मानसून आते ही बदलेगा ठाकुरजी का भोग और शृंगार, हट जाएगी शिवजी की गलंतिका
Kaushiki | Jun 30, 2026, 14:00 IST
mansoon me badlega bhagwan ka bhog
मानसून और सावन की शुरुआत होते ही देश के प्रमुख मंदिरों में भगवान की सेवा पद्धति बदल जाती है। पौराणिक नियमों के अनुसार ठाकुरजी का राग, भोग और शृंगार बदल जाता है। वहीं, गर्मी में शिवजी पर बूंद-बूंद पानी गिराने वाली गलंतिका भी हटा दी जाती है।
Monsoon Temple Rituals: भारत में मौसम बदलते ही हमारे रहन-सहन के तरीके बदल जाते हैं। ठीक इसी तरह मंदिरों में भगवान की सेवा का तरीका भी बदलता है। मानसून के दस्तक देते ही मंदिरों में ठाकुरजी का ठाट-बाट बदल जाता है।
अब भगवान को गर्मी से राहत देने वाले जतन रोक दिए जाते हैं। सावन का महीना शुरू होते ही मंदिरों में खास रौनक दिखने लगती है। भगवान के पहनावे से लेकर उनके राग और भोग में बदलाव होता है।
यह पूरी व्यवस्था सदियों पुराने पौराणिक और धार्मिक नियमों के मुताबिक होती है। सनातन धर्म में भगवान को एक जीवित इकाई के रूप में पूजा जाता है। इसलिए मौसम के मुताबिक उनकी पूरी दिनचर्या को बदला जाता है।
![Ujjain Mahakal Panchamrit Pooja & King Shringar Bhasma Aarti Darshan]()
गर्मियों के दिनों में आपने शिव मंदिरों (भगवान शिव का पूजन)में एक खास चीज देखी होगी। शिवलिंग के ठीक ऊपर मिट्टी या तांबे का एक घड़ा बांधा जाता है। इस घड़े को धार्मिक भाषा में गलंतिका कहा जाता है।
इस गलंतिका से शिवलिंग पर लगातार पानी की बूंदें टपकती रहती हैं। इसका मकसद तेज गर्मी में भोलेनाथ को शीतलता प्रदान करना होता है। पौराणिक मान्यता है कि इससे शिवजी का गुस्सा भी शांत रहता है।
अब मानसून आते ही मौसम में खुद ठंडी हवाएं चलने लगती हैं। चारों तरफ बारिश होने से मौसम में प्राकृतिक रूप से शीतलता आ जाती है। इसलिए सावन लगते ही शिवलिंग के ऊपर से गलंतिका हटा दी जाती है।
![Monsoon Temple Rituals]()
मानसून के मौसम में ठाकुरजी यानी भगवान कृष्ण की सेवा भी बदल जाती है। अब तक भगवान को गर्मी से बचाने के लिए चंदन लगाया जाता था। कलाई पर मोगरे और गुलाब के फूलों के बंगले बनते थे।
अब मानसून में भगवान का शृंगार पूरी तरह से बदल दिया जाता है। इस मौसम में भगवान को जरी और भारी पोशाक पहनाई जाती है। ठाकुरजी को अब ठंडी चीजों की जगह गर्म तासीर के भोग लगते हैं।
इस मौसम में मंदिरों में राग सेवा का भी बहुत महत्व है। अब ठाकुरजी को रिझाने के लिए मल्हार और सावन के गीत गाए जाते हैं। यह परंपरा ठाकुरजी को आनंदित करने के लिए निभाई जाती है।
धार्मिक शास्त्रों में हर मौसम के लिए अलग नियम बनाए गए हैं। आयुर्वेद और पुराणों के मुताबिक मानसून में पाचन क्रिया धीमी हो जाती है। इसलिए भगवान के भोग में भी विशेष सावधानी रखी जाती है।
अब ठाकुरजी को ठंडी तासीर वाले फल और शरबत नहीं चढ़ाए जाते। इनकी जगह भगवान को मालपुआ, खीर और घेवर का भोग लगाया जाता है। यह सभी चीजें शरीर को ऊर्जा और सही तापमान देती हैं।
भगवान को छप्पन भोग में ऋतु फल के रूप में आम और जामुन मिलते हैं। कढ़ी और हरी पत्तेदार सब्जियों का भोग इस मौसम में वर्जित होता है। शुद्ध देसी घी से बने पकवान ही ठाकुरजी को परोसे जाते हैं।
![Monsoon Temple Rituals]()
यह पूरी परंपरा इस बात का प्रतीक है कि भगवान हमारे परिवार के सदस्य हैं। जैसे हम मौसम बदलने पर अपने कपड़े और खान-पान बदलते हैं, वैसे ही भगवान का भी ध्यान रखा जाता है।
