यूएसए और ईरान के रिश्ते: जानें 73 सालों का एक टकरावपूर्ण इतिहास

संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के रिश्ते 1953 से 2026 तक उतार-चढ़ाव से भरे रहे हैं। शीत युद्ध, परमाणु कार्यक्रम, संघर्ष और कूटनीतिक प्रयास इन रिश्तों के प्रमुख पहलू रहे हैं।

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Jitendra Shrivastava
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Photograph: (thesootr)

News In Short

  • 1953 में सीआईए की मदद से ईरान में तख्तापलट हुआ।
  • 1979 में ईरानी क्रांति के बाद अमेरिका और ईरान शत्रु बन गए।
  • 1980-88 में ईरान-इराक युद्ध में अमेरिका ने इराक का समर्थन किया।
  • 2015 में अमेरिका और ईरान ने परमाणु समझौता किया।
  • 2020 में ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अधिकतम दबाव की नीति अपनाई।

News In Detail

संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और ईरान (Iran) के बीच रिश्ते हमेशा ही जटिल रहे हैं। यह दोनों देशों के रिश्ते कभी सहयोगी रहे तो कभी शत्रुता का रूप लेते गए। विशेष रूप से 1953 से 2026 तक दोनों देशों के बीच रिश्तों में आए उतार-चढ़ाव ने एक ऐतिहासिक संदर्भ में दोनों देशों की राजनीति और कूटनीतिक घटनाओं को आकार दिया। 1953 से शुरू होकर 2026 तक, इन रिश्तों में कई संघर्ष, युद्ध, कूटनीतिक प्रयास, और परमाणु कार्यक्रमों का मुद्दा शामिल रहा।

1953: सीआईए द्वारा तख्तापलट और अमेरिका का सहयोग

1953 में, अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर ईरान में प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक के खिलाफ तख्तापलट किया। मोसद्देक का उद्देश्य ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण करना था, जो ब्रिटिश कंपनियों के नियंत्रण में था। इससे ब्रिटेन ने ईरान पर तेल प्रतिबंध लगा दिया था। इसके परिणामस्वरूप, अमेरिका और ब्रिटेन की खुफिया एजेंसियों ने मिलकर शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी की सत्ता को फिर से बहाल किया, जिन्होंने अमेरिकी समर्थन पर निर्भर होकर शासन किया।

यह घटना अमेरिका और ईरान के रिश्तों की पहली बड़ी घटना थी, जहां अमेरिका ने अपने भू-राजनीतिक हितों के लिए ईरान की राजनीति में हस्तक्षेप किया। यह तख्तापलट और उसकी नीतियां ईरान की जनता में शाह के प्रति असंतोष और विरोध को बढ़ावा देने वाली साबित हुईं।

1954: तेल समझौते पर हस्ताक्षर

1954 में, शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी ने अमेरिका और ब्रिटेन के दबाव में एक तेल समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत पश्चिमी देशों की कंपनियों को ईरान के तेल उद्योग में 40% हिस्सेदारी दी गई। यह समझौता अमेरिकी कंपनियों को ईरान में बड़े पैमाने पर तेल उत्पादन के लिए जिम्मेदार ठहराता था।

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1957: परमाणु सहयोग की शुरुआत

1957 में अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के लिए सहयोग समझौता हुआ। इस समझौते के तहत, ईरान ने परमाणु ऊर्जा के विकास के लिए अमेरिका से तकनीकी मदद ली। इस सहयोग ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम की नींव रखी, जो बाद में विवादों का कारण बना।

1979: ईरानी क्रांति और शत्रुता का आरंभ

1979 में ईरान में हुए इस्लामी क्रांति ने अमेरिका और ईरान के रिश्तों को पूरी तरह से बदल दिया। शाही शासन का अंत हुआ और आयतुल्लाह खोमैनी की अगुवाई में ईरान एक इस्लामी गणराज्य बन गया। इस क्रांति के बाद, शाह मोहम्मद रजा पहलवी को अमेरिका ने शरण दी थी, जिसका विरोध करते हुए उग्रवादी छात्रों ने अमेरिकी दूतावास को घेरकर 53 अमेरिकी नागरिकों को बंधक बना लिया। यह घटना अमेरिका और ईरान के बीच शत्रुता की शुरुआत थी।

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1980-1988: ईरान-इराक युद्ध और अमेरिकी हस्तक्षेप

ईरान-इराक युद्ध (1980-1988) में अमेरिका ने इराक का समर्थन किया, जबकि ईरान ने शिया मिलिशिया को बढ़ावा दिया। इस युद्ध में इराक ने रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया, जिसके बारे में अमेरिका को जानकारी थी। अमेरिका ने ईरान को आतंकवाद प्रायोजित करने वाला देश घोषित किया और प्रतिबंधों को बढ़ा दिया।

