतना ही नहीं BJP ने भी यहां ब्राह्मणों से दूरी बना ली है।
35 साल के इतिहास में यह पहला मौका है जब AIADMK के उम्मीदवारों की सूची में कोई ब्राह्मण नाम नहीं है। AIADMK का इतिहास देखें तो पार्टी ने 1980 से लगातार ब्राह्मण उम्मीदवारों को मौका दिया था।
1980 से 1986 के बीच डॉ. एचवी हांडे पार्टी के ब्राह्मण चेहरे थे। 1991 से 2011 तक राम रामनाथन मैदान में उतरते रहे। खुद दिवंगत मुख्यमंत्री जे. जयललिता भी ब्राह्मण थीं और 1991 से 2016 तक चुनाव लड़ती रहीं।
2016 से 2021 तक आर. नटराज AIADMK के ब्राह्मण उम्मीदवार रहे। वहीं वी. मैत्रेयन को 2002, 2007 और 2013 में लोकसभा चुनावों में पार्टी ने टिकट दिया था।
जयललिता के निधन के बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में AIADMK ने मैलापोर से सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक (DGP- Director General of Police) नटराज आर को उम्मीदवार बनाया था। लेकिन इस बार 2026 के चुनाव में पार्टी ने किसी भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया।
BJP की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। पार्टी को 27 सीटें आवंटित हुई हैं। इन 27 सीटों में से एक पर भी ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं है। यह इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि TAMBRAS ने BJP को अपना समर्थन दिया हुआ है।
BJP के भीतर केटी राघवन और एच राजा के नाम टिकट के लिए चर्चा में थे। कामालयम में इन दोनों के नाम पर विचार किया गया, लेकिन दोनों को टिकट नहीं मिला।
एच राजा टिकट इसलिए नहीं ले सके क्योंकि वे स्वास्थ्य कारणों से चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं थे। DMK और कांग्रेस ने भी इस बार किसी ब्राह्मण को प्रत्याशी नहीं बनाया है। यानी राज्य के चारों बड़े दल इस मामले में एक जैसी स्थिति में हैं।
जहां एक तरफ बड़े दलों ने ब्राह्मण उम्मीदवारों को नजरअंदाज किया, वहीं छोटे दलों ने इस समुदाय को प्रतिनिधित्व दिया। अभिनेता-नेता विजय की पार्टी TVK (Tamilaga Vettri Kazhagam) ने दो ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया है। तमिल राष्ट्रवादी नेता सीमान की पार्टी NTK (Naam Tamilar Katchi) ने छह ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे हैं।
TVK और NTK ने मैलापोर और श्रीरंगम जैसी सीटों को चुना है, जहां ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या उल्लेखनीय है। इन दलों ने जानबूझकर उन्हीं क्षेत्रों में ब्राह्मण प्रत्याशी उतारे जहां इस वर्ग का प्रभाव माना जाता है।
खुद जयललिता ब्राह्मण थीं। उन्होंने राम रामनाथन को कुंभकोणम से और नटराज को मैलापोर से मौका दिया था। वहीं वी. मैत्रेयन को लोकसभा चुनावों में टिकट मिला था। जयललिता की इस नीति से AIADMK और ब्राह्मण समुदाय के बीच एक खास रिश्ता बना रहा। लेकिन 2026 में वह धागा टूटता दिख रहा है।
तमिलनाडु में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या कुल जनसंख्या के मुकाबले सीमित जरूर है, लेकिन कुछ शहरी और अर्ध-शहरी सीटों पर उनका प्रभाव निर्णायक माना जाता है। बड़े दलों का यह कदम राज्य की जातीय राजनीति में एक नया मोड़ माना जा रहा है।
तमिलनाडु की यह राजनीति, जहां ब्राह्मणों का नाम तक नहीं लिया गया, एक बड़ा सवाल खड़ा करती है- क्या दक्षिण भारत की राजनीति अब ब्राह्मणों के लिए पूरी तरह से बंद हो चुकी है? यह एक ऐसी स्थिति है, जो आने वाले समय में राजनीतिक समीकरणों को नए तरीके से लिखेगी।
यह खबर भारतीय लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व, सामाजिक समावेश और जाति-आधारित राजनीतिक समीकरणों की बारीक परतों को उजागर करती है। जब AIADMK, BJP, DMK और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय दल किसी एक समुदाय को पूरी तरह अनदेखा करते हैं, तो यह सवाल उठता है कि क्या राजनीतिक दल संविधान की धारा 14 और 15 में निहित समानता की भावना के अनुरूप सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व दे रहे हैं। TAMBRAS का समर्थन पाने के बाद भी BJP का एक भी ब्राह्मण उम्मीदवार न उतारना यह दर्शाता है कि समर्थन और प्रतिनिधित्व में अंतर है।
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यह पहली बार हो रहा है जब AIADMK, DMK और कांग्रेस जैसे बड़े दलों ने ब्राह्मण उम्मीदवारों को चुनावी मैदान से बाहर कर दिया है। इतना ही नहीं BJP ने भी यहां ब्राह्मणों से दूरी बना ली है।
35 साल बाद बड़ा बदलाव
1980 से 1986 के बीच डॉ. एचवी हांडे पार्टी के ब्राह्मण चेहरे थे। 1991 से 2011 तक राम रामनाथन मैदान में उतरते रहे। खुद दिवंगत मुख्यमंत्री जे. जयललिता भी ब्राह्मण थीं और 1991 से 2016 तक चुनाव लड़ती रहीं।
2016 से 2021 तक आर. नटराज AIADMK के ब्राह्मण उम्मीदवार रहे। वहीं वी. मैत्रेयन को 2002, 2007 और 2013 में लोकसभा चुनावों में पार्टी ने टिकट दिया था।
2021 के बाद टूटी परंपरा
BJP की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। पार्टी को 27 सीटें आवंटित हुई हैं। इन 27 सीटों में से एक पर भी ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं है। यह इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि TAMBRAS ने BJP को अपना समर्थन दिया हुआ है।
KT राघवन और H राजा को नहीं मिला टिकट
एच राजा टिकट इसलिए नहीं ले सके क्योंकि वे स्वास्थ्य कारणों से चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं थे। DMK और कांग्रेस ने भी इस बार किसी ब्राह्मण को प्रत्याशी नहीं बनाया है। यानी राज्य के चारों बड़े दल इस मामले में एक जैसी स्थिति में हैं।
TVK और NTK ने दिया मौका
TVK और NTK ने मैलापोर और श्रीरंगम जैसी सीटों को चुना है, जहां ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या उल्लेखनीय है। इन दलों ने जानबूझकर उन्हीं क्षेत्रों में ब्राह्मण प्रत्याशी उतारे जहां इस वर्ग का प्रभाव माना जाता है।
जयललिता की विरासत और ब्राह्मण राजनीति
तमिलनाडु में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या कुल जनसंख्या के मुकाबले सीमित जरूर है, लेकिन कुछ शहरी और अर्ध-शहरी सीटों पर उनका प्रभाव निर्णायक माना जाता है। बड़े दलों का यह कदम राज्य की जातीय राजनीति में एक नया मोड़ माना जा रहा है।
क्या यह चुनाव ब्राह्मणों के लिए एक संकेत है?
यह बदलाव न सिर्फ तामिलनाडु, बल्कि पूरे दक्षिण भारत की राजनीति में एक नया मोड़ ला सकता है, जहां ब्राह्मण विरोधी द्रविड़ राजनीति अब तक के सबसे मजबूत रूप में सामने आई है।
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