NEWS STRIKE: Mohan Yadav से टकराव या नरोत्तम की चूक? टिकट कटने की पूरी कहानी
Harish Divekar | Jul 11, 2026, 19:08 IST
Photograph: (THESOOTR)
BHOPAL. दतिया उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा को टिकट क्यों नहीं मिला? क्या मोहन यादव की भूमिका रही या नरोत्तम खुद चूके। जानिए पूरी सियासी कहानी और अंदर की वजहें।
News Strike:नरोत्तम मिश्रा का टिकट क्यों कटा। क्या मोहन यादव का सीएम होना इसकी बड़ी वजह है या नरोत्तम किसी और से नहीं खुद से ही ये सियासी जंग हार गए हैं। इस टिकट की खातिर नरोत्तम ने सारी ताकत सारा रसूख झौंक दिया था।
राजेंद्र भारती से जब उनकी सदस्यता छिनी तो लगा कि सारी सियासी बिसात नरोत्तम मिश्रा को विधानसभा तक लाने के लिए ही तैयार की गई है, लेकिन बीजेपी के फैसले ने हैरान कर दिया।
सियासत को समझने वाले आम लोग जितने चौंके होंगे नरोत्तम मिश्रा भी उतने ही सदमे में होंगे। हम आपको आज बताते हैं वो अंदर की बात जिसकी वजह से नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं मिला और ये भी बताएंगे कि क्यों सारी सेटिंग जमाने के बाद भी नरोत्तम इस मौके से चूक गए।
मध्य प्रदेश में दतिया उपचुनाव का टिकट नरोत्तम को न मिलना क्या इस बात का सबूत है कि नरोत्तम मिश्रा की चुनावी पारी अब खत्म हो चुकी है। खासतौर से बीजेपी में रहते हुए। क्या नरोत्तम मिश्रा खुद बीजेपी छोड़ कर निर्दलीय या किसी और दल से चुनाव लड़ेंगे। ये संभावनाएं बहुत कम हैं। नरोत्तम बीजेपी को छोड़कर जाएंगे।
ऐसा सोचना या साफ-साफ शब्दों में कहें तो ऐसी हिम्मत भी वो नहीं कर पाएंगे। क्योंकि रसूख कितना भी हो, दमखम कितना भी हो, लेकिन उनके एक इशारे पर सड़क तक बवाल मचा देने वाले समर्थक सिर्फ इसी पार्टी की बदौलत हैं। हालांकि, सामने आकर उन्हें यही कहना पड़ा कि पार्टी से बढ़कर कुछ नहीं। इसलिए अपनी बात पार्टी फोरम पर ही रखेंगे।
पिछले कुछ समय से शायद नरोत्तम मिश्रा ये समझ बैठे हों कि वो पार्टी से ऊपर उठ चुके हैं। अपने पीआर और रुतबे के दम पर पार्टी में अपनी मर्जी से फैसले करवा सकते हैं।
कई बार उनके समर्थकों ने ये तक खबरें फैलाईं कि वो पार्टी के चाणक्य अमित शाह के बेहद खास हैं, लेकिन ये सब करते करते नरोत्तम मिश्रा शायद ये भूल गए कि वो टिकट देने की असली काबिलियत यानी कि योग्यता वो खो चुके हैं।
वो एक चुनाव में उस योग्यता पर खरे नहीं उतरे थे। फिर भी उन्हें बीजेपी ने दोबारा मौका दिया, लेकिन वो फेल हो गए। जैसा हमने कहा कि जब दतिया विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता छिनी तो ऐसा लगा था कि सारी प्लानिंग नरोत्म मिश्रा के लिए हो रही है। शायद नरोत्तम मिश्रा भी इसी गुमान थे। इसलिए उन्होंने अपने नाम का ऐलान होने से पहले ही नामांकन पत्र भी खरीद लिया था।
