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शिक्षा जगत में एक ऐसा हिस्टोरिकल पावर शिफ्ट देखने को मिला है जिसने सबको हैरान कर दिया है। दशकों से हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का नाम सुनते ही दिमाग में बेस्ट क्वालिटी एजुकेशन और रिसर्च की तस्वीर आती थी। लेकिन साल 2026 की शुरुआत में ही एक ऐसी खबर आई जिसने पूरी दुनिया के एजुकेशन एक्सपर्ट्स को चौंका दिया है।
लेटेस्ट ग्लोबल यूनिवर्सिटी रैंकिंग में अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी अपनी नंबर 1 की कुर्सी खो चुकी है। अब चीन की झेजियांग यूनिवर्सिटी (Zhejiang University) रिसर्च और एकेडमिक आउटपुट के मामले में दुनिया में सबसे आगे निकल गई है।
अमेरिकी फंडिंग में कटौती और चीन के भारी STEM निवेश ने ग्लोबल एजुकेशन का केंद्र बदल दिया है। आइए जानें यह ऐतिहासिक उलटफेर कैसे हुआ।
कैसे हुआ यह ऐतिहासिक उलटफेर
ये बदलाव रातों-रात नहीं हुआ है। बल्कि इसके पीछे चीन की पिछले 20 सालों की कड़ी मेहनत है। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हार्वर्ड अब गिरकर तीसरे पायदान तक पहुंच गई है।
रैंकिंग में यह गिरावट मेनली तीन चीजों पर बेस्ड है। वो है- रिसर्च पेपर्स की संख्या, उनकी क्वालिटी और उन्हें मिलने वाले इंटरनेशनल क्रेडिट (Citation)।
चीन ने साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और माथेमैटिक (STEM) विषयों में बहुत ज्यादा काम किया है। इसलिए अब दुनिया के वैज्ञानिक चीनी रिसर्च पेपर्स को ज्यादा पढ़ रहे हैं और इस्तेमाल कर रहे हैं।
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क्या है चीन का मास्टर प्लान
चीनी सरकार ने अपनी यूनिवर्सिटीज को ग्लोबल पावरहाउस बनाने के लिए अरबों डॉलर का इन्वेस्टमेंट किया है। उन्होंने डबल फर्स्ट क्लास यूनिवर्सिटी प्लान (Double First Class University Plan) शुरू किया। इसके तहत रिसर्च करने वाले प्रोफेसरों को भारी फंडिंग और प्रमोशन दिया गया।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मेडिकल साइंस और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे सेक्टर्स में चीन के रिसर्च पेपर अब अमेरिका से कहीं ज्यादा पब्लिश हो रहे हैं। जहां हार्वर्ड की ग्रोथ स्थिर बनी हुई है, वहीं चीनी यूनिवर्सिटीज हर साल 2 से 3 गुना ज्यादा रिसर्च कर रही हैं।
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अमेरिका के पिछड़ने की असली वजह
एक्सपर्ट्स का कहना है कि हार्वर्ड (Harvard University) की क्वालिटी खराब नहीं हुई है, बल्कि अमेरिका की कुछ नई नीतियां इसके लिए जिम्मेदार हैं। डोनाल्ड ट्रंप के एडमिनिस्ट्रेशन में रिसर्च और एजुकेशन बजट में भारी कटौती की खबरें आईं।
इसके अलावा, विदेशी छात्रों के लिए हार्ड वीजा नियम और इमिग्रेशन पॉलिसी ने भी अमेरिकी कैंपस का माहौल अफेक्ट किया है। जब फंड कम होता है और टैलेंटेड विदेशी रिसर्चर्स को रोका जाता है, तो ब्रेन ड्रेन शुरू हो जाता है। इसका सीधा असर यूनिवर्सिटी की ग्लोबल रैंकिंग और प्रेस्टीज पर पड़ने लगा है।
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क्या अब खत्म हो गई अमेरिका की मोनोपोली
शिक्षा के क्षेत्र में यह बदलाव केवल एक आंकड़े का खेल नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल पावर शिफ्ट का संकेत है। अब दुनिया भर के छात्रों के लिए बेहतरीन शिक्षा का मतलब सिर्फ अमेरिका या ब्रिटेन नहीं रह गया है।
चीन ने यह साबित कर दिया है कि अगर सही दिशा में निवेश और स्पष्ट नीतियां हों, तो पश्चिम के दबदबे को खत्म किया जा सकता है। आने वाले समय में ग्लोबल रैंकिंग की टॉप-10 लिस्ट में एशियाई देशों का ही बोलबाला रहने की उम्मीद जताई जा रही है।
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क्या है ग्लोबल यूनिवर्सिटी रैंकिंग
Global University Ranking (वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग) एक ऐसी लिस्ट है जो दुनियाभर की यूनिवर्सिटीज को उनकी एकेडमिक क्वालिटी, रिसर्च आउटपुट और रेपुटेशन के बेस पर रैंक करती है।
इसे चेक करने के लिए QS World University Rankings, Times Higher Education (THE) और Shanghai Ranking (ARWU) जैसी मेजर वेबसाइट्स सबसे भरोसेमंद मानी जाती हैं।
रैंकिंग चेक करने के लिए आप इन वेबसाइट्स पर जाकर 'Filter' ऑप्शन का यूज कर सकते हैं। वहां आप देश , विषय और ईयर के बेस पर टॉप इंस्टीटूशन्स की लिस्ट देख सकते हैं।
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