Diwali 2026: दिवाली पर विष्णु जी नहीं, क्यों लक्ष्मी जी के साथ पूजे जाते हैं गणेश जी? जानें इसके पीछे का पौराणिक रहस्य
Kaushiki | Oct 31, 2026, 14:05 IST
लक्ष्मी गणेश पूजा और पौराणिक रहस्य
Diwali 2026: दिवाली का त्योहार खुशियां लेकर आता है। हर तरफ दीयों की जगमगाहट होती है। लोग सुख और समृद्धि की कामना करते हैं। इस रात माता लक्ष्मी की पूजा होती है। उनके साथ गणेश जी भी विराजमान रहते हैं।ऐस में लोगों के मन में ये सवाल उठता है कि सामान्य नियम के मुताबिक लक्ष्मी जी के साथ विष्णु जी होने चाहिए।
लेकिन दिवाली की रात ऐसा नहीं दिखता है। विष्णु जी की जगह गणेश जी पूजे जाते हैं। इसके पीछे एक गहरा पौराणिक रहस्य छुपा है। कई धर्म ग्रंथों में इसका वर्णन मिलता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। आइए इस पौराणिक रहस्य के बारे में जानें...
शास्त्रों में चातुर्मास का समय बहुत खास होता है। इस दौरान भगवान विष्णु क्षीर सागर में सोते हैं। वे आषाढ़ शुक्ल की एकादशी से सो जाते हैं। वे देवउठनी एकादशी को ही जागते हैं। दिवाली का पर्व कार्तिक अमावस्या को पड़ता है।
इस समय श्री हरि निद्रा में ही रहते हैं। इसलिए वे पूजा में सीधे शामिल नहीं होते। माता लक्ष्मी अकेली विचरण नहीं करती हैं। वे अपने साथ विघ्नहर्ता गणेश जी को लाती हैं। गणेश जी उनके दत्तक पुत्र माने जाते हैं। पुत्र के बिना माता की पूजा अधूरी है।
धन के साथ बुद्धि का होना बहुत जरूरी है। बिना बुद्धि के धन का दुरुपयोग होता है। गणेश जी बुद्धि के दाता माने जाते हैं। लक्ष्मी जी धन और वैभव प्रदान करती हैं। दोनों की पूजा साथ करने से संतुलन बनता है। व्यक्ति को धन और सद्बुद्धि दोनों मिलती है। यही कारण है कि दिवाली पर दोनों पूजे जाते हैं।
शास्त्रों में चातुर्मास का बड़ा महत्व बताया गया है। भगवान विष्णु चार महीने के लिए विश्राम करते हैं। इस समय सृष्टि का संचालन शिव जी संभालते हैं। आषाढ़ महीने से कार्तिक महीने तक यह काल चलता है।
इस दौरान कोई भी मांगलिक कार्य नहीं होता है। विवाह और मुंडन जैसे कार्य रोक दिए जाते हैं। दिवाली का त्योहार इसी शयन काल में आता है। कार्तिक अमावस्या के दिन विष्णु जी सो रहे होते हैं। इसलिए वे वैकुंठ में योग निद्रा में लीन हैं।
श्री हरि की अनुपस्थिति में लक्ष्मी जी की पूजा होती है। माता लक्ष्मी के साथ उनके मानस पुत्र आते हैं। गणेश जी को प्रथम पूज्य का दर्जा प्राप्त है। किसी भी पूजा में गणेश जी पहले पूजे जाते हैं। उनके बिना कोई भी अनुष्ठान पूरा नहीं होता। इसलिए लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी विराजते हैं।
शिव पुराण और पद्म पुराण में एक कथा आती है। माता लक्ष्मी को अपने धन पर अभिमान हो गया था। वे स्वयं को सर्वगुण संपन्न मानती थीं। भगवान विष्णु ने उनके इस अहंकार को पहचाना। श्री हरि ने मुस्कुराते हुए एक बात कही। उन्होंने कहा कि स्त्री तब तक पूर्ण नहीं होती।
जब तक वह मां न बन जाए। लक्ष्मी जी की कोई संतान नहीं थी। यह सुनकर माता लक्ष्मी बहुत दुखी हो गईं। वे अपनी व्यथा लेकर माता पार्वती के पास गईं। पार्वती जी के दो पुत्र थे। लक्ष्मी जी ने उनसे एक पुत्र मांगा।
