MP सिंहस्थ 2028: उज्जैन महाकाल नगरी में लगेगा आस्था का सिंहस्थ कुंभ 2028, जानें क्या है इसका ज्योतिषीय कनेक्शन
Kaushiki | Oct 24, 2025, 13:37 IST
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महाकाल की नगरी उज्जैन में लगने वाला सिंहस्थ कुंभ मेला 2028 सनातन धर्म का सबसे बड़ा समागम है। यह पुण्य और मोक्षदायक पर्व हर 12 साल में आयोजित होता है, जब देवगुरु बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करते हैं...
Ujjain Simhastha 2028:सनातन धर्म की अटूट आस्था का प्रतीक, सिंहस्थ कुंभ मेला 2028 अब अपनी आध्यात्मिक घड़ी पर दस्तक दे रहा है।
यह वह महान पर्व है जिसका आयोजन हर बारह साल में होता है। ये महाकाल की नगरी उज्जैन में लगता है। उज्जैन, जिसे धार्मिक शास्त्रों में सप्तपुरी (सात मोक्षदायिनी नगरियां) में एक विशिष्ट स्थान मिला है।
शिप्रा नदी के तट पर लगने वाला यह मेला केवल एक इवेंट नहीं। बल्कि करोड़ों भक्तों का एक ऐसा समागम है, जहां नागा साधु, संत-महात्मा और आम श्रद्धालु एक साथ पुण्य की डुबकी लगाते हैं।
सिंहस्थ महाकुंभ पर्व जहां नागा साधुओं का हैरतअंगेज शाही स्नान होता है, वहीं आम जन भी अक्षय पुण्य की प्राप्ति के लिए पवित्र डुबकी लगाते हैं।
ऐसे में सिंहस्थ कुंभ 2028 भारत की आध्यात्मिक शक्ति, संस्कृति और जीवंत परंपरा का वह महाप्रदर्शन होगा, जो हर पाप का नाश कर जीवन को मोक्ष की राह दिखाता है। यह आस्था का सर्वोच्च शिखर है।
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कुंभ चार जगहों पर लगता है: हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक और उज्जैन। लेकिन उज्जैन के कुंभ को "सिंहस्थ" (Simhastha) कहा जाता है, जिसका एक खास ज्योतिषीय कनेक्शन है।
शास्त्रों के मुताबिक, यह उज्जैन सिंहस्थपर्व तब लगता है जब देवगुरु बृहस्पति (गुरु) सिंह राशि में प्रवेश करते हैं। 'सिंहस्थ' नाम इसी सिंह राशि के गोचर से लिया गया है। इसके साथ ही, सूर्य मेष राशि में विराजमान होते हैं।
ज्योतिष में गुरु को धर्म, ज्ञान और भाग्य का कारक माना जाता है। सिंह राशि (Leo) सूर्य की राशि है, जो तेज और शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है।
इन दोनों ग्रहों का यह दुर्लभ और शक्तिशाली योग उज्जैन की क्षिप्रा नदी के जल को अमृत के समान प्रभावी बना देता है। इससे इस दौरान स्नान करने वाले श्रद्धालुओं को अक्षय पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी कारण साधु-संत इसे मोक्ष का द्वार मानते हुए लाखों की संख्या में यहां आते हैं।
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2028 के उज्जैन सिंहस्थ कुंभ के लिए मध्य प्रदेश सरकार और उज्जैन प्रशासन ने अभी से तैयारियां शुरू कर दी हैं। सड़कें चौड़ी हो रही हैं, नए घाट बन रहे हैं और भक्तों के ठहरने के लिए विस्तृत व्यवस्थाओं पर काम चल रहा है।
इस बार करोड़ों लोगों के जुटने का अनुमान है। तो अगर आप भी 2028 उज्जैन सिंहस्थ (Ujjain Simhastha)धर्म और आस्था की इस भव्य गंगा में डुबकी लगाना चाहते हैं, तो 2028 में महाकाल की नगरी उज्जैन आने की योजना अभी से बना लें।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