क्या वो इसके जरिए पार्टी को कोई मैसेज देने की कोशिश कर रहे थे। नरोत्तम मिश्रा ने पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठकें लेना भी शुरू कर दिया था। खबरें तो यहां तक फैली कि उनके नाम के पोस्टर छप चुके हैं।
जिलाध्यक्ष और दूसरे पदाधिकारियों के साथ भोज पॉलिटिक्स भी हुई। उनके बेटे ने ये दावा भी कर दिया कि वो उपचुनाव जीतेंगे और फिर से गृह मंत्री भी बनेंगे। क्या यही ओवर कॉन्फिडेंस नरोत्तम मिश्रा पर भारी पड़ गया।
नरोत्तम मिश्रा को ये कॉन्फिडेंस था कि वो चुनाव जीत जाएंगे। शायद अपने पैसे और पावर के दम पर वो ऐसा कर भी पाते, लेकिन फिर ये याद दिला रहे हैं कि वो उस योग्यता को भूल गए जो बीजेपी में टिकट हासिल करने के लिए जरूरी है।
उस योग्यता पर आने से पहले नरोत्तम के ओवरकॉन्फिडेंस की एक और बानगी देखिए। नरोत्तम मिश्रा अपने मूछों पर ताव देते हुए कह रहे थे कि मैंने 13 एकड़ मे नवग्रह मंदिर बनवाया है।
मैंने सभी नवग्रहों को साध लिया है, लेकिन जब टिकट की बारी आई तो न नवग्रहों ने साथ दिया न ही पार्टी के उन नेताओं ने जिनका दम वो पूरे सियासी सफर के दौरान करते रहे। उनका नाम कटा तो कटा, जिसे टिकट मिला वो उनसे काफी जूनियर नेता भी है। यानी पार्टी ने एक जूनियर को टिकट देना मुफीद समझा बजाए कि नरोत्तम मिश्रा जैसे दिग्गज और दतिया के सूरमा के।
बीजेपी ने नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा है। जो मप्र हाऊसिंग बोर्ड के चेयरमैन रहे हैं। दोनों ही ब्राह्मण नेता हैं इसलिए जातिगत समीकरण को ध्यान में रखकर टिकट कटा। ऐसा कहना सरासर गलत होगा।
अब बात करें इमेज की तो भ्रष्टाचार के कई आरोप नरोत्तम मिश्रा पर लगे हैं तो बहुत से आरोप आशुतोष तिवारी पर भी हैं। कोयले की खदान में शायद पार्टी ने कम कालिख वाले हाथ तलाशे और फैसला ले लिया।
अब बात करते हैं उन फेक्टर्स की जो नरोत्तम मिश्रा और टिकट के बीच आ गए। पहली कारण तो उस योग्यता का होना है जो नरोत्तम मिश्रा खो चुके हैं। नरोत्तम मिश्रा साल 2018 का चुनाव बहुत मुश्किल से जीते थे।
कांग्रेस उम्मीदवार राजेंद्र भारती को वो ढाई हजार से कुछ ही ज्यादा मतों से हरा पाए थे। तभी यही कहा गया कि नरोत्तम मिश्रा अपनी पावर का इस्तेमाल करके जीते हैं। वो चुनाव नरोत्तम मिश्रा के लिए खतरे की घंटी था। जिसे शायद नरोत्तम मिश्रा ओवरकॉन्फिडेंस के चलते समझ नहीं पाए।
इसका नतीजा ये हुआ कि 2023 के चुनाव में उन्हें शिकस्त मिली। उसके बाद से वो कभी लोकसभा चुनाव तो कभी राज्यसभा चुनाव के लिए जुगाड़ जमाते रहे, लेकिन उन्हें पार्टी ने तवज्जो नहीं दी।
उपचुनाव की बारी आई तो उन्हें फिर अपने नवग्रहों की सेटिंग पर यकीन हो गया, लेकिन पार्टी ने फिर उन्हें खारिज कर दिया। अंदर खाने की खबर ये है कि नरोत्तम मिश्रा पार्टी सर्वे और फीडबैक में आशुतोष तिवारी से बुरी तरह पिछड़ गए थे। पार्टी के सर्वे में आशुतोष तिवारी टॉप पर थे।