उन्होंने गणेश जी को गोद लेने की इच्छा जताई। पार्वती जी पहले थोड़ा संकोच में पड़ गईं। वे जानती थीं कि लक्ष्मी जी एक जगह नहीं रहतीं। लक्ष्मी जी ने उन्हें पूर्ण विश्वास दिलाया। उन्होंने कहा कि वे गणेश जी का ध्यान रखेंगी। वे गणेश जी को अपने प्राणों से प्यारा मानेंगी।
पार्वती जी ने गणेश जी को लक्ष्मी जी को सौंप दिया। लक्ष्मी जी बहुत प्रसन्न और आनंदित हुईं। उन्होंने गणेश जी को अपना दत्तक पुत्र बनाया। लक्ष्मी जी ने गणेश जी को एक वरदान दिया। उन्होंने कहा कि जहाँ मेरी पूजा होगी। वहां गणेश जी की पूजा पहले की जाएगी।
जो मेरी पूजा करेगा लेकिन गणेश को नहीं पूजेगा। मैं उसके पास कभी नहीं ठहरूँगी। मेरा वास वहाँ बिल्कुल नहीं होगा। इसी वरदान के कारण दोनों साथ पूजे जाते हैं। मां और पुत्र की पूजा साथ में होती है। दिवाली की रात यह दृश्य अत्यंत पावन लगता है।
लक्ष्मी जी धन की देवी मानी जाती हैं। गणेश जी बुद्धि और ज्ञान के देवता हैं। केवल धन मिलने से जीवन सफल नहीं होता। यदि बुद्धि न हो तो धन नष्ट हो जाता है। कुबुद्धि व्यक्ति धन का गलत उपयोग करता है। वह समाज में अपना नुकसान कर बैठता है।
सद्बुद्धि से धन का सही उपयोग संभव है। धन का उपयोग धर्म और भलाई में होता है। इसलिए धन के साथ बुद्धि अति आवश्यक है। गणेश जी विघ्नहर्ता भी कहलाते हैं। वे जीवन की सभी बाधाओं को दूर करते हैं। लक्ष्मी जी समृद्धि और खुशहाली लाती हैं।
जब दोनों एक साथ घर में आते हैं। तब घर में सुख शांति का वास होता है। समृद्धि लंबे समय तक बनी रहती है। व्यापारी वर्ग इस दिन नए बहीखाते पूजते हैं। वे शुभ और लाभ की कामना करते हैं। गणेश जी शुभ और लाभ के पिता हैं। ऋद्धि और सिद्धि उनकी दो पत्नियां हैं। लक्ष्मी पूजा से संपूर्ण परिवार का कल्याण होता है। यह समन्वय जीवन को सुंदर बनाता है।
दिवाली के दिन पूजा का स्थान साफ रखें। उत्तर या ईशान कोण में चौकी लगाएं। चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। माता लक्ष्मी को गणेश जी के बायीं ओर रखें। गणेश जी को हमेशा दायीं तरफ स्थापित करें। यह स्थान मां और पुत्र का होता है।
कलश की स्थापना भी अत्यंत शुभ मानी जाती है। कलश में जल, दुर्वा और सिक्के डालें। इसके ऊपर नारियल और आम के पत्ते रखें। सर्वप्रथम गणेश जी का ध्यान और पूजन करें। उन्हें मोदक, दूर्वा और मोली अर्पित करें। इसके बाद माता लक्ष्मी का पूजन आरंभ करें।
माता लक्ष्मी को कमल का फूल बहुत प्रिय है। उन्हें खीर और बताशे का भोग लगाएं। सिंदूर और अक्षत से उनका श्रृंगार करें। दीपक जलाकर आरती और मंत्र जाप करें। घर के हर कोने में दीये जलाएं। इससे दरिद्रता और नकारात्मक ऊर्जा दूर भागती है। श्रद्धा भाव से पूजा करने पर फल मिलता है। मन में दया और शुद्धता रखनी चाहिए। लक्ष्मी जी सच्चे भक्त पर कृपा बरसाती हैं।
यह परंपरा हमें एक गहरा संदेश देती है। परिवार में रिश्तों का सम्मान होना चाहिए। मां और बच्चों का स्नेह अनमोल होता है। केवल धन कमाने के पीछे भागना सही नहीं। ज्ञान और विवेक अर्जित करना भी जरूरी है। अहंकार व्यक्ति का पतन करा देता है।
लक्ष्मी जी का अहंकार श्री हरि ने तोड़ा था। उन्होंने मातृत्व के महत्व को रेखांकित किया। धन से बड़ा स्थान रिश्तों का होता है। दिवाली केवल दीये जलाने का पर्व नहीं। यह अपने विचारों को रोशन करने का समय है। अज्ञान के अंधकार को मिटाना ही उद्देश्य है।