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यह वह महान पर्व है जिसका आयोजन हर बारह साल में होता है। ये महाकाल की नगरी उज्जैन में लगता है। उज्जैन, जिसे धार्मिक शास्त्रों में सप्तपुरी (सात मोक्षदायिनी नगरियां) में एक विशिष्ट स्थान मिला है।
शिप्रा नदी के तट पर लगने वाला यह मेला केवल एक इवेंट नहीं। बल्कि करोड़ों भक्तों का एक ऐसा समागम है, जहां नागा साधु, संत-महात्मा और आम श्रद्धालु एक साथ पुण्य की डुबकी लगाते हैं।
सिंहस्थ महाकुंभ पर्व जहां नागा साधुओं का हैरतअंगेज शाही स्नान होता है, वहीं आम जन भी अक्षय पुण्य की प्राप्ति के लिए पवित्र डुबकी लगाते हैं।
ऐसे में सिंहस्थ कुंभ 2028 भारत की आध्यात्मिक शक्ति, संस्कृति और जीवंत परंपरा का वह महाप्रदर्शन होगा, जो हर पाप का नाश कर जीवन को मोक्ष की राह दिखाता है। यह आस्था का सर्वोच्च शिखर है।
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सिंहस्थ कुंभ 2028: क्या है इसका ज्योतिषीय महत्व
शास्त्रों के मुताबिक, यह उज्जैन सिंहस्थपर्व तब लगता है जब देवगुरु बृहस्पति (गुरु) सिंह राशि में प्रवेश करते हैं। 'सिंहस्थ' नाम इसी सिंह राशि के गोचर से लिया गया है। इसके साथ ही, सूर्य मेष राशि में विराजमान होते हैं।
ज्योतिष में गुरु को धर्म, ज्ञान और भाग्य का कारक माना जाता है। सिंह राशि (Leo) सूर्य की राशि है, जो तेज और शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है।
इन दोनों ग्रहों का यह दुर्लभ और शक्तिशाली योग उज्जैन की क्षिप्रा नदी के जल को अमृत के समान प्रभावी बना देता है। इससे इस दौरान स्नान करने वाले श्रद्धालुओं को अक्षय पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी कारण साधु-संत इसे मोक्ष का द्वार मानते हुए लाखों की संख्या में यहां आते हैं।
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क्या खास होता है उज्जैन के सिंहस्थ में
- शाही स्नान:
यह उज्जैन सिंहस्थ कुंभ की सबसे खास और भव्य परंपरा है। अलग-अलग अखाड़ों के नागा साधु और संत-महात्मा बैंड-बाजे के साथ पूरे लाव-लश्कर के साथ शिप्रा नदी के घाटों पर पहुंचते हैं। उनका पहला स्नान ही शाही स्नान कहलाता है, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से लोग उमड़ पड़ते हैं। यह स्नान ही सबसे बड़ा धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है। - कल्पवास:
कई श्रद्धालु पूरे सिंहस्थ की अवधि तक शिप्रा के तट पर कल्पवास करते हैं। यह तपस्या और संयम का जीवन होता है, जहां सादगी से रहकर भगवान महाकाल की पूजा और ध्यान किया जाता है। - शिप्रा का महत्व:
शिप्रा नदी के जल को अत्यंत पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि इस पावन नदी में डुबकी लगाने से जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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2028 सिंहस्थ कुंभ मेला
इस बार करोड़ों लोगों के जुटने का अनुमान है। तो अगर आप भी 2028 उज्जैन सिंहस्थ (Ujjain Simhastha)धर्म और आस्था की इस भव्य गंगा में डुबकी लगाना चाहते हैं, तो 2028 में महाकाल की नगरी उज्जैन आने की योजना अभी से बना लें।
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