दूसरे नंबर कालीचरण कुशवाह और उसके बाद नरोत्तम मिश्रा का नाम आया। यानी साफ था कि नरोत्तम मिश्रा आसानी से जीत जाएं ऐसे उम्मीदवार नहीं थे। बस यहीं पर वो पार्टी के लिए अयोग्य साबित हो गए और उन्हें टिकट नहीं मिला।
यहां ये भी गौर करने वाली बात है कि उपचुनाव में हार किसी भी सत्ताधारी दल के लिए शर्मनाक बात होती है। जो ये जाहिर करती है कि डबल इंजन हो या ट्रिपल इंजन, ये सरकार लोगों की नजर से उतर रही है और बीजेपी ऐसा कतई नहीं चाहती।
भले ही नरोत्तम मिश्रा किसी भी नेता के करीबी हों या पैसे से सब कुछ खरीद सकते हों और दिल्ली तक को खुश कर सकते हों। पर, मतदाता का भरोसा नहीं है तो टिकट के पैमाने पर खरे नहीं उतर सके।
दूसरी एक बड़ी वजह है उनकी सीनियोरिटी। देखा जाए तो अभी ही मप्र में ऐसे विधायकों की कमी नहीं है जो सीएम मोहन यादव से सीनियर हैं और उनमें से कुछ मंत्री भी हैं। जैसे कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, राकेश सिंह. नरेंद्र सिंह तोमर खुद सीनियर हैं और अभी विधानसभा अध्यक्ष भी हैं।
ऐसे में एक और सीनियर विधायक को लाकर बीजेपी खुद अपने लिए और सीएम मोहन यादव के लिए नई मुसीबत मोल लेने के मूड में नहीं थी। क्योंकि ये भी तय था कि अगर नरोत्तम जीत जाते तो उन्हें कैबीनेट में शामिल करने का दबाव भी होता और रसूखदार विभाग देने का भी। इसलिए नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं दिया गया। इस में सीएम मोहन यादव की राय भी शामिल हो, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।
तीसरा और एक बड़ा कारण है नरोत्तम मिश्रा की इमेज। बेशक नरोत्तम मिश्रा टिप टॉप रहना पसंद करते हैं। अपने चेहरे को चमका कर रखते हैं। कपड़े भी ऐसे जैसे बस अभी कलफ होकर और स्त्री होकर आए हैं और सीधे उन पर चढ़ गए हों, लेकिन नरोत्तम मिश्रा ने अपने चेहरे को जितना चमकाया अपनी इमेज को उतना चमकाना भूल गए। उन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे। पार्टी के ही कई वरिष्ठ नेता, विधायक और मंत्री उनसे नाराज बताए जाते हैं।
अंदर की बात ये है कि जब पार्टी के मंत्रियों से ही दतिया में टिकट देने पर चर्चा हो रही थी। तब सिर्फ दो मंत्रियों के अलावा किसी ने उनके नाम पर सहमति नहीं जताई। जिन दो मंत्रियों ने उनके नाम पर सहमति जताई वो कैलाश विजयवर्गीय और प्रहलाद पटेल बताए जा रहे हैं।
इसके अलावा कई मंत्री ऐसे थे जो नरोत्तम मिश्रा को टिकट देने के पक्ष में नहीं दिखे। एक और अंदरखाने की खबर ये है कि सीएम मोहन यादव को उनके विश्वासपात्र अफसरों ने भी यही संकेत दिए कि नरोत्तम मिश्रा का जीत पाना मुश्किल है। इसलिए उनकी रिपोर्ट में भी नरोत्तम मिश्रा खरे नहीं उतरे।
अब सवाल ये है कि नरोत्तम मिश्रा क्या करेंगे। उनका नाम खारिज होते ही उनके समर्थकों ने रंग दिखाना शुरू कर दिया है। हालांकि, खुद नरोत्तम मिश्रा ये कह चुके हैं कि बवाल काटना गलत है।