गणेश जी का बड़ा सिर ज्ञान का प्रतीक है। उनके बड़े कान अच्छी बातें सुनने के लिए हैं। उनकी छोटी आंखें सूक्ष्म नजर दर्शाती हैं। लक्ष्मी जी की चंचलता को संयम से बांधें। गणेश जी की बुद्धि से धन को सहेजें। तभी समाज और घर में खुशहाली आएगी। इस तरह दिवाली की रात खास बन जाती है। हर घर में दीप जलाकर खुशी मनाई जाती है। यह त्योहार एकता और प्रेम सिखाता है।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
FAQs:
चातुर्मास का समय है खास
इस समय श्री हरि निद्रा में ही रहते हैं। इसलिए वे पूजा में सीधे शामिल नहीं होते। माता लक्ष्मी अकेली विचरण नहीं करती हैं। वे अपने साथ विघ्नहर्ता गणेश जी को लाती हैं। गणेश जी उनके दत्तक पुत्र माने जाते हैं। पुत्र के बिना माता की पूजा अधूरी है।
धन के साथ बुद्धि का होना बहुत जरूरी है। बिना बुद्धि के धन का दुरुपयोग होता है। गणेश जी बुद्धि के दाता माने जाते हैं। लक्ष्मी जी धन और वैभव प्रदान करती हैं। दोनों की पूजा साथ करने से संतुलन बनता है। व्यक्ति को धन और सद्बुद्धि दोनों मिलती है। यही कारण है कि दिवाली पर दोनों पूजे जाते हैं।
भगवान विष्णु की योग निद्रा का समय
इस दौरान कोई भी मांगलिक कार्य नहीं होता है। विवाह और मुंडन जैसे कार्य रोक दिए जाते हैं। दिवाली का त्योहार इसी शयन काल में आता है। कार्तिक अमावस्या के दिन विष्णु जी सो रहे होते हैं। इसलिए वे वैकुंठ में योग निद्रा में लीन हैं।
श्री हरि की अनुपस्थिति में लक्ष्मी जी की पूजा होती है। माता लक्ष्मी के साथ उनके मानस पुत्र आते हैं। गणेश जी को प्रथम पूज्य का दर्जा प्राप्त है। किसी भी पूजा में गणेश जी पहले पूजे जाते हैं। उनके बिना कोई भी अनुष्ठान पूरा नहीं होता। इसलिए लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी विराजते हैं।
गणेश जी के दत्तक पुत्र बनने की कथा
जब तक वह मां न बन जाए। लक्ष्मी जी की कोई संतान नहीं थी। यह सुनकर माता लक्ष्मी बहुत दुखी हो गईं। वे अपनी व्यथा लेकर माता पार्वती के पास गईं। पार्वती जी के दो पुत्र थे। लक्ष्मी जी ने उनसे एक पुत्र मांगा।
उन्होंने गणेश जी को गोद लेने की इच्छा जताई। पार्वती जी पहले थोड़ा संकोच में पड़ गईं। वे जानती थीं कि लक्ष्मी जी एक जगह नहीं रहतीं। लक्ष्मी जी ने उन्हें पूर्ण विश्वास दिलाया। उन्होंने कहा कि वे गणेश जी का ध्यान रखेंगी। वे गणेश जी को अपने प्राणों से प्यारा मानेंगी।
पार्वती जी ने गणेश जी को लक्ष्मी जी को सौंप दिया। लक्ष्मी जी बहुत प्रसन्न और आनंदित हुईं। उन्होंने गणेश जी को अपना दत्तक पुत्र बनाया। लक्ष्मी जी ने गणेश जी को एक वरदान दिया। उन्होंने कहा कि जहाँ मेरी पूजा होगी। वहां गणेश जी की पूजा पहले की जाएगी।
जो मेरी पूजा करेगा लेकिन गणेश को नहीं पूजेगा। मैं उसके पास कभी नहीं ठहरूँगी। मेरा वास वहाँ बिल्कुल नहीं होगा। इसी वरदान के कारण दोनों साथ पूजे जाते हैं। मां और पुत्र की पूजा साथ में होती है। दिवाली की रात यह दृश्य अत्यंत पावन लगता है।
धन और बुद्धि का सुंदर समन्वय
सद्बुद्धि से धन का सही उपयोग संभव है। धन का उपयोग धर्म और भलाई में होता है। इसलिए धन के साथ बुद्धि अति आवश्यक है। गणेश जी विघ्नहर्ता भी कहलाते हैं। वे जीवन की सभी बाधाओं को दूर करते हैं। लक्ष्मी जी समृद्धि और खुशहाली लाती हैं।