मथुरा, वृंदावन और जगन्नाथ पुरी जैसे बड़े मंदिरों में यह नियम कड़ाई से लागू होते हैं। मानसून की पहली फुहार पड़ते ही सेवादार इन नियमों का पालन शुरू कर देते हैं। भक्त भी भगवान के इस नए रूप के दर्शन पाकर धन्य हो जाते हैं।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
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अब भगवान को गर्मी से राहत देने वाले जतन रोक दिए जाते हैं। सावन का महीना शुरू होते ही मंदिरों में खास रौनक दिखने लगती है। भगवान के पहनावे से लेकर उनके राग और भोग में बदलाव होता है।
यह पूरी व्यवस्था सदियों पुराने पौराणिक और धार्मिक नियमों के मुताबिक होती है। सनातन धर्म में भगवान को एक जीवित इकाई के रूप में पूजा जाता है। इसलिए मौसम के मुताबिक उनकी पूरी दिनचर्या को बदला जाता है।
Ujjain Mahakal Panchamrit Pooja & King Shringar Bhasma Aarti Darshan
शिवजी की गलंतिका हटने की वजह क्या है
इस गलंतिका से शिवलिंग पर लगातार पानी की बूंदें टपकती रहती हैं। इसका मकसद तेज गर्मी में भोलेनाथ को शीतलता प्रदान करना होता है। पौराणिक मान्यता है कि इससे शिवजी का गुस्सा भी शांत रहता है।
अब मानसून आते ही मौसम में खुद ठंडी हवाएं चलने लगती हैं। चारों तरफ बारिश होने से मौसम में प्राकृतिक रूप से शीतलता आ जाती है। इसलिए सावन लगते ही शिवलिंग के ऊपर से गलंतिका हटा दी जाती है।
Monsoon Temple Rituals
ठाकुरजी का राग और शृंगार कैसे बदलता है
अब मानसून में भगवान का शृंगार पूरी तरह से बदल दिया जाता है। इस मौसम में भगवान को जरी और भारी पोशाक पहनाई जाती है। ठाकुरजी को अब ठंडी चीजों की जगह गर्म तासीर के भोग लगते हैं।
इस मौसम में मंदिरों में राग सेवा का भी बहुत महत्व है। अब ठाकुरजी को रिझाने के लिए मल्हार और सावन के गीत गाए जाते हैं। यह परंपरा ठाकुरजी को आनंदित करने के लिए निभाई जाती है।
पौराणिक नियमों के मुताबिक भोग में बदलाव
अब ठाकुरजी को ठंडी तासीर वाले फल और शरबत नहीं चढ़ाए जाते। इनकी जगह भगवान को मालपुआ, खीर और घेवर का भोग लगाया जाता है। यह सभी चीजें शरीर को ऊर्जा और सही तापमान देती हैं।
भगवान को छप्पन भोग में ऋतु फल के रूप में आम और जामुन मिलते हैं। कढ़ी और हरी पत्तेदार सब्जियों का भोग इस मौसम में वर्जित होता है। शुद्ध देसी घी से बने पकवान ही ठाकुरजी को परोसे जाते हैं।
Monsoon Temple Rituals
सदियों पुरानी परंपरा का आज भी पालन
मथुरा, वृंदावन और जगन्नाथ पुरी जैसे बड़े मंदिरों में यह नियम कड़ाई से लागू होते हैं। मानसून की पहली फुहार पड़ते ही सेवादार इन नियमों का पालन शुरू कर देते हैं। भक्त भी भगवान के इस नए रूप के दर्शन पाकर धन्य हो जाते हैं।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
FAQ
- शिवजी की गलंतिका मानसून में क्यों हटा दी जाती है?
गलंतिका का उपयोग शिवजी को गर्मी से बचाने और शीतलता देने के लिए होता है। मानसून में मौसम खुद ठंडा हो जाता है, इसलिए पौराणिक नियम के अनुसार इसे हटा दिया जाता है। - मानसून में ठाकुरजी को कौन से राग सुनाए जाते हैं?
मानसून और सावन के महीने में ठाकुरजी को प्रसन्न करने के लिए मल्हार, कजरी और सावन के विशेष पारंपरिक गीत सुनाए जाते हैं। इसे राग सेवा कहा जाता है। - सावन के महीने में भगवान को क्या भोग लगाया जाता है?
इस मौसम में ठाकुरजी को घेवर, मालपुआ, खीर और शुद्ध घी से बने गर्म पकवानों का भोग लगता है। ठंडी चीजें और हरी सब्जियां इस दौरान नहीं चढ़ाई जाती हैं।
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