जो भी बात होगी पार्टी फोरम पर होगी। पर क्या इसमें कोई शक है कि उनके समर्थकों ने उनकी सहमति के बगैर सड़क पर उत्पात मचाया होगा। उनके समर्थकों का विरोध प्रदर्शन और बवाल किसी काम आने वाला नहीं है। नरोत्तम मिश्रा का सारी तिकड़म पार्टी आलाकमान के सामने धरी रह गई है।
शायद नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों का भी ये भ्रम टूट जाए कि दिल्ली तक नरोत्तम मिश्रा की मजबूत पकड़ है। वो अमित शाह से लेकर पार्टी के आला दर्जे के नेताओं के चहेते हैं। उनके सिर पर सबसे ज्यादा कांग्रेसियों का दल बदल कराने का सेहरा भी सजा है। क्या पता कुछ कार्यकर्ता ये कानाफूसी भी शुरू कर चुके हों कि जब उनका नेता इतना दमदार है तो टिकट की जुगाड़ क्यों नहीं कर पाया।
नरोत्तम मिश्रा पर इल्जाम ये भी है कि राजेंद्र भारती की सदस्यता छीनने का पूरा चक्रव्यू उन्होंने ही रचा था। जब सत्ता की भूख इस कदर है तो क्या नरोत्तम मिश्रा अब चुप बैठेंगे। उन्होंने हर मौके पर अपने नाम की अफवाह उड़वाई।
प्रदेशाध्यक्ष से लेकर लोकसभा और राज्यसभा चुनाव तक उनका पीआर तंत्र एक्टिव रहा। पर अब क्या। अब तकरीबन हर मौका चूक गया है। तो क्या नरोत्तम मिश्रा चुप बैठेंगे। क्या वो इतने ताकतवर हैं कि बीजेपी के सामने नई लकीर खींच पाए।
क्या नरोत्तम को टिकट न मिलना और उसके बाद समर्थकों का बवाल काटना ये इशारा नहीं करता कि सत्ता की भूख अब पार्टी के अनुशासन से ऊपर उठ चुकी है।
नरोत्तम मिश्रा अगर शांत बैठ गए तो मानिए कि पार्टी विथ डिफरेंस और डिसिप्लीन के नारे में अब भी जान बाकी है, लेकिन अगर उन्होंने अलग रास्ता चुना या सबोटाज में कामयाब हुए तो समझिए कि नारा खोखला होना शुरू हो चुका है।
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राजेंद्र भारती से जब उनकी सदस्यता छिनी तो लगा कि सारी सियासी बिसात नरोत्तम मिश्रा को विधानसभा तक लाने के लिए ही तैयार की गई है, लेकिन बीजेपी के फैसले ने हैरान कर दिया।
सियासत को समझने वाले आम लोग जितने चौंके होंगे नरोत्तम मिश्रा भी उतने ही सदमे में होंगे। हम आपको आज बताते हैं वो अंदर की बात जिसकी वजह से नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं मिला और ये भी बताएंगे कि क्यों सारी सेटिंग जमाने के बाद भी नरोत्तम इस मौके से चूक गए।
नरोत्तम की सियासी पारी पर सवाल
ऐसा सोचना या साफ-साफ शब्दों में कहें तो ऐसी हिम्मत भी वो नहीं कर पाएंगे। क्योंकि रसूख कितना भी हो, दमखम कितना भी हो, लेकिन उनके एक इशारे पर सड़क तक बवाल मचा देने वाले समर्थक सिर्फ इसी पार्टी की बदौलत हैं। हालांकि, सामने आकर उन्हें यही कहना पड़ा कि पार्टी से बढ़कर कुछ नहीं। इसलिए अपनी बात पार्टी फोरम पर ही रखेंगे।
नरोत्तम का ओवरकॉन्फिडेंस पड़ा भारी?