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1985: ईरान-कॉन्ट्रा प्रकरण

1985 में अमेरिका के रोनाल्ड रीगन प्रशासन ने गुप्त रूप से ईरान को हथियार बेचना शुरू किया, ताकि लेबनान में हिज़्बुल्लाह द्वारा बंधक बनाए गए अमेरिकी नागरिकों की रिहाई सुनिश्चित हो सके। यह कदम ईरान-कॉन्ट्रा कांड के रूप में प्रसिद्ध हुआ, जिसमें अमेरिकी अधिकारियों ने कड़ी आलोचना का सामना किया।

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1990-2000: प्रतिबंध और कूटनीतिक बदलाव

1990 के दशक में अमेरिका ने ईरान पर लगातार आर्थिक प्रतिबंध लगाए, और 1995 में पूरा तेल और व्यापार प्रतिबंध लगा दिया। 1998 में अमेरिकी विदेश मंत्री मैडलिन ऑलब्राइट ने ईरान के साथ उच्च-स्तरीय संपर्क किया और अमेरिका ने ईरान की ओर अपनी नीति को खेदजनक बताया।

2001-2003: अफगानिस्तान में सहयोग फिर विरोध

2001 में, अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमले के दौरान ईरान से सहयोग किया, क्योंकि दोनों देशों का साझा दुश्मन तालिबान था। लेकिन 2002 में राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने ईरान को “बुराई की धुरी” (Axis of Evil) का हिस्सा बताते हुए इसे परमाणु हथियारों के प्रसार और आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।

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2006-2015: परमाणु समझौते और असहमति

2006 में ईरान के राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने अमेरिकी राष्ट्रपति बुश को पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने युद्ध और तनाव को समाप्त करने की कोशिश की। 2013 में, ओबामा प्रशासन और ईरान के बीच एक ऐतिहासिक परमाणु समझौता हुआ, जिसे संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) कहा गया। इसके तहत, ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित किया, और बदले में उसे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों से राहत मिली।

2018-2026: ट्रंप की नीतियां और टकराव

2018 में, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने JCPOA से बाहर निकलने की घोषणा की और अधिकतम दबाव की नीति अपनाई। इसके बाद से अमेरिका और ईरान के रिश्ते और भी तनावपूर्ण हो गए। 2020 में अमेरिका ने कासिम सुलेमानी की हत्या कर दी और 2021 में नए परमाणु वार्ताएं शुरू हुई, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकला।

2025-2026: सैन्य तनाव और संघर्ष

2025 में, अमेरिका और ईरान के बीच फिर से परमाणु वार्ता की शुरुआत हुई, लेकिन 2026 तक अमेरिकी और इज़राइली सैन्य अभियान ने तनाव को और बढ़ा दिया।

निष्कर्ष

अमेरिका और ईरान के रिश्ते एक जटिल और संघर्षपूर्ण इतिहास को दर्शाते हैं, जो विभिन्न कूटनीतिक, सैन्य और परमाणु मुद्दों से प्रभावित रहा है। दोनों देशों के बीच जारी संघर्ष और कूटनीतिक प्रयासों से यह साफ है कि इन रिश्तों को सुधारने के लिए और अधिक समय और संघर्ष की आवश्यकता होगी।

FAQ

1953 में अमेरिका और ईरान के रिश्तों में तख्तापलट क्यों हुआ?
1953 में, सीआईए और ब्रिटेन ने मिलकर ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक को अपदस्थ किया। इसका कारण ईरान का तेल राष्ट्रीयकरण था, जो ब्रिटिश कंपनियों के नियंत्रण में था।
1979 में ईरानी क्रांति के बाद अमेरिका और ईरान के रिश्ते कैसे बदल गए?
1979 में ईरानी क्रांति के बाद शाह मोहम्मद रजा पहलवी को अपदस्थ कर दिया गया, और ईरान एक इस्लामी गणराज्य बना। इससे अमेरिका और ईरान के रिश्ते शत्रुतापूर्ण हो गए।
1980-1988 के ईरान-इराक युद्ध में अमेरिका की भूमिका क्या थी?
इस युद्ध के दौरान, अमेरिका ने इराक का समर्थन किया, जबकि ईरान ने शिया मिलिशिया को बढ़ावा दिया। इस युद्ध ने दोनों देशों के रिश्तों को और तनावपूर्ण बना दिया।
2015 में अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौता क्यों हुआ?
2015 में अमेरिका और ईरान के बीच एक ऐतिहासिक परमाणु समझौता हुआ, जिसमें ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित किया, बदले में उसे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों से राहत मिली।

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