जब दोनों एक साथ घर में आते हैं। तब घर में सुख शांति का वास होता है। समृद्धि लंबे समय तक बनी रहती है। व्यापारी वर्ग इस दिन नए बहीखाते पूजते हैं। वे शुभ और लाभ की कामना करते हैं। गणेश जी शुभ और लाभ के पिता हैं। ऋद्धि और सिद्धि उनकी दो पत्नियां हैं। लक्ष्मी पूजा से संपूर्ण परिवार का कल्याण होता है। यह समन्वय जीवन को सुंदर बनाता है।
दिवाली पूजन की सही विधि और नियम
कलश की स्थापना भी अत्यंत शुभ मानी जाती है। कलश में जल, दुर्वा और सिक्के डालें। इसके ऊपर नारियल और आम के पत्ते रखें। सर्वप्रथम गणेश जी का ध्यान और पूजन करें। उन्हें मोदक, दूर्वा और मोली अर्पित करें। इसके बाद माता लक्ष्मी का पूजन आरंभ करें।
माता लक्ष्मी को कमल का फूल बहुत प्रिय है। उन्हें खीर और बताशे का भोग लगाएं। सिंदूर और अक्षत से उनका श्रृंगार करें। दीपक जलाकर आरती और मंत्र जाप करें। घर के हर कोने में दीये जलाएं। इससे दरिद्रता और नकारात्मक ऊर्जा दूर भागती है। श्रद्धा भाव से पूजा करने पर फल मिलता है। मन में दया और शुद्धता रखनी चाहिए। लक्ष्मी जी सच्चे भक्त पर कृपा बरसाती हैं।
पौराणिक मान्यताओं का सामाजिक संदेश
लक्ष्मी जी का अहंकार श्री हरि ने तोड़ा था। उन्होंने मातृत्व के महत्व को रेखांकित किया। धन से बड़ा स्थान रिश्तों का होता है। दिवाली केवल दीये जलाने का पर्व नहीं। यह अपने विचारों को रोशन करने का समय है। अज्ञान के अंधकार को मिटाना ही उद्देश्य है।
गणेश जी का बड़ा सिर ज्ञान का प्रतीक है। उनके बड़े कान अच्छी बातें सुनने के लिए हैं। उनकी छोटी आंखें सूक्ष्म नजर दर्शाती हैं। लक्ष्मी जी की चंचलता को संयम से बांधें। गणेश जी की बुद्धि से धन को सहेजें। तभी समाज और घर में खुशहाली आएगी। इस तरह दिवाली की रात खास बन जाती है। हर घर में दीप जलाकर खुशी मनाई जाती है। यह त्योहार एकता और प्रेम सिखाता है।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
FAQs:
- दिवाली पर भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की पूजा क्यों की जाती है?
दिवाली पर भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है क्योंकि गणेश जी को बुद्धि और विघ्नहर्ता माना जाता है और लक्ष्मी जी धन और समृद्धि की देवी हैं। दोनों की पूजा से धन और बुद्धि का संतुलन स्थापित होता है। - चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु का क्या होता है?
चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु क्षीर सागर में सोते हैं, जो आषाढ़ शुक्ल एकादशी से लेकर देवउठनी एकादशी तक होता है। इस अवधि में पूजा में भगवान विष्णु की उपस्थिति नहीं होती, इसलिए उनकी अनुपस्थिति में गणेश जी और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। - दिवाली की रात पूजा की सही विधि क्या है?
दिवाली की रात पूजा के लिए पहले पूजा स्थल को साफ करें, फिर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। गणेश जी को दायीं ओर और माता लक्ष्मी को बायीं ओर रखें। गणेश जी की पूजा पहले करें फिर माता लक्ष्मी की, तथा घर के हर कोने में दीए जलाएं।
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