कई बार उनके समर्थकों ने ये तक खबरें फैलाईं कि वो पार्टी के चाणक्य अमित शाह के बेहद खास हैं, लेकिन ये सब करते करते नरोत्तम मिश्रा शायद ये भूल गए कि वो टिकट देने की असली काबिलियत यानी कि योग्यता वो खो चुके हैं।
वो एक चुनाव में उस योग्यता पर खरे नहीं उतरे थे। फिर भी उन्हें बीजेपी ने दोबारा मौका दिया, लेकिन वो फेल हो गए। जैसा हमने कहा कि जब दतिया विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता छिनी तो ऐसा लगा था कि सारी प्लानिंग नरोत्म मिश्रा के लिए हो रही है। शायद नरोत्तम मिश्रा भी इसी गुमान थे। इसलिए उन्होंने अपने नाम का ऐलान होने से पहले ही नामांकन पत्र भी खरीद लिया था।
क्या वो इसके जरिए पार्टी को कोई मैसेज देने की कोशिश कर रहे थे। नरोत्तम मिश्रा ने पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठकें लेना भी शुरू कर दिया था। खबरें तो यहां तक फैली कि उनके नाम के पोस्टर छप चुके हैं।
जिलाध्यक्ष और दूसरे पदाधिकारियों के साथ भोज पॉलिटिक्स भी हुई। उनके बेटे ने ये दावा भी कर दिया कि वो उपचुनाव जीतेंगे और फिर से गृह मंत्री भी बनेंगे। क्या यही ओवर कॉन्फिडेंस नरोत्तम मिश्रा पर भारी पड़ गया।
नवग्रहों का भरोसा भी नहीं बचा सका सियासी ग्रहण
उस योग्यता पर आने से पहले नरोत्तम के ओवरकॉन्फिडेंस की एक और बानगी देखिए। नरोत्तम मिश्रा अपने मूछों पर ताव देते हुए कह रहे थे कि मैंने 13 एकड़ मे नवग्रह मंदिर बनवाया है।
मैंने सभी नवग्रहों को साध लिया है, लेकिन जब टिकट की बारी आई तो न नवग्रहों ने साथ दिया न ही पार्टी के उन नेताओं ने जिनका दम वो पूरे सियासी सफर के दौरान करते रहे। उनका नाम कटा तो कटा, जिसे टिकट मिला वो उनसे काफी जूनियर नेता भी है। यानी पार्टी ने एक जूनियर को टिकट देना मुफीद समझा बजाए कि नरोत्तम मिश्रा जैसे दिग्गज और दतिया के सूरमा के।
बीजेपी ने नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा है। जो मप्र हाऊसिंग बोर्ड के चेयरमैन रहे हैं। दोनों ही ब्राह्मण नेता हैं इसलिए जातिगत समीकरण को ध्यान में रखकर टिकट कटा। ऐसा कहना सरासर गलत होगा।
अब बात करें इमेज की तो भ्रष्टाचार के कई आरोप नरोत्तम मिश्रा पर लगे हैं तो बहुत से आरोप आशुतोष तिवारी पर भी हैं। कोयले की खदान में शायद पार्टी ने कम कालिख वाले हाथ तलाशे और फैसला ले लिया।
नरोत्तम की हार बनी टिकट की वजह?
कांग्रेस उम्मीदवार राजेंद्र भारती को वो ढाई हजार से कुछ ही ज्यादा मतों से हरा पाए थे। तभी यही कहा गया कि नरोत्तम मिश्रा अपनी पावर का इस्तेमाल करके जीते हैं। वो चुनाव नरोत्तम मिश्रा के लिए खतरे की घंटी था। जिसे शायद नरोत्तम मिश्रा ओवरकॉन्फिडेंस के चलते समझ नहीं पाए।
इसका नतीजा ये हुआ कि 2023 के चुनाव में उन्हें शिकस्त मिली। उसके बाद से वो कभी लोकसभा चुनाव तो कभी राज्यसभा चुनाव के लिए जुगाड़ जमाते रहे, लेकिन उन्हें पार्टी ने तवज्जो नहीं दी।
सर्वे में पिछड़े नरोत्तम, कटा टिकट
दूसरे नंबर कालीचरण कुशवाह और उसके बाद नरोत्तम मिश्रा का नाम आया। यानी साफ था कि नरोत्तम मिश्रा आसानी से जीत जाएं ऐसे उम्मीदवार नहीं थे। बस यहीं पर वो पार्टी के लिए अयोग्य साबित हो गए और उन्हें टिकट नहीं मिला।
यहां ये भी गौर करने वाली बात है कि उपचुनाव में हार किसी भी सत्ताधारी दल के लिए शर्मनाक बात होती है। जो ये जाहिर करती है कि डबल इंजन हो या ट्रिपल इंजन, ये सरकार लोगों की नजर से उतर रही है और बीजेपी ऐसा कतई नहीं चाहती।
भले ही नरोत्तम मिश्रा किसी भी नेता के करीबी हों या पैसे से सब कुछ खरीद सकते हों और दिल्ली तक को खुश कर सकते हों। पर, मतदाता का भरोसा नहीं है तो टिकट के पैमाने पर खरे नहीं उतर सके।
सीनियरिटी बनी टिकट की राह में रोड़ा
ऐसे में एक और सीनियर विधायक को लाकर बीजेपी खुद अपने लिए और सीएम मोहन यादव के लिए नई मुसीबत मोल लेने के मूड में नहीं थी। क्योंकि ये भी तय था कि अगर नरोत्तम जीत जाते तो उन्हें कैबीनेट में शामिल करने का दबाव भी होता और रसूखदार विभाग देने का भी। इसलिए नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं दिया गया। इस में सीएम मोहन यादव की राय भी शामिल हो, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।
इमेज और रिपोर्ट ने बढ़ाई मुश्किलें
अंदर की बात ये है कि जब पार्टी के मंत्रियों से ही दतिया में टिकट देने पर चर्चा हो रही थी। तब सिर्फ दो मंत्रियों के अलावा किसी ने उनके नाम पर सहमति नहीं जताई। जिन दो मंत्रियों ने उनके नाम पर सहमति जताई वो कैलाश विजयवर्गीय और प्रहलाद पटेल बताए जा रहे हैं।
इसके अलावा कई मंत्री ऐसे थे जो नरोत्तम मिश्रा को टिकट देने के पक्ष में नहीं दिखे। एक और अंदरखाने की खबर ये है कि सीएम मोहन यादव को उनके विश्वासपात्र अफसरों ने भी यही संकेत दिए कि नरोत्तम मिश्रा का जीत पाना मुश्किल है। इसलिए उनकी रिपोर्ट में भी नरोत्तम मिश्रा खरे नहीं उतरे।
समर्थकों का गुस्सा, क्या होगा अगला कदम?
जो भी बात होगी पार्टी फोरम पर होगी। पर क्या इसमें कोई शक है कि उनके समर्थकों ने उनकी सहमति के बगैर सड़क पर उत्पात मचाया होगा। उनके समर्थकों का विरोध प्रदर्शन और बवाल किसी काम आने वाला नहीं है। नरोत्तम मिश्रा का सारी तिकड़म पार्टी आलाकमान के सामने धरी रह गई है।
शायद नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों का भी ये भ्रम टूट जाए कि दिल्ली तक नरोत्तम मिश्रा की मजबूत पकड़ है। वो अमित शाह से लेकर पार्टी के आला दर्जे के नेताओं के चहेते हैं। उनके सिर पर सबसे ज्यादा कांग्रेसियों का दल बदल कराने का सेहरा भी सजा है। क्या पता कुछ कार्यकर्ता ये कानाफूसी भी शुरू कर चुके हों कि जब उनका नेता इतना दमदार है तो टिकट की जुगाड़ क्यों नहीं कर पाया।
नरोत्तम के सामने अब क्या रास्ता?
प्रदेशाध्यक्ष से लेकर लोकसभा और राज्यसभा चुनाव तक उनका पीआर तंत्र एक्टिव रहा। पर अब क्या। अब तकरीबन हर मौका चूक गया है। तो क्या नरोत्तम मिश्रा चुप बैठेंगे। क्या वो इतने ताकतवर हैं कि बीजेपी के सामने नई लकीर खींच पाए।
क्या नरोत्तम को टिकट न मिलना और उसके बाद समर्थकों का बवाल काटना ये इशारा नहीं करता कि सत्ता की भूख अब पार्टी के अनुशासन से ऊपर उठ चुकी है।
नरोत्तम मिश्रा अगर शांत बैठ गए तो मानिए कि पार्टी विथ डिफरेंस और डिसिप्लीन के नारे में अब भी जान बाकी है, लेकिन अगर उन्होंने अलग रास्ता चुना या सबोटाज में कामयाब हुए तो समझिए कि नारा खोखला होना शुरू हो चुका है।
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